Sunday, 31 May 2015

एक बच्चे की निगाह में भारत में डॉक्टर का भविष्य दसवीं कक्षा के प्रश्न पत्र में एक प्रश्न आया की आप आगे क्या बनना चाहोगे और क्यों, संक्षिप्त निबंध लिखिये ?

एक बच्चे की निगाह में भारत में डॉक्टर का भविष्य

दसवीं कक्षा के प्रश्न पत्र में एक प्रश्न आया की आप आगे क्या बनना चाहोगे और क्यों, संक्षिप्त निबंध लिखिये ? 

एक बच्चे ने लिखा कि मैं क्या बनना चाहता हूँ मुझे नहीं पता ,पर मैं क्या नहीं बनना चाहता हूँ उस पर लिख रहा हूँ. मैं इस देश में डॉक्टर नहीं बनना चाहता और इसके कई कारण हैं, मैं उनको विस्तार से लिख रहा हुँ.

बचपन से जबसे मुझे समझ आई है हर जगह यही सुनता हूँ कि डॉक्टर लूटते हैं / डाकू हैं पर मुझे जब डॉक्टर की जरुरत पड़ी तो मुझे ऐसा कुछ नहीं लगा. डॉक्टर अंकल ने मुझे देखा, कुछ पुछा, दो जाँचें लिखीं व् पांच दिन की दवा दी. मैं ठीक हो गया. ऐसा कई बार हुआ व् मेरे और दोस्तों के भी अनुभव यही रहे. मुझे आज तक समझ नहीं आया कि क्यों हमारी पीड़ा दूर करनेवाले अंकल को लोग लुटेरा कहते हैं. अगर यही मुझे भी सुनना है तो मुझे डॉक्टर नहीं बनना। 

इस विषय में अच्छी तरह से जाँच पड़ताल करने पर व् जानकारी जुटाने पर जो तथ्य सामने आये वे मुझे डॉक्टर बनने से रोकते हैं और उनको मैं लिख रहा हूँ……… 

डॉक्टर बनने के लिए जितनी पढाई व् मेहनत की जरूरत है उतनी इस देश में किसी और क्षेत्र में नहीं है. कॉलेज हर शहर में नहीं है. अपने माता पिता से दूर रहना पड़ता है यानी १७ साल में घर से विदा हो गए. हॉस्टल सुविधा व् हॉस्टलों की हालत गाय बैल के तबेलों जैसी है. कब खाना है, कब सोना है, पता नहीं। मुझे तो यहाँ तक पता चला है की हमारे देश का MBBS कोर्स पूरे विश्व में सबसे कठिन है व् इसकी परीक्षा सबसे कठिन परीक्षा मानी जाती है. ऐसे में, ना बाबा ना - मुझे नहीं बनना डॉक्टर।

मुझे ये भी पता चला है सिर्फ MBBS यानी किसी काम के नहीं. यानी ६ साल में सिर्फ मेडिकल का superficial ज्ञान या यूँ कहें sensitization. दुसरे का तो क्या अपना व् अपने परिवार वालों का भी इलाज ठीक से नहीं कर पाते. Post-graduation के लिए भी मारा -मारी व् PG कुछ विषयों में ही अच्छी मानी जाती है. बाकी विषयों (non -clinical) में तो समाज के द्वारा डॉक्टर ही नहीं माने जाते फिर मैं क्यों बनूँ ऐसा डॉक्टर जब आगे जाकर लोग मुझे डॉक्टर ही नहीं समझें? 

जिंदगी के दस साल झोंकने के बाद हाथ क्या आता है? degree ? अभी अनुभव नहीं है, इलाज सही नहीं कर सकते अतः तीन चार साल कहीं सीखना पढ़ेगा यानि १२-१३ साल ख़त्म। इतने में तो मैं कुछ भी कर के कमा सकता हूँ और अपना जीवन जल्दी पटरी पर ला सकता हूँ. 

PG करके बाहर निकलो तो सरकारी नौकरी के लाले, रिश्वत के बिना कोई काम नहीं. अगर रिश्वत नहीं दी तो जाओ ऐसी जगह जहाँ परिंदे भी जाने में डरते हैं. मैंने सुना था काला पानी नाम की जगह देश के बाहर किसी द्वीप पर है पर सरकारी डॉक्टर की नौकरी में तो हर प्रदेश का हर गाँव काला पानी है यानि जगह है पर और कुछ नहीं. यानि बिजली पानी, घर, दवाई, OT, औजार कुछ नहीं. सरकारी नौकरी के बारे में मैंने सुना है की वहां डॉक्टर के हिसाब से नहीं प्रशासन व शासन के हिसाब से काम करना पड़ता है. आप कितना भी पढ़ लिख कर आये हो दवा वही लिखनी पड़ेगी जो सरकार ने दी है. उसकी गुणवत्ता भी जांची नहीं है, असर नहीं आया या नुक्सान हुआ तो डॉक्टर ही जिम्मेदार है. कुछ case में तो जेल भी हो जाती है. 

PG के बाद प्राइवेट काम करो तो जैसे ओखली में सर दे दिया हो. हज़ारों कानून व् डॉक्टर को लूटने वाले हज़ारों हाथ. मुझे अब समझ आया डॉक्टर को लुटेरा कहने वाला समाज खुद डॉक्टर को लूट रहा है व् अपनी हरकत को छुपाने के लिए खुदही डॉक्टर को लुटेरा कहकर बात ढक रहा है. डॉक्टर को रोज़मर्रा की ज़िंदगी की जद्दोजहद के बीच मेडिकल कानूनों से भी जूझना पड़ रहा है. MCI/ CPA/CEA/ Nursing Home Act/ Biomedical Waste Act/ PCPNDT/ MTP/ Notifiable disease/Drug & Cosmetic Act जैसे अनगिनित नियम सिर्फ और सिर्फ डॉक्टर समुदाय के लिए बने हैं. इसके साथ आम जनता के नियम जैसे Shop & Establishment Act/ Income Tax/ Motor Vehicle Act/ Property Tax एवं अन्य तो है हीं. बाप रे बाप डॉक्टर पर इतना बोझ, मुझे नहीं बनना डॉक्टर. 

अभी अनुराधा कुणाल साहा केस की बाते खत्म भी नहीं हुई थी जिसमे डॉक्टर को ११ करोड़ का हर्जाना देना पड़ा था कि नया फरमान अपोलो अस्पताल वाला १ करोड़ का और फिर डॉक्टरों को हड़ताल पर जाने से मना करने का यानी डॉक्टर लोकतंत्र का हिस्सा नहीं है. डॉक्टर तो समाज का बंधुआ मजदूर है. इस देश में डॉक्टरी करी यानी तुम ग़ुलाम हो, तुम्हारे लिए अलग ही नियम कानून हैं, तुमने अपने जीवन का रास्ता गलत चुना है, तुम पापी हो, समाज के किसी काम के नहीं हो इसीलिए हर आदेश तुम्हारे खिलाफ है. ये सब समझ कर मुझे नहीं बनना डॉक्टर.

मुझे तो लगने लगा है कुछ ही दिनों में नया फरमान आने वाला है कि इस देश में डॉक्टर को वेतन नहीं लेना चाहिए. वो समाज के सेवक हैं उन्हें मरीज देखते समय किसी भी काम के लिए उठना नहीं चाहिए. चाहे सुसु लगी हो, या पानी की प्यास लगी हो, या थके हो तो हाथ पाँव सीधे करने हों, और तो और डॉक्टरों को खाना भी नहीं खाना चाहिए क्यूंकि वो इंसान नहीं सेवक हैं. शायद एक फरमान और आ जाये कि डॉक्टरों को शादी करके घर नहीं बसाना चाहिए नहीं तो उनकी जरूरतें और ज़िम्मेदारी बढ़ेंगी और वे जनता की सेवा सही ढंग से नहीं कर पाएंगे. साथ ही सरकार डॉक्टर के कपडे खरीदने पर, घर खरीदने पर रोक लगा दी जायेगी व् वेतन न देने के मरहम के रूप में डॉक्टर को सरकार की तरफ से दिन में दो बार चार रोटी सब्ज़ी या आचार से दी जाएगी - फ्री - (mid-day meal की तरह). रहने के लिए अस्पताल के एक कोने में एक पलंग डाला हुआ होगा - डॉक्टर जरूरत लगे और समय मिले तो उसपर सो सकता है.

कपडे के रूप में OT ड्रेस व एक एप्रन दिया जायेगा यानि डॉक्टर इंसान न हो कर कैदी या सन्यासी है. ये बातें सोच कर सिहरन होती है व् मन डॉक्टर बनने को नहीं करता। 

आज समाज शासन, प्रशासन, media, न्यायपालिका डॉक्टर समुदाय को नीचे दिखाने पर तुला हुआ है. डॉक्टरों पर हो रहे चौतरफ़ा हमलों का कारण शायद डॉक्टर पर किसी भी तरह की ताकत का न होना है - जैसे media पर कलम की ताक़त है, न्यायपालिका पर कानून की, प्रशासन पर डंडे की, शासन पर बल की, समाज पर भीड़ की. ये सब लोग असंघटित व् ताक़तहीन डॉक्टर समुदाय को मिलकर नीचा दिखाना चाह रहे हैं - इसमें इनका क्या मकसद है ये मेरी समझ से परे है. पर ये समझ कर डॉक्टर बनने की हिम्मत नहीं होती.

डॉक्टरी पेशे में रिजल्ट देना कई बातों पर निर्भर है - जैसे मरीज ने क्या बीमारी बताई, सही बताई या नहीं, मरीज कितने दिनों तक बीमारी का इलाज़ टालता रहा या नीम हकीमों के चक्कर में पड़ा रहा, डॉक्टर ने जांच लिखी वो सही हुई या नहीं - मरीज ने जांच कराइ या नहीं, दवा गुणवत्ता पूर्ण थी या नकली थी, मरीज ने दवा खाई भी या नहीं, मरीज को बताया हुआ परहेज उसने किया या नहीं आदि बातों पर मरीज का ठीक होना निर्भर है. मरीज ठीक नहीं हुआ तो गलती डॉक्टर की ही है बाकि के factors नगण्य हो जाते हैं. और तो और, मरीज के रिश्तेदारों या दोस्तों को गुस्सा आ जाये तो इलाज करने वाले डॉक्टर की खैर नहीं - डॉक्टर के संग हाथा पाई या जानलेवा हमला भी हो सकता है. जिस समाज में जनता की गलतियों की जिम्मेदारी भी डॉक्टर के सर मढ़ दी जाती हो उस समाज मैं मुझे डॉक्टर नहीं बनना।

डॉक्टरी पेशा मज़दूरी की तरह है. जिस तरह एक मज़दूर रोज गेंती, फावड़ा , तसला हाथों में उठाता है व् ८ - ९ घंटे काम करता है तब उसे दिहाड़ी मिलती है उसी तरह डॉक्टर अगर मरीज न देखे / ऑपरेशन न करे/ या समय पर मरीज देखने न बैठे तो उसे कुछ नहीं मिलता. ये Business नहीं है जिसमे Businessman शहर में न भी हो तो भी माल फ़ोन पर बिक जाता है व् पैसों का मुनाफा होता रहता है. मुझे अब तक ये समझ नहीं आया मज़दूरी वाले काम में लोग ये क्यों कहते हैं कि आजकल डॉक्टर बिजनेसमैन हो गए हैं? इस मज़दूरी वाले व्यवसाय से तो में कुछ और बन जाऊं जिसमे पैसा हो/ ताकत हो/ समाज आँख उठा कर भी न देखे. सरकारी बाबू रिश्वत से करोड़ों कमाता है, प्रशासनिक अधिकारी अरबों, न्यायपालिका के तो ठेकेदारों का तो कहना ही क्या - महीने भर की छुट्टी चाहे लाखों केस देश में पड़े हों. इनका तो एक पैर विदेश में और दूसरा कहाँ रखें सोचना होता है. आजकल media ने भी खुद को ताकतवर बना रखा है. एक दसवीं पास झोला लटकाये, कैमरा या माइक पकडे media का दलाल भी करोड़ों के बंगले खरीद रहा हैं या उपहार में ले रहा है. देश के सबसे नामी व् बड़े डॉक्टर की इतनी हैसियत नहीं जो इन लोगों की है अतः में डॉक्टर नहीं बनूँगा चाहे जो बनूँ. 

समाज / सरकार ये नहीं सोचती की मेहनत कर सरकारी कॉलेज से पढ़ने वाले डॉक्टर को जब पैसे के बल पर प्राइवेट कॉलेज से ली हुई डिग्री वाले डॉक्टर के साथ तौला जाता है तो उसके दिल पर क्या गुज़रती है. देश इन पैसे से खरीदी हुई डिग्री या कम अंक वाले वर्ग के डॉक्टरों से स्वास्थ उत्थान की अपेक्षा कर रहा है जो संभव नहीं है. पर स्वास्थय आंकड़े ठीक न होने का ढीकरा मेहनत काश डॉक्टरों पर भी फूटता है. जनसंख्या वृद्धि बेहिसाब है, डॉक्टर कम उस पर भी पूरे अंक वाले बिना पैसे के डिग्री लेने वाले बहुत कम. क्या इन मुट्ठी भर डॉक्टरों से देश का स्वास्थ्य अच्छा होगा? ये असंभव है व् इस कमी का खामियाजा मुझे भी भुगतना पड़ेगा इसलिए मैं डॉक्टर नहीं बनना चाहता. 

माननीय ,मेरी कॉपी जांचने वाले अध्यापक महोदय मैं भगवान को साक्षी मान कर कसम खाता हूँ कि मैं डॉक्टर नहीं बनूँगा, कभी नहीं बनूँगा न ही किसी को बनने की सलाह दूंगा। मैं चाहे सरकारी बाबू बन जाऊं या अपनी STD/PCO की दूकान खोल लूँ या mobile रिचार्ज करने वाला दुकानदार बन जाऊं पर मैं डॉक्टर नहीं बनूँगा। महोदय मैं लिखना बंद कर रहा हूँ क्यूंकि मैं डॉक्टर क्यों नहीं बनूँगा पर लिखता रहा तो एक क्या दस कॉपियां भी कम पड़ जाएँगी व् आपकी आँखों में से भी आसूं निकल आएंगे। हो सकता है ये पढ़कर आप भी अपने बेटे/ पोते/ रिश्तेदार/ पडोसी को इस देश में डॉक्टर न बनने की सलाह दे डालो. डॉक्टरों पर हो रहे अत्याचारों से यदि एक दिन ये देश डॉक्टर विहीन हो जाये तो आश्चर्य नहीं होगा। इस देश का भविष्य स्वास्थय की दृष्टी से अच्छा नहीं होगा ये मैं देख रहा हूँ पर फिर भी मैं डॉक्टर नहीं बनुँगा. इस लेख के लिए चाहे आप मुझे fail कर दें पर मैं मन की बात लिख कर बता रहा हूँ कि मैं डॉक्टर नहीं बनुँगा. !!!!!!!!!!!!!

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