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Friday, 8 January 2016

मालदा प0 बंगाल में 2.5लाख मुस्लिमो की भीड़ द्वारा हिंसा और दहशत का नंगा नाच करने पर देश को सचेत करती ताज़ा कविता

मालदा प0 बंगाल में 2.5लाख मुस्लिमो की भीड़ द्वारा हिंसा और दहशत का नंगा नाच करने पर देश को सचेत करती  ताज़ा कविता

रचनाकार-कवि गौरव चौहान इटावा उ प्र 


ऐ भाई!तू भारत माँ के सीने की घबराहट सुन,
सोमनाथ पर हावी होती गजनबियों की आहट सुन,



नारा ए तकबीर लगाती भीड़ देख लो लाखों की,
जिन आँखों में राम कृष्ण हैं,खैर नही उन आँखों की,



पहले पढ़ी नमाज़ बाद में आगजनी-बम-गोली थी,
लगता है पूरी की पूरी तालिबान की टोली थी,



ये भारत के मुसलमान हैं,या गुंडे अफगानी हैं
इनके आगे संविधान,कानून सभी बेमानी हैं,



माना ये गुस्सा हो बैठे,उस बयान कमलेशी पर,
बंद हुआ वो आज जेल में,खड़ा हुआ है पेशी पर,



सजा अदालत देगी,ये भी छोड़ें आज अदालत पर,
रखो शरीयत घर में,ऐसे उतरें नही बगावत पर,



लेकिन ये तो टोपी जालीदार पहनकर कूद गए,
अमन शांति भाईचारे पर अपनी आँखे मूँद गए,



दरवाज़ों पर ॐ लिखा ,तो वही घराना फूंक दिया,
इतने थे बेख़ौफ़ मियां जी,पूरा थाना फूंक दिया,



सिर्फ निशाना हिन्दू ही क्यों,चुन चुन कर के पीटे थे,
और मुसाफिर बस के नीचे कॉलर पकड़ घसीटे थे,



फौजी वाहन से भी नफरत?क्यों कर आग लगाई थी?
पूरी भीड़ अचानक कैसे एक साथ बौराई थी,



अगर वजह कमलेश रहा है,सारे हिन्दू दोषी क्यों?
तो फिर अफजल भटकल दाऊद पर छायी ख़ामोशी क्यों?



क्या हम भी ये चेहरे लेकर इनके घर पर टूट पढ़ें?
और एक गुजरात बना दें,भगवा लेकर छूट पढ़ें?



ये गौरव चौहान कहे,हम तो बस प्रेम पुजारी हैं 
हैं कलाम के दीवाने हम,सबसे रखते यारी हैं,



लेकिन भीड़ मालदा वाली तो कुछ और बताती है,
तैमूरी फितरत या औरंगजेबी दौर बताती है,



आईएस सरीखे लगता ये जिहाद में डूबे हैं,
और शरीयत लागू करना,इन सबके मंसूबे हैं,



भीड़ नही ये धमकी समझो संविधान के सीने पर,
प्रश्न चिन्ह है राम राम कहने वालों के जीने पर,



जिन्हें सिर्फ असहिष्णु लगी थी भीड़ दादरी वाली जी,
आज मालदा पर चुप हैं,अब कहाँ गए हड़ताली जी,



पुरस्कार वापस करने वाले किस बिल में समा गए,
आमिर शारुख अपने मुँह में दही अचानक जमा गए,



हमने कपड़ें सौंप दिए हैं,पेशावर के दर्ज़ी को,
भूल हुयी जो दुर्गा समझा इस ममता बैनर्जी को,



अगर सनातन बटाँ रहा यूँ इन्ही सियासी मुखड़ों में,
तिलक मिटेगा और जनेऊ कटा मिलेगा टुकड़ों में,



जागो,वर्ना राम न होंगे,तुलसी के अरमानो में,
काफिर बनकर पड़े रहोगे,बाबर के तहखानों में,

------कवि गौरव चौहान 




















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