Sunday, 8 November 2015

पहले दिल्ली निकल गई उसके बाद बिहार गया। देख सियारों के टोले से एक सिंह फिर हार गया।

पहले दिल्ली निकल गई उसके बाद बिहार गया।
देख सियारों के टोले से एक सिंह फिर हार गया।

15वर्ष के जिस शासन को राज-ऐ-जंगल कहते थे।
ख़ून डकैती और फ़िरौती ख़ूब बिहारी सहते थे।

राजभवन के गलियारों में घूस के नाले बहते थे।
पशुओं का चारा खाने के लिए जेल जो रहते थे।

आज उसीका राज पुनः स्थापित कर बिहार गया।
देख सियारों के टोले से एक सिंह फिर हार गया।

एक सुनहरे कल को जिसने आशावान निहारा था।
साथ मिलाकर कन्धा जिसने जंगलराज सुधारा था।

क्योंफिर उसने हटाके कन्धा ठग को एक पुकारा था।
क्या वो इतना बेचारा था और न कोई चारा था?

कुर्सी खातिर नीयत से समझौता कर कुमार गया।
देख सियारों के टोले से एक सिंह फिर हार गया।

महाठगबंधन की नौका में देखो कितने पाल रहे।
पप्पू चप्पू चला रहे और हवा हेकड़ीवाल रहे।

ठान लिया था अब कौरव ने चक्रव्यूह का जाल रहे।
अभी तो मिलके वोट बटोरो पीछे जो भी हाल रहे।

अपनी नौका में इक "माँझी" लेके लौह पतवार गया।
देख सियारों के टोले से एक सिंह फिर हार गया।

चक्रव्यूह की इस रचना में नहीं थे नेता ही केवल।
साथ निभाया अभिनेता ने और मीडिया का था बल।

बना जयद्रथ था मीडिया सत्य तो गया आग में जल।
गैरों को क्या दोष यहाँ शत्रुघ्न ही गया राम को छल।

अवार्ड लौटाकर क़र्ज़ नमक का चुकता साहित्यकार गया।
देख सियारों के टोले से एक सिंह फिर हार गया।
-पुनीत "कुमार"

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