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Monday, 5 October 2015

Varanasi-बनारस- What do you want to know about Varanasi before coming

Varanasi-बनारस- What do you want to know about Varanasi before coming


कैसे आएं:
बनारस आने के लिए देश के लगभग हर कोने से रेल यातायात सुलभ है। यहां का बाबतपुर हवाई अड्डा दिल्ली सहित सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा है। स्थानीय परिवहन के लिए ऑटो, किराए पर टैक्सी सुलभ है।





कब आएं:
सभी मौसम यहां के लिए अनुकूल हैं। गर्मी के बावजूद बनारस की सुबह और शाम बहुत सुहानी होती है।

क्या खाएं:
बनारस का अपना खानपान है। उत्तर भारत के प्रसिद्ध व्यंजनों के साथ ही यहां देश-दुनिया के प्रसिद्ध खाने सुलभ हैं। वैसे बनारस की खासियत है यहां की लस्सी और दूध। सुबह के समय कचौरी और जलेबी खाएं और दोपहर में सादा खाना। शाम को लौंगलता के साथ समोसा और गुलाब जामुन ले सकते हैं। इसके बाद बनारस की प्रसिद्ध ठंडाई पीना और पान खाना न भूलें। बनारसी साडियां और सिल्क के कपडे तो दुनियाभर में अपनी अलग पहचान रखते है। इसलिए थोडी खरीददारी भी करें।

~कहां-कहां जाएं~


बाबा विश्वनाथ मंदिर

गंगा के तट पर स्थित शिवलिंग 12 ज्योतिर्र्लिंगों में से एक है। तंग गलियों के बीच से होकर मंदिर तक जाना पड़ता है। मंदिर-मस्जिद विवाद को लेकर यहां सुरक्षा काफी कड़ी कर दी गई है। गली में भगवान को चढ़ाने के लिए फूल-प्रसाद के अलावा कपड़ों, रत्नों की भी दुकानें हैं। आगे पुलिस की तलाशी के बाद आप अन्नपूर्ण मंदिर के आगे से होकर बाबा विश्वनाथ मंदिर में पहुंचेगे। पंजाब के महाराजा रणीजत सिंह द्वारा स्वर्णाच्छादित कराए गए गुंबद के नीचे चांदी के अर्घे में श्यामवर्ण का शिवलिंग स्थापित है। यहां पांच बार आरती और पूजन होता है। मंदिर की व्यवस्था सरकार करती है। मंदिर सुबह 4 बजे से 11 बजे तक और फिर दोपहर 12 बजे से रात 9 बजे तक खुला रहता है। रात 11 बजे भगवान की भव्य शयन आरती होती है। बाहर निकलकर मां अन्नपूर्णा मंदिर के दर्शन होते हैं।







ज्ञानवापी:
विश्वनाथ मंदिर के बगल स्थित मस्जिद में श्रृंगारगौरी मां की मूर्ति है। मस्जिद के बाहर मंदिर परिसर में विशाल कुंआ है और उसके बाहर विशालकाय नंदी है जो मस्जिद की ओर देख रहा है। यहां कुएं का जल लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।







काल भैरव:
काल भैरव को काशी का कोतवाल कहा जाता है। बाबा विश्वनाथ से लगभग एक किमी दूरी पर यह मंदिर स्थित है।






Story of Kala Bhairav*
kala bhairava was a mendicant(beggar) with a begging bowl in hand. the begging bowl was not just any vessel. it was the skull of brahma's fifth head. lord shiva cut it off to humble brahma and vishnu.
So here goes the story:
Brahmâ and Vishnu were disputing with each other for the status of supreme God and appealed to the testimony of the four Vedas, which unanimously proclaimed Rudra-Shiva as the Ultimate Truth of the Universe. But the disputants were unable to accept that Rudra, endowed with so many revolting symbols of impurity and degradation, could be identical with the Absolute Reality of Brahman. Brahmâ laughed scornfully: "How could the Brahman, free of all attachment, lustily sport with his wife in the company of his troop of deformed churn-goblins (pramatha)?" However, Rudra's supremacy was finally reconfirmed by the esoteric sound-syllable, Omkâra, quintessence of the Veda and most condensed symbol of Brahman, who pointed out that Shiva's wife is not adventitious to her husband but on the contrary embodies his own blissful essence. Just then an immense pillar of flame manifested itself in their midst, within which was recognized the towering figure of the three-eyed Rudra bearing his trident, serpents and crescent moon. But the fifth head of Brahmâ taunted him: "I know who you are, Rudra, whom I created from my forehead. Take refuge with me and I will protect you, my son!"
Overflowing with anger, Shiva created a blazing Bhairava in human form, addressing this Kâlabhairava as "Lord of Time-Death" (kâla) for he shone like the god of Death: "You are called Bhairava because you are of terrifying features and are capable of supporting the universe. You are called Kâla-Bhairava, for even Time-Death is terrified of you." He ordered him to chastise Brahmâ, promising him in return eternal suzerainty over his city of Kâshî (Vârânasî), the cremation-ground of the Hindu universe, where final emancipation is assured. In a trice, Bhairava ripped off Brahmâ's guilty head with the nail of his left thumb. Seeing this, the terrified Vishnu eulogized Shiva and devotedly recited his sacred hymns, followed in this by the repentant Brahmâ. Thereby they gained his protection by realizing and acknowledging the supreme reality of Shiva. The severed head immediately stuck to Bhairava's hand, where it remained in the form of the skull, destined to serve as his insatiable begging-bowl.Enjoining him to honor Vishnu and Brahmâ, Shiva then directed Bhairava to roam the world in this beggarly condition to atone for the sin of Brahmanicide. "Show to the world the rite of expiation for removing the sin of Brahmanicide. Beg for alms by resorting to the penitential rite of the skull (kapâlavrata)." Creating a maiden renowned as 'Brahmanicide' (brahmahatyâ), Shiva instructed her to relentlessly follow Bhairava everywhere until he reached the holy city of Kâshî to which she would have no access.
Observing the Kâpâlika rite with skull in hand and pursued by the terrible Brahmahatyâ, Bhairava sported freely, laughing, singing and dancing with his goblin horde (pramathas). Stealing more than the hearts of all women, even the chaste wives of the Seven Vedic Sages (sapta-rshi) as he passed through the Daru forest, the erotic ascetic arrived at Vishnu's door to seek redemption only to find his entry barred by the guard, Vishvaksena. Spearing the latter and heaving the corpse of this Brahman on his shoulder, he pressed before Vishnu with outstretched begging-bowl. Vishnu split his own forehead-vein (see pic 2) but the out-flowing blood, the only suitable offering, could not fill the skull though it flowed for eons. When Vishnu then tried to dissuade Brahmahatyâ from tormenting Bhairava, the criminal observed that "beggars are not intoxicated by the alms they receive as (are others) by drinking the wine of worldly honor." Vishnu venerated him as the Supreme Being, untainted by sins like Brahmanicide, and acknowledged that his dependence and degradation were a mere fancy. Before leaving joyously to beg elsewhere, Bhairava reciprocated by recognizing Vishnu as his foremost disciple and acknowledged the latter's status as "grantor of boons to all the gods." On arriving at Kâshî, Brahmahatyâ sank into the nether-world, and the holy ground on which the skull fell, freeing Bhairava from his Brahmanicide, came to be known as Kapâlamocana. It was on the eighth day (ashtamî) in the dark (waning moon) half of the month of Mârgashîrsha that Lord Shiva manifested himself as Bhairava. Ever since, by performing ablution at Kapâlamocana one is rid of even the worst sin of brahmanicide (brahmahatyâ); and whosoever fasts on this day (Bhairavâshtamî) in front of Kâlabhairava (temple at Kâshî) and stays awake at night is freed from great sins.

The original Kâla Bhairava temple was located on the banks of the Kapâlamocana Tîrtha itself, in the Omkâreshvara area north of Maidâgin in Vâranasî, where Bhairava remained as the 'Sin-Eater' (Pâpa-Bhakshana) par excellence to devour the accumulated sins of devotees and pilgrims. If the pilgrims to Kâshî do not fear death there, this would be because their pilgrimage to the Mahâshmashâna is conceived on the ritual model of Bhairava's own arrival at Kâshî for absolution from his terrible sin and his subsequent establishment there. The paradox of Bhairava's scapegoat function even after his 'purification' can be explained as a 'lawful irregularity' resulting from the two opposing valorizations, diachronically disjoined in the myth, of his transgressive essence; it matches the complementary paradox of the pure Kâshî-Vishvanâtha himself being identified esoterically with the impure criminal Bhairava.


दुर्गाकुंड:
आदिशक्ति मां दुर्गा का यह मंदिर पवित्र सरोवर दुर्गाकुंड के किनारे है। मान्यता है कि यहां मां की मूर्ति को स्थापित नहीं किया गया था बल्कि स्वयं प्रकट हुई थी। नवरात्रि में यहां दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है।





तुलसी मानस मंदिर:
दुर्गाकुंड के नजदीक ही सफेद संगमरमर से बना विशाल तुलसी मानस मंदिर है। भगवान राम को समर्पित इस मंदिर का निर्माण 1964 में हुआ था। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण उसी जगह पर किया गया है जहां पर बैठकर तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना की थी। मानस मंदिर की दीवारों पर रामचरित मानस की चैपाइयां लिखी है।






संकटमोचन मंदिर:
मानस मंदिर से आधा किमी की दूरी पर स्थित संकटमोचन मंदिर हनुमान जी का प्राचीन मंदिर है। यहां साल में एक बार संगीत समारोह आयोजित होता जिसमें विख्यात कलाकार प्रस्तुति देते हैं।








भारतमाता मंदिर:
कैंट स्टेशन से लगभग दो किमी दूर भारत माता को समर्पित यह एक अनोखा मंदिर है। 1936 में इस मंदिर का निर्माण बाबू शिव प्रसाद गुप्त ने करवाया था। मंदिर में अविभाजित भारत का नक्शा बना है। संगमरमर से बने इस नक्शे में, मैदान, नदियों, पहाड़ों और समुद्र को बहुत ही बारीकी से उकेरा गया है। इसके अलावा काशी कई छोटे-बड़े अन्य मंदिर भी हैं।





~बनारस के घाट~

बनारस शहर को चंद्राकार घेर हुए गांगा के छोटे-बड़े 84 घाट हैं। अस्सी घाट से लेकर राजघाट तक पैदल घूमने का अपना ही मजा है। अस्सी घाट के नजदीक ही महारानी लक्ष्मीबाई का जन्मस्थल है। आगे दसाश्वमेध घाट, मणिकर्णिका घाट, राजेंद्र प्रसाद घाट और भी.....। सुबह-शाम इन घाटों पर घूमने का अपना ही आनंद है। बनारस के घाट पर बैठकर सूर्योदय देखना अपने आप में अद्भुद अनुभव है। फिर शाम को गंगा आरती। आध्यात्म और संगीत का अनुपम संगम। सूर्याेदय और गंगा आरती देखने के लिए प्रतिवर्ष लाखों लोग आते हैं। यहां नाव से भी आरती का आनंद लिया जा सकता है। यहीं बीच में है मणिकर्णिका घाट। जहां से गुजरते हुए बरबस संसार के सबसे बड़े सच से साक्षात्कार होता है। कहते हैं इस महाश्मशान में जिसका अंतिम संस्कार होता है उसे स्वर्ग में जगह मिलती है।

बनारस में चर्च और कई प्रसिद्ध मसि्जद भी हैं। हां, बनारस आएं है तो कबीर की जन्मस्थली, लहरतारा और रविदास मंदिर देखकर ही जाएं।

देव दीपावली :
कार्तिक पूर्णिमा के दिन वाराणसी में देव दीपावली मनाई जाती है। यह उत्सव बहुत ही अद्भुत और दुर्लभ है। इस दिन शहर के सभी घाटों को मिट्टी के दीये जलाकर सजाया जाता है। इस दृश्य को देखकर ऐसा लगता है कि मानों आकाश के सारे तारे बनारस के घाट पर उतरकर भगवान शिव की महाआरती कर रहे हैं।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय:
वाराणसी को 'सर्वविद्या की राजधनी' कहा जाता है। महामना पंडित मदनमोहन मालवीय ने 1916 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की। 1300 एकड़ में फैला विश्वविद्यालय एशिया का सबसे बड़ा आवासीय विवि है। इसके परिसर में स्थित नया विश्वनाथ मंदिर भी अच्छा दर्शनीय स्थल है। यह भव्य मंदिर परिसर की शान है। बनारस जाएं तो यहां जरूर जाएं। दुनिया भर में बीचएयू नाम से प्रसिद्ध इस विवि में देश सहित दुनिया के कई देशों के विद्यार्थी अध्ययनरत हैं।

बनारस में काशी विद्यापीठ, संपूर्णानंद संस्कृत विवि और सारनाथ में तिब्बत उच्च शिक्षण संस्थान भी है।

भारत कला भवन:
काशी हिंदू विश्वविद्यालय परिसर में स्थित यह कला और शिल्प संग्रहालय विश्वभर में प्रसिद्ध है। यहां 15वीं और 16वीं शताब्दी की कई शिल्पकारियां रखी हैं। इसके साथ ही मुगलकाल तथा अन्य राजाओं के शासन काल की पेंटिंगों का विशाल संग्रह है। इस संग्रहालय में पुराने सिक्कों का भी बहुत अच्छा संग्रह है।

~आसपास~

रामनगर किला:
शहर से 14 किलोमीटर दूर गंगा के पूर्वी किनारे पर महाराजा काशी का किला है। इसका निर्माण महाराजा बलवंत सिंह ने करवाया था। लाल पत्थरों से निर्मित इस किले को संग्रहालय में बदलकर आम जनों के लिए खोल दिया गया है। इस संग्रहालय में राजसी ठाठबाट की तमाम चीजें गाडिय़ां, गहने, कपड़े आदि के अलावा अस्त्र-शस्त्र का विशाल संग्रह है। अपनी तरह का यह एशिया का सबसे बड़ा संग्रहालय है।

~सारनाथ~

बौद्धध्र्मावलम्बियों के लिए विशेष महत्व रखने वाला यह स्थल कई मायनों में महत्वपूर्ण है। भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश यहीं दिया था।

धमेक स्तूप:
यह स्तूप सारनाथ की पहचान है। 43.6 मीटर लम्बा यह स्तूप ईंट और पत्थरों से बना हुआ है। इसमें भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेष रखे गए हैं।

मूलगंध कुटी विहार:
महात्मा बुद्ध का यह आधुनिक मंदिर महाबोधि सोसाइटी द्वारा बनवाया गया है। जिसमें भगवान बुद्ध की मनमोहक मूर्ति स्थापित है। कुछ पुराने मंदिर यहां जर्जर भी हो चुके हैं जिनका पुनरोद्धार कराया जा रहा है। यहां एक छोटा सा चिडिय़ा घर और पुराने अवशेष हैं।

सारनाथ संग्रहालय:
इस संग्रहालय में भारत का राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह अशोक स्तंभ संरक्षित है। इसके अलावा यहां बुद्ध और बोध्सित्व की मूर्तिकला का विशाल और दुर्लभ संग्रह है।
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काशी में भगवान ''शिव'' ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रगट हुए थे। सम्राट विक्रमादित्य ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। 
मंदिर को लूटने आए महमूद गजनवी के भांजे सालार मसूद को सम्राट सुहेल देव पासी ने मौत के घाट उतारा था। 
मंदिर को 1194 में कुतुबब्दीन ने तोड़ा। मंदिर फिर से बना।
1447 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह ने फिर इसे तोड़ा। 
1494 में मुस्लिम शासको ने काशी के विश्वनाथ मंदिर सहित सभी मंदिरों को तोड़ दिया.काशी में एक भी मंदिर नहीं बचा था.
1585 में राजा टोडरमल की सहायता से फिर मंदिर बना।
काशी विश्वनाथ के मूल मंदिर के स्थान पर आज ज्ञानवापी मस्जिद है.>>>
2.9.1669 को औरंगजेब ने काशी-विश्वनाथ मन्दिर फिर से ध्वस्त करा दिया और उसी जगह मस्जिद का निर्माण करा दिया.जिसका नाम आज ज्ञानवापी मस्जिद है.
औरंगजेब ने ही मथुरा में कृष्णजी का मंदिर तोड़वा कर वहां ईदगाह बनवाई थी।
1752 से लेकर 1780 के बीच मराठा सरदार दत्ता जी सिंधिया व मल्हार राव होल्कर ने काशी विश्वनाथ मन्दिर की मुक्ति के प्रयास किए।
मूल मंदिर के थोड़ी दूर पर वर्तमान काशीविश्वनाथ मंदिर है >>>>
7 अगस्त, 1770 में महाद जी सिन्धिया ने दिल्ली के बादशाह शाह आलम से मन्दिर तोडऩे की क्षतिपूर्ति वसूल करने का आदेश जारी करा लिया। 
लेकिन तब तक काशी पर ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रभाव हो गया था, इसलिए मंदिर का नवीनीकरण रुक गया।
इन्दौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1780 में विश्वनाथ मंदिर बनवाया, जिस पर पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने 9 क्विंटल सोने का छत्र बनवाया। ग्वालियर की महारानी बैजाबाई ने ज्ञानवापी का मंडप बनवाया और महाराजा नेपाल ने वहां नन्दी की विशाल प्रतिमा स्थापित करवाई।
काशी विश्वनाथ मंदिर का मुकदमा मुस्लमान हार चुके है >>>>
11 अगस्त, 1936 को दीन मुहम्मद, मुहम्मद हुसैन और मुहम्मद जकारिया ने स्टेट इन काउन्सिल में प्रतिवाद संख्या-62 दाखिल किया और दावा किया कि सम्पूर्ण परिसर वक्फ की सम्पत्ति है। लम्बी गवाहियों एवं ऐतिहासिक प्रमाणों व शास्त्रों के आधार पर यह दावा गलत पाया गया और 24 अगस्त 1937 को वाद खारिज कर दिया गया। इसके खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील संख्या 466 दायर की गई लेकिन 1942 में उच्च न्यायालय ने इस अपील को भी खारिज कर दिया। कानूनी गुत्थियां साफ होने के बावजूद मंदिर-मस्जिद का मसला आज तक फंसा कर रखा गया है।

काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास >>>>

अमेरिका के लेखक तथा साहित्यकार मार्क ट्विन ने काशी कि यात्रा के बाद लिखा कि ''बनारस'''' इतिहास से भी पुराना नगर है. वह परंपराओं से पुराना है। वह कहावतों और कहानियों से भी पुराना है। विश्व कि समस्त सभ्यताओ से पुराना है. यहां भूत, वर्तमान, शाश्वत तथा निरंतरता साथ-साथ विद्यमान हैं। काशी गंगा के पश्चिम किनारे पर स्थित है।
चीनी यात्री हुएन सांग (629-675) ने अपनी काशी यात्रा के उल्लेख में 100 फुट ऊंची शिव मूर्ती वाले विशाल तथा भव्य मंदिर का वर्णन किया है.
बौद्ध धर्म के प्रभाव को कम करने के लिए शंकराचार्य का आगमन भी यहीं हुआ और उन्होंने वैदिक धर्म की स्थापना की।
महर्षि पतंजलि ने अपना काव्य यहीं लिखा था। संत कबीर ने संत मत की स्थापना यहीं की।
मीरा बाई के गुरु संत रैदास (रविदास) भी काशी के निवासी थे। 
रामचरितमानस और अन्य ग्रंथों की रचना गोस्वामी तुलसी दास ने यहीं पर की थी।
काशी नागरी प्रचारिणी सभा, भारतेंदु हरिचंद्र, मुंशी प्रेमचंद्र अैर जयशंकर प्रसाद आदि अन्य विद्वान भी काशी की ही देन हैं।
काशी के गंगा तट पर लगभग सौ घाट हैं।
इनमें से एक पर स्वयं हरिश्चंद्र ने श्मशान का मृतक दाह संस्कार लगान वसूलने का कार्य किया था।
आधुनिक शिक्षा का विश्वविद्यालय-बनारस हिंदू युनिवर्सिटी पं मदन मोहन मालवीय ने यहीं स्थापित किया था.
जयपुर के शासक जय सिंह ने एक वेधशाला भी बनवायी थी। यह 1600 सन में बनी थी। इसके यंत्र आज भी ग्रहों की सही नाप और दूरी बतलाते हैं।
स्कंध पुराण में 15000 श्लोको में काशी विश्वनाथ का गुणगान मिलता है। इससे सिद्ध होता है कि यह मंदिर हजारो वर्ष पुराना है.
इसके उत्तर में वारान तथा दक्षिण में आसी नदियां बहती हैं।
इसको काशी का, यानी प्रकाश का नगर भी कहते हैं। प्रकाश ज्योति शिव को भी कहते हैं। इसको ‘अविमुक्त’, अर्थात जिसको शिव ने कभी भी नहीं छोड़ा, भी कहते हैं। इसको ‘आनंद वन’ और ‘रुद्रवास’ भी कहते हैं।
भारत के सांस्कृतिक तथा धार्मिक ग्रंथो में ज्योति प्रकाश का विशेष अर्थ है ‘ज्योति’, जो अंधकार को मिटाती है, ज्ञान फैलाती है, पापों का नाश करती है, अज्ञान को नष्ट करती है आदि। काशी अज्ञान, पाप का नाश करने वाली है, मोक्ष और समृद्धि प्रदान करने वाली है.
प्रलयकाल में भी काशी का लोप नहीं होता। उस समय भगवान [शंकर]] इसे अपने [त्रिशूल] पर धारण कर लेते हैं और सृष्टि काल आने पर इसे नीचे उतार देते हैं। आदि सृष्टि स्थली भी यहीं भूमि बतलायी जाती है। इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने सृष्टि उत्पन्न करने का कामना से तपस्या करके आशुतोष को प्रसन्न किया था और फिर उनके शयन करने पर उनके नाभि-कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिन्होने सारे की रचना की। अगस्त्य मुनि ने भी विश्वेश्वर की बड़ी आराधना की थी और इन्हीं की अर्चना से श्रीवशिष्ठजी तीनों लोकों में पुजित हुए तथा राजर्षि विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाये।
सर्वतीर्थमयी एवं सर्वसंतापहारिणी मोक्षदायिनी काशी की महिमा ऐसी है कि यहां प्राणत्याग करने से ही मुक्ति मिल जाती है। भगवान भोलानाथ मरते हुए प्राणी के कान में तारक-मंत्र का उपदेश करते हैं, जिससे वह आवगमन से छुट जाता है, चाहे मृत-प्राण्ाी कोई भी क्यों न हो। मतस्यपुराण का मत है कि जप, ध्यान और ज्ञान से रहित एवंम दुखों परिपीड़ित जनों के लिये काशीपुरी ही एकमात्र गति है।
वामपंथी (हिन्दू विरोधी), सेक्युलर विचारधारा के इतिहासकार मंदिर को तोडना सही ठहराते है ये देश द्रोही इतिहासकार विदेशी मजहब से पैसे लेकर यही लिखे है >>>>>
सन 1669 ईस्वी में औरंगजेब अपनी सेना एवं हिन्दू राजा मित्रों के साथ वाराणसी के रास्ते बंगाल जा रहा था.रास्ते में बनारस आने पर हिन्दू राजाओं की पत्नियों ने गंगा में डुबकी लगा कर काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा करने की इच्छा व्यक्त की …जिसे औरंगजेब सहर्ष मान गया, और, उसने अपनी सेना का पड़ाव बनारस से पांच किलोमीटर दूर ही रोक दिया !
फिर उस स्थान से हिन्दू राजाओं की रानियां पालकी एवं अपने अंगरक्षकों के साथ गंगाघाट जाकर गंगा में स्नान कर विश्वनाथ मंदिर में पूजा करने चली गई !
पूजा के उपरांत सभी रानियां तो लौटी लेकिन कच्छ की रानी नहीं लौटी , जिससे औरंगजेब के सेना में खलबली गयी और, उसने अपने सेनानायक को रानी को खोज कर लाने का हुक्म दिया …!
औरंगजेब का सेनानायक अपने सैनिकों के साथ रानी को खोजने मंदिर पहुंचा … जहाँ, काफी खोजबीन के उपरांत “”भगवान गणेश की प्रतिमा के पीछे”” से नीचे की ओर जाती सीढ़ी से मंदिर के तहखाने में उन्हें रानी रोती हुई मिली…. जिसकी अस्मिता और गहने मंदिर के पुजारी द्वारा लुट चुके थे …!
इसके बाद औरंगजेब के लश्कर के साथ मौजूद हिन्दू राजाओ ने मंदिर के पुजारी एवं प्रबंधन के खिलाफ कठोरतम करवाई की मांग की.

जिससे विवश होकर औरंगजेब ने सभी पुजारियों को दण्डित करने एवं उस “”विश्वनाथ मंदिर”” को ध्वस्त करने के आदेश देकर मंदिर को तोड़वा दिया !उसी जगह ज्ञानवापी मस्जिद बना दी.

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