Sunday, 22 March 2015

जब राधा ने कान्हा से कहा मुझे छूना मत.… मुझसे दूर रहो।

जब राधा ने कान्हा से कहा मुझे छूना मत.… मुझसे दूर रहो। 



पुराणों में वर्णन है कि जब श्रीकृष्ण ने कंस के भेजे राक्षस अरिष्टासुर का वध कर दिया। उसके बाद उन्होंने राधा को स्पर्श कर लिया। तब राधा जी उनसे कहने लगी की आप कभी मुझे स्पर्श मत कीजिएगा, क्योंकि आपके सिर पर गौ हत्या का पाप है। आपने मुझे स्पर्श कर लिया है और मैं भी गौ हत्या के पाप में भागीदार बन गई हूं। यह सुनकर श्रीकृष्ण को राधाजी के भोलेपन पर हंसी आ गई। उन्होंने कहा राधे मैंने बैल का नहीं, बल्कि असुर का वध किया है।

तब राधाजी बोलीं आप कुछ भी कहें, लेकिन उस असुर का वेष तो बैल का ही था। इसलिए आपको गौ हत्या के पापी हुए। यह बात सुनकर गोपियां बोली प्रभु जब वत्रासुर की हत्या करने पर इन्द्र को ब्रह्मा हत्या का पाप लगा था तो आपको पाप क्यों नहीं लगेगा। श्रीकृष्ण मुस्कुराकर बोले अच्छा तो आप सब बताइए कि मैं इस पाप से कैसे मुक्त हो सकता हूं। तब राधाजी ने अपनी सखियों के साथ श्रीकृष्ण से कहा जैसा कि हमने सुना है कि सभी तीर्थों में स्नान के बाद ही आप इस पाप से मुक्त हो सकते हैंं।

यह सुनकर श्रीकृष्ण ने अपने पैर को अंगूठे को जमीन की ओर दबाया। पाताल से जल निकल आया। जल देखकर राधा और गोपियां बोली हम विश्वास कैसे करें कि यह तीर्थ की धाराओं का जल है। उनके ऐसा कहने पर सभी तीर्थ की धाराओं ने अपना परिचय दिया। इस तरह कृष्ण कुंड का निर्माण हुआ।

राधा ने कान्हा से कहा छूना मत, फिर कंगन से ऐसे बना राधा कुंडः

जब श्रीकृष्ण ने राधाजी और गोपियों को उस कुंड में स्नान करने को कहा तो वे कहने लगीं कि हम इस गौ हत्या लिप्त पाप कुंड में क्यों स्नान करें। इसमें स्नान करने से हम भी पापी हो जाएंगे। तब श्री राधिका ने अपनी सखियों से कहा कि सखियों हमें अपने लिए एक मनोहर कुंड तैयार करना चाहिए। उस कृष्ण कुंड की पश्चिम दिशा में वृष भासुर के खुर से बने एक गड्ढे को श्री राधिका ने खोदना शुरु किया। गीली मिट्टी को सभी सखियों और राधाजी ने अपने कंगन से खोदकर एक दिव्य सरोवर तैयार कर लिया।

कृष्ण जी ने राधा जी से कहा तुम मेरे कुंड से अपने कुंड में पानी भर लो। तब राधा जी ने भोलेपन से कहा नहीं कान्हा आपके सरोवर का जल अशुद्ध है। हम घड़े-घड़़े करके मानस गंगा के जल से इसे भर लेंगे। राधा जी और सखियों ने कुंड भर लिया, लेकिन जब बारी तीर्थों के आवाहन की आई तो राधा जी को समझ नहीं आया वे क्या करें। उस समय श्रीकृष्ण के कहने पर सभी तीर्थ वहां प्रकट हुए और राधाजी से आज्ञा लेकर उनके कुंड में विद्यमान हो गए। यह देखकर राधा जी कि आंखों से आंसू आ गए और वे प्रेम से श्रीकृष्ण को निहारने लगीं। 

1 comment:

  1. गोवर्धन मथुरा का वह क्षेत्र है जहां भगवान् कृष्ण ने पर्वत को धारण कर ब्रजवासियों की रक्षा की थी। राधा व कृष्ण कुंड यहीं हैं। आज के हिसाब में गोवर्धन से लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह कुंड दुनियाभर के श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचता है। माना जाता है कि राधा और श्रीकृष्ण ने बहुत सारा समय यहां साथ बिताया है। वे इस कुंड में जल क्रीड़ा किया करते थे। ये दोनों ही कुंड गोवर्धन के दोनों ओर दो नेत्रों की तरह स्थित हैं। कार्तिक माह की कृष्णाष्टमी को इन दोनों कुंडों का प्राकट्य हुआ था।

    इस एवज में कृष्णाटमी, मुणिया पूर्णमा को यहां मेला लगता है और दूर-दूर से श्रद्धालु इस कुंड में स्नान करने आते हैं। कहते हैं श्रीकृष्ण के द्वारका चले जाने पर ये दोनों कुंड लुप्त हो गए थे। कृष्ण के प्रपौत्र वृजनाभ ने इनका फिर से उद्धार करवाया था। पांच हजार साल के बाद ये कुंड लुप्त हो गए। फिर इनका उद्धार महाप्रभु ने करवाया। महाप्रभु जब यहां आए और लोगों से राधा कुंड व कृष्ण कुंड के बारे में पूछा तो लोगों ने कहा ये तो नहीं पता, लेकिन काली खेत और गौरी खेत नाम की जगह है, जहांं थोड़ा-थोड़ा जल है। उसके बाद इसका पुन: उद्धार हुआ। कहा जाता है कि महाप्रभु इसमें स्नान करते हुए हे राधा-हे कृष्ण कहते हुए जहां बेहोश हो गए थे। वहां आज भी तमालतला नाम का प्रसिद्ध स्थान है।

    अकबर रह गए भौचक्के, जब …
    मुगलों के भारत में आने के वक्त की बात है। मुगल सम्राट अकबर सेना सहित यहां से गुजर रहे थे। उस समय अकबर की सेना और हाथी, घोड़े सभी प्यासे थे। अकबर ने राधा कुंड को देखकर सोचा कि इसका पानी तो अकेला एक हाथी ही पी जाएगा, लेकिन दास गोस्वामी के कहने पर उसने अपनी सेना को कुंड का पानी पीने की आज्ञा दी और सारी सेना व हाथी, घोड़े सभी पानी पीकर तृप्त हुए। इसके बाद भी कुंड का पानी जरा सा भी कम नहीं हुआ। यह देखकर बादशाह के आश्चर्य की सीमा नहीं रही। उसके बाद हिंदुत्व की खातिर उन्होंने कर्इ मंदिर भी बनवाए जो आज भी हैं।

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