Saturday, 4 April 2015

अद्भुद हनुमानजी की छाप वाले दुर्लभ सिक्के, 17वीं शताब्दी के दौरान थे चलन में

अद्भुद हनुमानजी की छाप वाले दुर्लभ सिक्के, 17वीं शताब्दी के दौरान थे चलन में






अंग्रेजों के शासन से पूर्व मालवा की राठौड़ रियासतें हनुमान की छाप वाली मुद्राएं चलाती थीं। इन्हीं सिक्कों के आधार पर रियासत में लेनदेन होता था। धार, रतलाम सहित अन्य रियासतों में भी हनुमान अंकित ताम्र मुद्राएं प्रचलन में रही। ऐसी कई रियासतों की हनुमान की छाप वाली दुर्लभ मुद्राओं का संग्रह पुरातत्व संग्रहकर्ता किशनलाल सोनी ने किया हुआ है।
सोनी के मुताबिक राज्य में सुख-शांति एवं सुरक्षा की दृष्टि से मंदिर निर्माण कर हनुमान प्रतिमाएं विराजित की जाती थी। इसी तरह मुद्राएं भी प्रचलन में आई थीं। धार रियासत में 17वीं शताब्दी में महाराजा उदाजीराव पंवार ने भगवान हनुमान आधारित मुद्राएं प्रचलित की थी। सिक्के के एक ओर धार अंकित था, दूसरी ओर हनुमान की आकृति थी। इसका उल्लेख धार स्टेट काईस में भी है। बिरमावल रियासत में सन 1868 में राजा हिंदूसिंह राठौड़ ने भी हनुमान अंकित सिक्के चलाए थे। हालांकि ताम्र पर बने ये सिक्के मात्र दस साल तक ही प्रचलन में रह पाए।

राजोटा स्टेट ने भी 18वीं शताब्दी में हनुमान आधारित सिक्के का प्रचलन किया था।
इसमें भी एक भाग में राजोटा एवं पीछे भगवान हनुमान की आकृति थी। रतलाम महाराजा सजनसिंह राठौड़ ने भी संवत 1947 में हनुमान अंकित सिक्के चलाए थे। शुरू में सिक्के भारी वजन के थे लेकिन बाद में तांबा महंगा होने से सिक्के पतले किए गए। देश आजाद होने के बाद सिक्के प्रचलन से बाहर हो गए और इतिहास की यह पुरातन धरोहर दुर्लभ हो गई।

सोनी के अनुसार खेड़ा के पास खंडवासेरी से सियाजित हनुमान मंदिर रोड तक ये अवशेष मिले हैं। प्रतीत होता है कि पूर्व में इसी जगह पर शंख उद्योग संचालित करने वाले लोग रहते थे। खुदाई के दौरान प्रचुर मात्रा में शंख आभूषण, औजार आदि भी मिलना इसका प्रमाण है। माना जाता है कि उस समय भी क्षेत्र का संपर्क गुजरात से था, समुद्र से निकले शंख उधर से ही आयात होकर यहां लाए जाते थे। इन्हें निर्माण कर अन्यत्र भेजा जाता था। सोनी के पास शंख निर्मित आभूषण, कछुआ, प्रतिमाएं, शेर, खिलौने, गले के ताबीज बड़ी मात्रा में संग्रहित है।

No comments:

Post a Comment