Tuesday, 26 July 2016

Beware of those who do not drink alcohol .................


एक राजमहल में कामवाली और उसका भतीजा काम करते थे...।
एक दिन राजमहल में कामवाली के भतीजे को हीरा मिलता है, तो वो उसको बताता है.
कामवाली होशियारी से वो हीरा बाहर फेंककर, कहती है ये कांच है हीरा नहीं.
कामवाली घर जाते वक्त चुपके से वो हीरा उठाकर ले जाती है.
वह सुनार के पास जाती है...
सुनार समझ जाता है इसको कहीं मिला होगा, ये असली या नकली पता नहीं, इसलिए पूछने आ गई.
सुनार भी होशियारी से वो हीरा बाहर फेंक कर कहता है ये कांच है हीरा नहीं.
कामवाली लौट जाती है.
सुनार वो हीरा चुपके से उठाकर जौहरी के पास ले जाता है,
जौहरी हीरा पहचान लेता है.अनमोल हीरा देखकर उसकी नीयत बदल जाती है.
वो भी हीरा बाहर फेंक कर कहता है ये कांच है हीरा नहीं.
जैसे ही जौहरी हीरा बाहर फेंकता है...उसके टुकड़े टुकड़े हो जाते हैं.
हीरे के पास जाकर किसी ने पूछा...
कामवाली और सुनार दोनों ने तुम्हे फेंका...तब तो तुम नहीं टूटे... फिर अब कैसे टूटे..?
हीरा बोला....
कामवाली और सुनार दोनों ने मुझे फेंका क्योंकि...वो मेरी असलियत से अनजान थे.
लेकिन....
जौहरी तो मेरी असलियत जानता था...तब भी उसने मुझे बाहर फेंक दिया...यह दुःख मैं सहन ना कर सका...इसलिए मै टूट गया...
दोस्तों , ऐसा ही...
हम मनुष्यों के साथ भी होता है..!
जो लोग आपको जानते है, उसके बावजूद भी आपका दिल दुःखाते हैं
तब यह आप सहन नहीं कर पाते..!
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हर हर महादेव ओम नमः शिवाय
एक शिष्य अपने गुरूजी से पूछा:
नष्ट होने वाले इस शरीर में नष्ट ना होने वाला आत्मा कैसे रहती
है।
गुरूजी का जवाब:
दूध उपयोगी है, किंतु एकही दिन के लिए। फिर वो बिगड जाता
है।
दूध में एक बूंद छाछ डालने से वह दही बन जाता है। जो केवल एक
और दिन टिकता है।
दही का मंथन करने पर मक्खन बन जाती है। यह एक और दिन
टिकता है।
मक्खन को उबालकर घी बनता है।
घी कभी बिगढता नहीं।
एक दिन में बिगढने वाले दूध में न बिगढने वाला घी छिपा है।
इसी तरह अशाश्वत शरीर में शाश्वत आत्मा रहती है।
मानव शरीर दूध
दैवी स्मरण छांछ
सेवा भाव मक्खन
साधन करना घी
मानव शरीर को साधन से पिघलाने पर आत्मा पवित्रता प्राप्त
करती है।
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Really worth reading.... changes our regular way of rational thinking.
A perfect example for the dilemma we often face in any decision making.
A group of children were playing near two railway tracks, one still in use while the other not.
Only one child played on the unused track, the rest on the operational track.
A train is coming, and you are just beside the track interchange. You can make the train change its course to the unused track and save most of the kids.
However, that would also mean the lone child playing by the unused track would be sacrificed.
Or would you rather let the train go its way?
Let's take a pause to think what kind of decision we could make................
have u thought enough !!!!
Most people might choose to divert the course of the train, and sacrifice only one child. Save most of the children at the expense of only one child was rational decision most people would make, morally and emotionally.
But, have you ever thought that the child chose to play on the unused track had in fact made the right decision to play at a safe place?
Nevertheless, he had to be sacrificed because of his ignorant friends who chose to play where the danger was.
This kind of dilemma happens around us everyday. In the office, community, in politics and especially in a democratic society, the RIGHT is often sacrificed for the interest of the majority, no matter how foolish or ignorant the majority are, and how far-sighted and knowledgeable the wise are.
The great critic Leo Velski Julian who told the story said he would not try to change the course of the train because he believed that the kids playing on the operational track were aware that the track was still in use, and that they would run away when they hear the train's sirens.
Now, If the train was diverted, that lone child would definitely die because he never expects that a train could come over on the unused track!
Further, that track was not in use probably because it was not safe. If the train was diverted to such a track, we may put the lives of all passengers on board at stake! And in our attempt to save few kids thinking that the train may run over them, we might end up sacrificing hundreds of people.
While we are all aware that life is full of tough decisions that need to be made, we may not realize that hasty decision may not always be the right one.
"What's Right isn't always popular..
and what's popular isn't always Right."
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To all liquor loverzzzz:
It takes only one drink to get me drunk. The trouble is, I can't remember if it's the thirteenth or the fourteenth.
- George Burns
I envy people who drink. At least they know what to blame everything on.
~Oscar Levant
I take a drink only on two occasions, when I'm thirsty and when I'm not.
~Brendan Behan
Alcohol may be man's worst enemy, but the Bible says love your enemy!
~Frank Sinatra
I have taken more out of alcohol than alcohol has taken out of me.
~Winston Churchill
Beauty is in the eye of the beer holder!
-Kinky Friedman
Dear Alcohol,
We had a deal, you were going to make me funnier, sexier, more intelligent and a better dancer. I saw the video, we need to talk.
-Anonymous
I used to think, drinking was bad for me. So I gave up thinking.
-Anonymous
I would date you, but my heart already belongs to Johnny Walker.
-Anonymous
Sometimes I drink water to surprise my liver.
-Anonymous
You look like I need another drink! 
-Anonymous
I say 'NO' to alcohol, but it just doesn't listen.
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A recent joint study conducted by the Department of Health and the Department of Motor Vehicles indicates that 23% of traffic accidents are alcohol related.
    
This means that the remaining 77% are caused by idiots who just drink tea, coffee, carbonated drinks, juices, yoghurt and things like that.

Therefore, beware of those who do not drink alcohol. They cause three times as many accidents!!!
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चाणक्य निती.....
कठोर है लेकिन सत्य है!
1- माचिस किसी दूसरी चीज
को जलाने से पहले खुद
को जलाती हैं..!
गुस्सा भी एक माचिस की तरह है..!
यह दुसरो को बरबाद करने से पहले
खुद को बरबाद करता है...
2- आज का कठोर व कङवा सत्य !!
चार रिश्तेदार एक दिशा में
तब ही चलते हैं ,
जब पांचवा कंधे पर हो...
3- कीचड़ में पैर फंस जाये तो नल के पास जाना चाहिए
मगर,
नल को देखकर कीचड़ में नही जाना चाहिए,
इसी प्रकार...
जिन्दगी में बुरा समय आ जाये
तो...
पैसों का उपयोग करना चाहिए
मगर...
पैसों को देखकर बुरे रास्ते पर नही जाना चाहिए...
4- रिश्तों की बगिया में एक रिश्ता नीम के पेड़ जैसा भी रखना,
जो सीख भले ही कड़वी देता हो पर
तकलीफ में मरहम भी बनता है...
5- परिवर्तन से डरना और संघर्ष से कतराना,
मनुष्य की सबसे बड़ी कायरता है...
6- जीवन का सबसे बड़ा गुरु वक्त होता है,
क्योंकि जो वक्त सिखाता है वो कोई नहीं सीखा सकता...
7- बहुत ही सुन्दर वर्णन है-
मस्तक को थोड़ा झुकाकर देखिए....अभिमान मर जाएगा
आँखें को थोड़ा भिगा कर देखिए.....पत्थर दिल पिघल जाएगा
दांतों को आराम देकर देखिए.........स्वास्थ्य सुधर जाएगा
जिव्हा पर विराम लगा कर देखिए.....क्लेश का कारवाँ गुज़र जाएगा
इच्छाओं को थोड़ा घटाकर देखिए......खुशियों का संसार नज़र आएगा...
8- पूरी जिंदगी हम इसी बात में गुजार देते हैं कि "चार लोग क्या कहेंगे",
और अंत में चार लोग बस यही कहते हैं कि "राम नाम सत्य है"...
यही जीवन का सच है!
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आंख और आंख के पीछे तुम्हारी देखने की क्षमता
आंख नहीं देखती है; आंख के भीतर से तुम्हारी दृष्टि देखती है। इसलिए कभी कभी ऐसा हो जाता है कि तुम खुली आंख बैठे हो, कोई रास्ते से गुजरता है और दिखाई नहीं पड़ता; क्योंकि तुम्हारी दृष्टि कहीं और थी; तुम किसी और सपने में खोए थे भीतर; तुम कुछ और सोच रहे थे। आंख बराबर खुली थी, जो निकला उसकी तस्वीर भी बनी; लेकिन आंख और दृष्टि का तालमेल नहीं था; दृष्टि कहीं और थी वह कोई सपना देख रही थी, या किसी विचार में लीन थी।
तुम्हारे घर में आग लग गई है। तुम भागे बाजार से चले आ रहे हो। रास्ते पर कोई जयरामजी करता है सुनाई तो पड़ता है, पता नहीं चलता; कान तो सुन लेते हैं, लेकिन कान के भीतर से जो असली सुनने वाला है, वह उलझा है। मकान में आग लगी है दृष्टि वहां है। तुम भागे जा रहे हो, किसी से टकराहट हो जाती है पता नहीं चलता। पैर में कांटा गड़ जाता है दर्द तो होता है, शरीर तो खबर भेजता है; पता नहीं चलता। जिसके घर में आग लगी हो, उसको पैर में गड़े कांटे का पता चलता है?
इसलिए छोटे दुख को मिटाने की एक ही तरकीब है: बड़ा दुख। फिर छोटे दुख का पता नहीं चलता। इसीलिए तो लोग दुख खोजते हैं। बड़े दुख के कारण छोटे दुख का पता नहीं चलता। फिर दुखों का अंबार लगाते जाते हैं। ऐसे ही तो तुमने अनंत जन्मों में अंनत दुख इकट्ठे किए हैं। क्योंकि तुम एक ही तरकीब जानते हो; अगर कांटे का दर्द भुलाना हो तो और बड़ा कांटा लगा लो; घर में परेशानी हो, दुकान की परेशानी खड़ी कर लो घर की परेशानी भूल जाती है; दुकान में परेशानी हो, चुनाव में खड़े हो जाओ दुकान की परेशानी भूल जाती है। बड़ी परेशानी खड़ी करते जाओ। ऐसे ही आदमी नरक को निर्मित करते हैं। क्योंकि एक ही उपाय दिखाई पड़ता है यहां कि छोटा दुख भूल जाता है, अगर बड़ा दुख हो जाए।

मकान में आग लगी हो, पैर में लगा कांटा पता नहीं चलता। क्यों? कांटा गड़े तो पता चलना चाहिए। हॉकी के मैदान पर युवक खेल रहा है; पैर में चोट लग जाती है, खून की धारा बहती है पता नहीं चलता। खेल बंद हुआ, रेफरी की सीटी बजी एकदम पता चलता है। अब मन वापस लौट आया दृष्टि आ गई।
तो ध्यान रखना, तुम्हारी आंख और आंख के पीछे तुम्हारी देखने की क्षमता अलग चीजें हैं। आंख तो खिड़की है, जिससे खड़े होकर तुम देखते हो। आंख नहीं देखती; देखनेवाला आंख पर खड़े होकर देखता है। जिस दिन तुम्हें यह समझ में आ जाएगा कि देखनेवाला और आंख अलग हैं; सुननेवाला और कान अलग हैं: उस दिन कान को छोड़कर सुननेवाला भीतर जा सकता है; आंख को छोड़कर देखनेवाला भीतर जा सकता है इंद्रिय बाहर पड़ी रह जाती है। इंद्रिय की जरूरत भी नहीं है। अतीन्द्रिय, तुम अपने परम बोध को अनुभव करने लगते हो; अपनी परम सत्ता की प्रतीति होने लगती है।
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पिंजरे का तोता
एक समय की बात हैं, एक सेठ और सेठानी रोज सत्संग में जाते थे। सेठजी के एक घर एक पिंजरे में तोता पाला हुआ था। तोता रोज सेठ-सेठानी को बाहर जाते देख एक दिन पूछता हैं कि सेठजी आप रोज कहाँ जाते है। सेठजी बोले कि भाई सत्संग में ज्ञान सुनने जाते है। तोता कहता है सेठजी फिर तो कोई ज्ञान की बात मुझे भी बताओ। तब सेठजी कहते हैं की ज्ञान भी कोई घर बैठे मिलता हैं। इसके लिए तो सत्संग में जाना पड़ता हैं। तोता कहता है कोई बात नही सेठजी आप मेरा एक काम करना। सत्संग जाओ तब संत महात्मा से एक बात पूछना कि में आजाद कब होऊंगा।
सेठजी सत्संग ख़त्म होने के बाद संत से पूछते है की महाराज हमारे घर जो तोता है उसने पूछा हैं की वो आजाद कब होगा? संत को ऐसा सुनते हीं पता नही क्या होता है जो वो बेहोश होकर गिर जाते है। सेठजी संत की हालत देख कर चुप-चाप वहाँ से निकल जाते है।
घर आते ही तोता सेठजी से पूछता है कि सेठजी संत ने क्या कहा। सेठजी कहते है की तेरे किस्मत ही खराब है जो तेरी आजादी का पूछते ही वो बेहोश हो गए। तोता कहता है कोई बात नही सेठजी में सब समझ गया।
दूसरे दिन सेठजी सत्संग में जाने लगते है तब तोता पिंजरे में जानबूझ कर बेहोश होकर गिर जाता हैं। सेठजी उसे मरा हुआ मानकर जैसे हीं उसे पिंजरे से बाहर निकालते है तो वो उड़ जाता है। सत्संग जाते ही संत सेठजी को पूछते है की कल आप उस तोते के बारे में पूछ रहे थे ना अब वो कहाँ हैं। सेठजी कहते हैं, हाँ महाराज आज सुबह-सुबह वो जानबुझ कर बेहोश हो गया मैंने देखा की वो मर गया है इसलिये मैंने उसे जैसे ही बाहर निकाला तो वो उड़ गया।
तब संत ने सेठजी से कहा की देखो तुम इतने समय से सत्संग सुनकर भी आज तक सांसारिक मोह-माया के पिंजरे में फंसे हुए हो और उस तोते को देखो बिना सत्संग में आये मेरा एक इशारा समझ कर आजाद हो गया।
इस कहानी से तात्पर्य ये है कि हम सत्संग में तो जाते हैं ज्ञान की बाते करते हैं या सुनते भी हैं, पर हमारा मन हमेशा सांसारिक बातों में हीं उलझा रहता हैं। सत्संग में भी हम सिर्फ उन बातों को पसंद करते है जिसमे हमारा स्वार्थ सिद्ध होता हैं। हमे वहां भी मान यश मिल जाये यही सोचते रहते हैं। जबकि सत्संग जाकर हमें सत्य को स्वीकार कर सभी बातों को महत्व देना चाहिये और जिस असत्य, झूठ और अहंकार को हम धारण किये हुए हैं उसे साहस के साथ मन से उतार कर सत्य को स्वीकार करना चाहिए।

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