Saturday, 6 August 2016

Raja Janak

जनक के जीवन में एक उल्लेख है। जनक रहते तो राजमहल में थे, बड़े ठाठ— बाट से। सम्राट थे और साक्षी भी। अनूठा जोड़ था। सोने में सुगंध थी। बुद्ध साक्षी हैं यह कोई बड़ी महत्वपूर्ण बात नहीं। महावीर साक्षी हैं यह कोई बड़ी महत्वपूर्ण बात नहीं, सरल बात है। सब छोड़ कर साक्षी हैं। जनक का साक्षी होना बड़ा महत्वपूर्ण है। सब है और साक्षी हैं।

एक गुरु ने अपने शिष्य को कहा कि तू वर्षों से सिर धुन रहा है और तुझे कुछ समझ नहीं आती। अब तू मेरे बस के बाहर है। तू जा, जनक के पास चला जा। उसने कहा कि आप जैसे महाज्ञानी के पास कुछ न हुआ तो यह जनक जैसे अज्ञानी के पास क्या होगा? जो अभी महलों में रहता, वेश्याओं के नृत्य देखता; और मैंने तो सुना है कि शराब इत्यादि भी पीता है। आप मुझे कहां भेजते हैं? लेकिन गुरु ने कहा, तू जा!

गया शिष्य। बेमन से गया। न जाना था तो गया, क्योंकि गुरु की आज्ञा थी तो आज्ञानवश गया। था तो पक्का कि वहां क्या मिलेगा। मन में तो उसके निंदा थी। मन में तो वह सोचता था, उससे ज्यादा तो मैं ही जानता हूं। और जब वह पहुंचा तो संयोग की बात, जनक बैठे थे, वेश्याएं नृत्य कर रही थीं, दरबारी शराब ढाल रहे थे। वह तो बड़ा ही नाराज हो गया। उसने जनक को कहा, महाराज, मेरे गुरु ने भेजा है इसलिए आ गया हूं। भूल हो गई है। क्यों उन्होंने भेजा है, किस पाप का मुझे दंड दिया है यह भी मैं नहीं जानता। लेकिन अब आ गया हूं तो आपसे यह पूछना है कि यह अफवाह
आपने किस भांति उड़ा दी है कि आप ज्ञान को उपलब्ध हो गए हैं? यह क्या हो रहा है यहां? यह राग—रंग चल रहा है। इतना बड़ा साम्राज्य, यह महल, यह धन—दौलत, यह सारी व्यवस्था, इस सबके बीच में आप बैठे हैं तो ज्ञान को उपलब्ध कैसे हो सकते हैं? त्यागी ही ज्ञान को उपलब्ध होते हैं।

जनक ने कहा, तुम जरा बेवक्त आ गए। यह कोई सत्संग का समय नहीं है। तुम एक काम करो, मैं अभी उलझा हूं। तुम यह दीया ले लो। पास में रखे एक दीये को दे दिया और कहा कि तुम पूरे महल का चक्कर लगा आओ। एक—एक कमरे में हो आना। मगर एक बात खयाल रखना, इस महल की एक खूबी है; अगर दीया बुझ गया तो फिर लौट न सकोगे, भटक जाओगे। बड़ा विशाल महल था। तो दीया न बुझे इसका खयाल रखना। सब महल को देख आओ। तुम जब तक लौटोगे तब तक मैं फुरसत में हो जाऊंगा, फिर सत्संग के लिए बैठेंगे।

वह गया युवक उस दीये को लेकर। उसकी जान बड़ी मुसीबत में फंसी। महलों में कभी आया भी नहीं था। वैसे ही यह महल बड़ा तिलिस्मी, इसकी खबरें उसने सुनी थीं कि इसमें लोग खो जाते हैं, और एक झंझट। और यह दीया अगर बुझ जाए तो जान पर आ बने। ऐसे ही संसार में भटके हैं, और संसार के भीतर यह और एक झंझट खड़ी हो गई। अभी संसार से ही नहीं छूटे थे और एक और मुसीबत आ गई।

लेकिन अब जनक ने कहा है और गुरु ने भेजा है तो वह दीये को लेकर गया बड़ा डरता—डरता। महल बड़ा सुंदर था; अति सुंदर था। महल में सुंदर चित्र थे, सुंदर मृर्तियां थीं, सुंदर कालीन थे, लेकिन उसे कुछ दिखाई न पड़ता। वह तो एक ही चीज देख रहा है कि दीया न बुझ जाए। वह दीये को सम्हाले हुए है। और सारे महल का चक्कर लगा कर जब आया तब निश्चित हुआ। दीया रख कर उसने कहा कि महाराज, बचे। जान बची तो लाखों पाए। बुद्ध लौट कर घर को आए। यह तो एक जान पर ऐसी मुसीबत हो गई, हम फकीर आदमी और यह महल जरूर उपद्रव है, मगर दीये ने बचाया। सम्राट ने कहा, छोड़ो दीये की बात; तुम यह बताओ, कैसा लगा? उसने कहा, किसको फुरसत थी देखने की? जान पर फंसी थी। जान पर आ गई थी। दीया देखें कि महल देखें? कुछ देखा नहीं। सम्राट ने कहा, ऐसा करो, अब आ गए हो तो रात रुक जाओ। सुबह सत्संग कर लेंगे। तुम भी थके हो और यह महल का चक्कर भी थका दिया है। और मैं भी थक गया हूं।
बड़े सुंदर भवन में बड़ी बहुमूल्य शय्या पर उसे सुलाया। और जाते वक्त सम्राट कह गया कि ऊपर जरा खयाल रखना। ऊपर एक तलवार लटकी है। और पतले धागे में बंधी है—शायद कच्चे धागे में बंधी हो। जरा इसका खयाल रखना कि यह कहीं गिर न जाए। और इस तलवार की यह खूबी है कि तुम्हारी नींद लगी कि यह गिरी।
उसने कहा, क्यों फंसा रहे हो मुझको झंझट में? दिन भर का थका—मादा जंगल से चल कर आया, यह महल का उपद्रव और अब यह तलवार! सम्राट ने कहा, यह हमारी यहां की व्यवस्था है। मेहमान आता है तो उसका सब तरह का स्वागत करना। रात भर वह पड़ा रहा और तलवार देखता रहा। एक क्षण को पलक झपकने तक में घबडाए। कि कहीं तलवार भ्रांति से भी समझ ले कि सो गया और टपक पड़े तो जान गई। सुबह जब सम्राट ने पूछा तो वह तो आधा हो गया था सूखकर, कि कैसी रही रात? बिस्तर ठीक था?
उसने कहा, कहा की बातें कर रहे हो! कैसा बिस्तर? हम तो अपने झोपड़े में जहां जंगल में पड़े रहते थे वहीं सुखद था। ये तो बड़ी झंझटों की बातें हैं। रात एक दीया पकड़ा दिया कि अगर बुझ जाए तो खो जाओ। अब यह तलवार लटका दी। रात भर सो भी न सके, क्योंकि अगर यह झपकी आ जाए.. .उठ—उठ कर बैठ जाता था रात में। क्योंकि जरा ही डर लगे कि झपकी आ रही है कि तलवार टूट जाए। कच्चे धागे में लटकी है। गरीब आदमी हूं कहां मुझे फंसा दिया! मुझे बाहर निकल जाने दो। मुझे कोई सत्संग नहीं करना।
सम्राट ने कहा, अब तुम आ ही गए हो तो भोजन तो करके जाओ। सत्संग भोजन के बाद होगा। लेकिन एक बात तुम्हें और बता दूं कि तुम्हारे गुरु का संदेश आया है कि अगर सत्संग में तुम्हें सत्य का बोध न हो सके तो जान से हाथ धो बैठोगे। शाम को सूली लगवा देंगे। सत्संग में बोध होना ही चाहिए।
उसने कहा, यह क्या मामला है? अब सत्संग में बोध होना ही चाहिए यह भी कोई मजबूरी है? हो गया तो हो गया, नहीं हुआ तो नहीं हुआ। यह मामला…। तुम्हें राजाओं—महाराजाओं का हिसाब नहीं मालूम। तुम्हारे गुरु की आज्ञा है। हो गया बोध तो ठीक, नहीं हुआ बोध तो शाम को सूली लग जाएगी।
अब वह भोजन करने बैठा। बड़ा सुस्वादु भोजन है, सब है, मगर कहां स्वाद? अब यह घबड़ाहट कि तीस साल गुरु के पास रहे तब बोध नहीं हुआ, इसके पास एक सत्संग में बोध होगा कैसे? किसी तरह भोजन कर लिया। सम्राट ने पूछा, स्वाद कैसा— भोजन ठीक—ठाक? उसने कहा, आप छोड़ो। किसी तरह यहां से बच कर निकल जाएं, बस इतनी ही प्रार्थना है। अब सत्संग हमें करना ही नहीं है।
सम्राट ने कहा, बस इतना ही सत्संग है कि जैसे रात तुम दीया लेकर घूमे और बुझने का डर था, तो महल का सुख न भोग पाए, ऐसा ही मैं जानता हूं कि यह दीया तो बुझेगा, यह जीवन का दीया बुझेगा यह बुझने ही वाला है। रात दीये के बुझने से तुम भटक जाते। और यह जीवन का दीया तो बुझने ही वाला है। और फिर मौत के अंधकार में भटकन हो जाएगी। इसके पहले कि दीया बुझे, जीवन को समझ लेना जरूरी है। मैं हूं महल में, महल मुझमें नहीं है।
रात देखा, तलवार लटकी थी तो तुम सो न पाए। और तलवार प्रतिपल लटकी है। तुम पर ही लटकी नहीं, हरेक पर लटकी है। मौत हरेक पर लटकी है। और किस भी दिन, कच्चा धागा है, किसी भी क्षण टूट सकता है। और मौत कभी भी घट सकती है। जहां मौत इतनी सुगमता से घट सकती है वहां कौन उलझेगा राग—रंग में न: बैठता हूं राग—रंग में; उलझता नहीं हूं।
अब तुमने इतना सुंदर भोजन किया लेकिन तुम्हें स्वाद भी न आया। ऐसा ही मुझे भी। यह सब चल रहा है, लेकिन इसका कुछ स्वाद नहीं है। मैं अपने भीतर जागा हूं। मैं अपने भीतर के दीये को सम्हाले हूं। मैं मौत की तलवार को लटकी देख रहा हूं। फांसी होने को है। यह जीवन का पाठ अगर न सीखा, अगर इस सत्संग का लाभ न लिया तो मौत तो आने को है। मौत के पहले कुछ ऐसा पा लेना है जिसे मौत न छीन सके। कुछ ऐसा पा लेना है जो अमृत हो। इसलिए यहां हूं सब, लेकिन इससे कुछ भेद नहीं पड़ता।
यह जो जनक ने कहा : महल में हूं महल मुझमें नहीं है; संसार में हूं संसार मुझमें नहीं है, यह ज्ञानी का परम लक्षण है। वह कर्म करते हुए भी किसी बात में लिप्त नहीं होता। लिप्त न होने की प्रक्रिया है, साक्षी होना। लिप्त न होने की प्रक्रिया है, निस्तर्षमानस:। मन के पार हो जाना।
जैसे ही तुम मन के पार हुए, एकरस हुए। मन में अनेक रस हैं, मन के पार एकरस। क्योंकि मन अनेक है इसलिए अनेक रस हैं।  
                             

Jokes ....... Raseele Damdar New Hindi Chutkule

 ससुर : आइए दामाद जी, आज
अचानक कैसे दर्शन दे दिए ??
दामाद : आपकी बेटी से झगड़ा हो
गया था, वो बोली जहन्नुम में जाओ !!
.
.
.
.
पति: कहाँ गायब थी 4 घंटे से?
बीवी: मॉल में गयी थी, शॉपिंग करने.
पति: क्या क्या लिया?
बीवी: एक हेयर क्लिप और 45 सेल्फी .
.
.
.
.
.
शादी का लडडू खाकर लोग तब पछताते है,
.
.

जब बाहर नई-नई मिठाईया दिखाई देती है,.
.
.
.
.
चौधराइन ने चौधरी से कहा...
"अब तू हुक्का मत पिया कर..."
चौधरी बोला...
"रै बावली... तन्नै  के पता...
इसमें तीन देवता निवास करैं सैं...
नीचे जल देवता, बीच में पवन देव...
और ऊपर अग्नि देवता...!!"
अब चौधरी हुक्का पीता है, और...
चौधराइन हाथ जोड़ के बैठी रहती है...!!
.
.
.
.
"दाऊद बम ब्लास्ट करके भाग गया..."
"माल्या 9000 करोड़ लेके भाग गया.."
.
.
.
और पुलिस पकड़ेगी किसको??
जो "हेलमेट" नहीं पहनते..!
.
.
.
.
जो लोग कहते हैं
औरतें कमज़ोर होती हैं,

सर घुमा के कहीं भी देखिए ज़रा।
हर तरफ दीवारें
‘मर्दाना कमज़ोरी के इश्तेहारों से पटी पड़ी हैं ।
सारा भ्रम टूट जायेगा !
.
.
.
.
गुरु :   चाणक्य ने कहा था..
आपको एक ही दुश्मन से
बार-बार युद्ध नही लड़ना चाहिए
वरना आप अपने तमाम 'युद्ध कौशल'
उसे सिखा देंगे।
पति पत्नी के संबंधो में भी
यही होता है।
दोनों योद्धा जिन्दगी भर
लड़ते-लड़ते एक दुसरे के
वारों से इतना परिचित हो जाते हैं
कि युद्ध जिन्दगी भर
चलता रहता है
पर हल कुछ निकलता नही।
शिष्य :  तो फिर गुरुजी, क्या करना चाहिए?
गुरु :  दुश्मन
बदलते
रहना 
चाहिये।
.
.
.
.
 इसी बीच केजरीवाल जी का ट्वीट आया है कि.....
मोदी जी ने उन्हें अभी तक नही मारा....
.
.
.
.
.
.
इसलिए कि वो मुझें तड़पा तड़पा कर मारेंगे !!.
.
.
.
.
खाना खाने बैठे पति ने पत्नि को आवाज लगाई -
"अरी सुनती हो...भाग्यवान...! ये जो तुमने सब्जी बनाई है इसे क्या कहते हैं ? "
पत्नि :- " क्यों किसलिये पूछ रहे हो ? "
.
पति :- " अरे भाई मुझसे भी तो स्वर्ग में पूछा जायेगा...........
क्या खा के मरे थे !!
.
.
.
.
पत्नी  : "घर क्यों नहीं आये अब तक?"
पति : "जाम लगा है"
पत्नी  : "ओह!! कब तक आओगे फिर?"
पति : "अभी तो पहला ही लगा है"
.
.
.
.
.
डॉ.: ( पेशंट के पति से)
आज कैसी तबियत है
आपकी पत्नी की ?
पति: ठीक है डॉक्टर;
सुबह तो थोडा लड़ी भी !!
 

Jokes ............ कॉन्फिडेन्स

बन्दे का कॉन्फिडेन्स देखिये......
मनपसंद मरम्मत का काम होने की खुशी में एक सज्जन ने मिस्त्री को 1000 रुपये की बख्शीश देते हुए कहा :
"जा, तू भी क्या याद करेगा..!!
आज शाम को वाइफ को सिनेमा ले जा और उसके बाद किसी रेस्तरां में खाना खा...!!"
शाम को दरवाजे की घंटी बजी
दरवाजा खोला तो मिस्त्री साफ-सुथरे कपडे पहने खडा था...!!!
सज्जन ने उसे सिर से पैर तक देखा और पूछा :
"कहिये मिस्त्री जी?"
मिस्त्री:जी,
आपकी वाइफ को लेने आया हूं ......!!

Jokes.................. प्रेम पत्र

प्रेम पत्र


Love letter by a Kanpuriya
कानपुर की मनोहर कहानियां
छठवीं किस्त
शोभा के नाम, रिंकू गुप्ता का प्रेम पत्र
ॐ श्री गणेशाय नमः
प्यारी शोभा,
यहां सब कुछ कुशल मंगल से हैं, आशा करते हैं कि तुम्हारे वहां भी सब कुछ कुशल मंगल ही होगा. आगे समाचार यह है कि हम तुम्हारे प्रेम में पगला के, ये वाला ख़त भी अपने खून से लिख रहे हैं, पिछले चार ख़त भी खून से लिखे थे पर शायद तुमने उसे लाल रंग के जेल पेन की स्याही समझ लिया.

इस मर्तबा बताना जरूरी था क्योंकि तुम तो हमारे प्यार को नोटिस ही नहीं कर रही हो और हमें यहां खून से ख़त लिख-लिख के कमज़ोरी चढ़ गई है. दोस्त अलग डरा रहे हैं कि टिटनेस हो जाएगा. लेकिन हमें परवाह नहीं शोभा. इससे ज्यादा खून तो कानपुर में मच्छर ही चूस लेते हैं. डेंगू, चिकनगुनिया क्या टिटनेस से कम जहर बीमारी है ?

शोभा, तुम बस हमारे किसी एक प्रेम पत्र का जवाब तो दे दो. जब से तुम्हारे प्रेम में पड़े हैं दुकानदारी में एकदम मन नहीं लगता है. कल रिन साबुन और व्हील के वाशिंग पाउडर का हिसाब गड़बड़ा गया तो पिता जी ने हमें कूट दिया. कहिते हैं कि बनिया आदमी को प्यार करना है तो बहीखाता से करे, फुटकर, चवन्नी अठन्नी से करे. उस पर जब मम्मी ने कहा कि तुम्हें इस उमर में बाप से लप्पड़ खाना शोभा देता है? तो मम्मी कसम हमारी रुलाई छूट गई. शोभा, ऐसा लगता है हर जगह तुम्हारा ही ज़िक्र हो रहा है.
हम तुमको हमेशा ख़ुश रखेंगे. विकास अगरवाल का चक्कर छोड़ दो वो तुमको कतई ख़ुश नहीं रख पाएगा. कितना भी अंग्रेजी बोल ले, काम तो कॉल सेंटर में ही करता है. चाल चलन भी ठीक नहीं है, एक नंबर का लौंडियाबाज लड़का है. अक्सर सिफी के इंटरनेट कैफे जाके बंद वाले केबिन में बैठकर बीस रुपया घंटा का इंटरनेट करता है. रोज़ शाम पीपीएन कॉलेज और शीलिंग हाउस के बाहर तफ़री काटने जाता है. अब ये तो सबको पता है कि वहां की लडकियां कित्ती छोटी स्कर्ट पहनती हैं.

हमें अंग्रेज़ी भले नहीं आती लेकिन करेक्टर के सच्चे हैं और किसी के नौकर नहीं हैं, हमारी ख़ुद की दुकान है, हमसे शादी करके रानी की तरह रहोगी, दुकान से जितना जी चाहे फ़्री में क्रीम, शैम्पू, पाउडर इस्तेमाल करना, दाल, चावल, शक्कर, चाय, दूध, परचून की कभी कमी नहीं रहेगी. घर में जनरेटर है, तीन फेस से बिजली लगी है, ख़ुद की अस्सी फुट गहरी बोरिंग खुदी है, बाप की तबियत अक्सर ख़राब रहती है और हम घर के अकेले लड़के हैं. शादी कर लोगी तो हमाए साथ स्वरुप नगर में आराम से रहोगी, अभी बर्रा दो में रहती हो, वहां कितनी किचकिच है. जगह जगह भैंस के चट्टे खुल गए हैं और नाला अलग महकता है. अभी हाजी मुश्ताक सोलंकी स्वरुप नगर से विधायक हो जाएंगे तो छेत्र का विकास और बम्पर हो जाएगा.
शोभा आख़िर में बस यही कहना चाहते हैं कि प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है. और तुमसे मिलकर न जाने क्यों और भी कुछ याद आता है. याद तेरी आएगी, मुझको बड़ा सताएगी, जिद ये झूठी तेरी, मेरी जान लेके जाएगी. बस इतना समझ लो कि तुम्हारे बिना रहना दुस्वार हो गया है. या तो जेड स्क्वायर मॉल आकर हमसे मिल लो, या फिर हमें सल्फास की गोली ख़रीद कर दे दो, घर में फिनाइल है, पर क्या पता फिनाइल पीने से जान निकले न निकले, ख़ाली झाग छोड़ के बिहोश हो जाएं.
इसी के साथ चिट्ठी रख रहे हैं. कलाई पिरा रही है, कमज़ोरी लग रही है. उत्तर की आस में.
विशाल गुप्ता