Wednesday, 17 February 2016

"न था कुछ तो ख़ुदा था , कुछ न होता, तो ख़ुदा होता डुबोया मुझको होने ने , न मै होता तो क्या होता "

गली क़ासिम में आकर ,
तुम्हारी ड्योढ़ी पे रुक गया हूँ मिर्ज़ा नौशा
तुम्हे आवाज़ दूँ , पहले ,
चली जाएँ ज़रा , परदे में उमराव , तो फिर अंदर कदम रखूँ


चिलमची लोटा सैनी उठ गए हैं 
बरसता था जो दो घंटे को मेह 
छत चार घंटे तक बरसती थी 
उसी छलनी सी छत की , अब मरम्मत हो रही है



सदी से कुछ ज्यादा वक़्त आने में लगा , अफ़सोस है मुझको 
असल में घर के बहार कोयलों के टाल की स्याही लगी थी , वह मिटानी थी 

उसी में बस , कई सरकारें बदली है , तुम्हारे घर पहुँचने में


जहाँ कल्लन को ले के बैठते थे , याद है बलाई मंज़िल पर 
लिफ़ाफ़े जोड़ते थे तुम लेई से ,
ख़तों की कश्तियों में , उर्दू बहती थी 
अछूते साहिल , उर्दू नस्ल छूने लग गयी थी


वहीं बैठेगा कंप्यूटर 
वहीं से लाखों ख़त भेजा करेगा 

तुम्हारे दस्त-ख़त जैसे वो खुश ख़त तो नहीं होंगे , मगर फिर भी 
परस्तारों की गिनती भी , असद अब तो करोड़ों है


तुम्हारे हाथ के लिखे सफ़हात रखे जा रहे हैं 
तुम्हे तो याद होगा 

मसवदा , जब रामपुर से , लखनऊ से , आगरा तक घूमा करता था 
शिकायत थी तुम्हे - 
"यार अब न समझे हैं , न समझेंगे ,वो मेरी बात 
उन्हें दिल और दे , या मुझको जबाँ और ..


ज़माना हर जुबाँ में पढ़ रहा , 
अब तुम्हारे सब सुख़न ग़ालिब 
समझते कितना हैं … 

ये तो वो ही समझें , या तुम समझो


यहीं शीशों में लगवाए गए हैं … 
पैराहन , अब कुछ तुम्हारे . 

ज़रा सोचो तो , किस्मत , चार गिरह कपड़े की , अब ग़ालिब 
की थी किस्मत , ये उस कपड़े की , ग़ालिब का गिरेबां था …


तुम्हारी टोपी रखी है 
जो अपने दौर से ऊंची पहनते थे
तुम्हारे जूते रखे हैं 
जिन्हे तुम हाथ में लेकर निकलते थे 

शिकायत थी कि 
"सारे घर को ही मस्जिद बना रखा है बेग़म ने "


तुम्हारा बुत भी लगवा दिया है 
ऊँचा कद दे कर 

जहाँ से देखते हो , अब तो 
सब बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल लगता है


सभी कुछ है मगर नौशा 
अगरचे जानता हूँ ,

हाथ में जुम्बिश नहीं बुत के …
तुम्हारे सामने एक साग़र-ओ-मीना तो रख देते


बस एक आवाज़ है 
जो गूँजती रहती हैअब घर में 
"न था कुछ तो ख़ुदा था , कुछ न होता, तो ख़ुदा होता 
डुबोया मुझको होने ने , न मै होता तो क्या होता "










जेएनयू परिसर में राष्ट्रद्रोही प्रदर्शन करने वाले छात्रसंगठनो और उनका पक्ष लेते राजनेताओं से देश को सावधान करती नई कविता

जेएनयू परिसर में राष्ट्रद्रोही प्रदर्शन करने वाले छात्रसंगठनो और उनका पक्ष लेते राजनेताओं से देश को सावधान करती  नई कविता

रचनाकार-कवि गौरव चौहान इटावा  


खतरे का उदघोष बजा है,रणभूमी तैयार करो,
सही वक्त है,चुन चुन करके,गद्दारों पर वार करो,



आतंकी दो चार मार कर हम खुशियों से फूल गए,
सरहद की चिंताओं में हम घर के भेदी भूल गए,



सरहद पर कांटे हैं,लेकिन घर के भीतर नागफनी,
जिनके हाथ मशाले सौंपी,वो करते है आगजनी,



ये भारत की बर्बादी के कसे कथानक लगते हैं,
सच तो है दहशतगर्दों से अधिक भयानक लगते हैं,



संविधान ने सौंप दिए हैं अश्त्र शस्त्र आज़ादी के,
शिक्षा के परिसर में नारे भारत की बर्बादी के,



अफज़ल पर तो छाती फटती देखी है बहुतेरों की,
मगर शहादत भूल गए हैं सियाचीन के शेरों की,



जिस अफज़ल ने संसद वाले हमले को अंजाम दिया,
जिस अफज़ल को न्यायालय ने आतंकी का नाम दिया,



उस अफज़ल की फांसी को बलिदान बताने निकले हैं,
और हमारे ही घर में हमको धमकाने निकले हैं,



बड़ी विदेशी साजिश के हथियार हमारी छाती पर,
भारत को घायल करते गद्दार हमारी छाती पर,



नाम कन्हैया रखने वाले,कंस हमारी छाती पर,
माल उड़ाते जयचंदों के वंश हमारी छाती पर,



लोकतंत्र का चुल्लू भर कर डूब मरो तुम पानी में,
भारत गाली सह जाता है खुद अपनी रजधानी में,




आज वतन को,खुद के पाले घड़ियालों से खतरा है,
बाहर के दुश्मन से ज्यादा घर वालो से खतरा है,



देशद्रोह के हमदर्दी हैं,तुच्छ सियासत करते है,
और वतन के गद्दारों की खुली वकालत करते है,



वोट बैंक की नदी विषैली,उसमे बहने वाले हैं,
आतंकी इशरत को अपनी बेटी कहने वाले हैं,



सावधान अब रहना होगा वामपंथ की चालों से,
बच कर रहना टोपी पहने ढोंगी मफलर वालों से,



राष्ट्रवाद के रखवालों मत सत्ता का उपभोग करो,
दिया देश ने तुम्हे पूर्ण,उस बहुमत का उपयोग करो,



हम भारत के आकाओं की ख़ामोशी से चौंके हैं,
एक शेर के रहते कैसे कुत्ते खुलकर भौंके हैं,



मन की बाते बंद करो,मत ज्ञान बाँटिये मोदी जी,
सबसे पहले गद्दारों की जीभ काटिये मोदी जी,



नहीं तुम्हारे बस में हो तो,हमें बोल दो मोदी जी,
संविधान से बंधे हमारे हाथ खोल दो मोदी जी,



अगर नही कुछ किया,समूचा भार उठाने वाले हैं,
हम भारत के बेटे भी हथियार उठाने वाले हैं,

----कवि गौरव चौहान