Monday, 6 June 2016

Poem........ मथुरा कांड - साजिश या कुछ और?

( मथुरा कांड - साजिश या कुछ और? )
कवि - मयंक शर्मा ( 09302222285 )

माखन मिसरी की नगरी में विष की फसलें बोई हैं
कृष्ण कन्हैया की नगरी में आज बांसुरी रोई है

'बाग जवाहर' में कांटो ने नंगा नाच मचाया है
खूनी भंवरों ने माली को नोच नोच कर खाया है

वह गुंडों का एक हुजूम था उसे भीड़ का नाम न दो
दानव को दानव ही मानो मानव सा सम्मान ना दो

'रामवृक्ष ' की जड़ में जब सरकारी पानी जाता है
मिट्टी जख्मी होती है और एक रावण उग आता है

'नेताजी' तेरी नियत में खोट दिखाई देता है
गुंडों में भी तुझको अपना वोट दिखाई देता है

गुंडों के आगे खाकी वर्दी के लाल बिछाए हैं
वोटों की खातिर अवैध कब्जों के जाल बिछाए हैं

वोटों के संख्या बल ने सब गड़बड़झाले डाले हैं
दो हंसों को मरने देकर कितने कौएँ पाले हैं?

दो सपूत की मौत का जिम्मा किसके सर पर जाएगा
क्या सरकारी अनुदानों से बेटा वापस आएगा ?

'नेताजी' तुमने तो सारा तंत्र फेल कर डाला है
राजनीति को तुमने गुंडों की रखैल कर डाला है

आजम खाँ की भैंस का चक्कर या जूतों की ठोकर है
खाकी वर्दी की हालत ' मुजरे वाली ' से बदतर है

सच्चे लोगों का सम्मान बचाना बहुत जरूरी है
या ऐसी सरकारों का गिर जाना बहुत जरुरी है.

कवि - मयंक शर्मा
           दुर्ग  ( छत्तीसगढ़ )

  

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