Tuesday, 17 March 2015

ओशो। … हिंदुस्‍तान में सारी दुनिया से ज्‍यादा उपदेशक क्‍यों है ?

ओशो। … हिंदुस्‍तान में सारी दुनिया से ज्‍यादा उपदेशक क्‍यों है ?

एक रात एक मधुशाला में बड़ी देर तक कुछ मित्र आकर खाना - पीना करते रहे , शराब पीते रहे । उन्‍होंने खूब मौज की और जब वे चलने लगे आधी रात को तो शराब खाने के मालिक ने अपनी पत्‍नी को कहा कि भगवान को धन्‍यवाद बड़े लोग आये । ऐसे लोग रोज आते रहें तो कुछ ही दिनों में हम मालामाल हो जायें ।

विदा होते समय जिसने पैसे चुकाये थे उसने कहा , दोस्‍त भगवान से प्रार्थना करो कि हमारा भी धंधा रोज चलता रहे तो हम रोज आयें । चलते - चलते उसे शराबघर के मालिक ने पूछा भाई तुम्‍हारा धंधा क्‍या है ?
उसने कहां , मेरा धंधा पूछते हो , मैं मरघट पर लकडियां बेचता हूं मुर्दो के लिए । जब आदमी ज्‍यादा मरते है तब मेरा धंधा अच्‍छा चलता है । तब हम थोड़ा खुश हो जाते है । हमारा भी धंधा अच्‍छा चलता रहे तो हम तो रोज यहां आये ।

चिकित्‍सक का धंधा है कि लोगों को ठीक करें । लेकिन फायदा , लाभ और शोषण इसमें है कि लोग बीमार पड़ते रहें । तो एक हाथ से चिकित्‍सक ठीक करता है और उसके प्राणों की प्रार्थना होती है कि मरीज जल्‍दी ठीक न हो जाये । इसीलिए पैसे वाले मरीज ठीक होने में बड़ी देर लगती है । गरीब मरीज जल्‍दी ठीक हो जाया है ; क्‍योंकि गरीब मरीज को ज्‍यादा देर बीमार रहने से कोई फायदा नहीं है । चिकित्‍सक को कोई फायदा नहीं है । 

चिकित्‍सक को फायदा है अमीर मरीज है , तो अमीर मरीज लम्‍बा बीमार रहता है । सच तो यह है कि अमीर अक्‍सर ही बीमार रहते है । यह चिकित्‍सक की प्रार्थनाएं काम कर रही है । उसकी आंतरिक इच्‍छा भी उसके हाथ को रोकती है कि मरीज एकदम ठीक ही न हो जाये ।

उपदेशक की स्‍थिति भी ऐसी ही है । समाज जितना नीतिभ्रष्‍ट फैल जितना अनाचार फैले उतना ही उपदेशक का मंच ऊपर उठने लगता है । क्‍योंकि जरूरत आ जाती है कि वह लोगों को कहे ; अहिंसा का पालन करो , सत्‍य का पालन करो , ईमानदारी स्‍वीकार करो ; यह व्रत पालन करो , वह व्रत पालन करो । अगर लोग व्रती हों , अगर लोग संयमी हों , अगर लोग शांत हों , ईमानदार हों तो उपदेशक मर गया । उसकी कोई जगह न रही ।
हिंदुस्‍तान में सारी दुनिया से ज्‍यादा उपदेशक क्‍यों है ? ये गांव - गांव गुरु और घर - घर स्‍वामी और संन्‍यासी क्‍यों है ? यह महात्‍माओं की इतनी भीड़ और यह कतार क्‍यों है ? यह इसलिए नहीं है कि आप बड़े धार्मिक देश में रहते है , जहां कि संत-महात्‍मा पैदा होते है । यह इसीलिए है कि आप इस समय पृथ्‍वी पर सबसे ज्‍यादा अधार्मिक और अनैतिक देश है । 
इसीलिए इतने उपदेशकों को पालने का ठेका और धंधा मिल गया है । हमारा तो जातीय रोग हो गया है ।

मैंने सुना हे कि अमरीका में किसी ने एक लेख लिखा हुआ था । किसी मित्र ने वह लेख मेरे पास भेज दिया । उसमें एक कमी थी । उसमें लिखा था कि हर आदमी और हर जाती का लक्षण शराब पिलाकर पता लगाया जा सकता है कि बेसिक कैरेक्‍टर क्‍या है ?

उसने लिखा था कि अगर डच आदमी को शराब पिला दी जाये तो वह एकदम से खाने पर टूट पड़ता है , फिर वह किचन के बाहर ही नहीं निकलता । फिर वह एकदम खाने की मेज से उठता ही नहीं । बस शराब पी कि वह दो - तीन घंटे तक खाना खाता रहता है ।

अगर फ्रैंच को शराब पिला दी जायें तो शराब पीने के बाद वह एकदम नाच - गाने के लिए तत्‍पर हो जाता है ।

अंग्रेज को शराब पिला दि जाये तो वह एक दम चुप हो कर एक कोने में बैठ जाता है । वह वैसे ही चुप बैठा रहता है , और शराब पी ली तो उसका कैरेक्‍टर है , वह और चुप हो जाता है । ऐसे दुनिया के सारे लोगों के लक्षण थे ।

लेकिन भूल से यह अज्ञान के वश भारत के बाबत कुछ भी नहीं लिखा था , तो किसी मित्र ने मुझे लेख भेजा और कहा कि आप भारत के कैरेक्‍टर की बाबत क्‍या कहते है । अगर भारतीय को शराब पिलायी जायें तो वह क्‍या करेगा ।

तो मैंने कहा कि वह तो जग जाहिर बात है । भारतीय शराब पियेगा और तत्‍काल उपदेश देना शुरू कर देगा यह उसका कैरेक्‍टरस्‍टिक है , वह उसका जातीय गुण है ।

【यह जो उपदेशकों का समाज और साधु , संतों और महात्‍माओं की लंबी कतार है , ये रोग के लक्षण है , ये अनीति के लक्षण है । और मजा यह है कि इनमें से कोई भी भीतर ह्रदय से कभी नहीं चाहता कि अनीति मिट जाये , रोग मिट जाये ; क्‍योंकि उनके मिटने के साथ वह भी मिट जाते है , प्राणों की पुकार तो यही कहती है कि रोग बना रहे और बढ़ता रहे । 】और उस रोग को बढ़ाने के लिए जो सबसे सुगम उपाय है वह यह है कि जीवन के संबंध में सर्वांगीण ज्ञान उत्‍पन्‍न न हो सके । और जीवन के जो सबसे ज्‍यादा गहरे केंद्र है जिनके अज्ञान के कारण अनीति और व्‍यभिचार और भ्रष्‍टाचार फैलता है , उन केंद्रों को आदमी कभी भी न जान सकें क्‍योंकि उन केंद्रों को जान लेने के बाद मनुष्‍य के जीवन से अनीति तत्‍काल विदा हो सकती है । मैं आपसे कहना चाहता हू्ं कि सेक्‍स मनुष्‍य की अनीति का सवार्धिक केंद्र है । मनुष्‍य के व्‍यभिचार का , मनुष्‍य की विकृति का सबसे मौलिक , सबसे आधारभूत केंद्र और इसलिए धर्मगुरू उसकी बिलकुल बात नहीं करना चाहते है।

~ ओशो (संभोग से समाधी के ओर)

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