Friday, 26 December 2014

टांगीनाथ धाम : यहां पर आज भी है भगवान परशुराम का फरसा

टांगीनाथ धाम : यहां पर आज भी है भगवान परशुराम का फरसा

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टांगीनाथ धाम, झारखंड राज्य मे गुमला शहर से करीब 75 किमी दूर तथा रांची से करीब 150 किमी दूर घने जंगलों के बीच स्थित है। यह जगह अब अति नक्सल प्रभावित क्षेत्र मे आती है। इस जगह का परशुराम से गहरा नाता है। यहां पर आज भी भगवान परशुराम का फरसा ज़मीं मे गडा हुए है। झारखंड में फरसा को टांगी कहा जाता है, इसलिए इस स्थान का नाम टांगीनाथ धाम पड गया। धाम में आज भी भगवान परशुराम के पद चिह्न मौजूद हैं।

टांगीनाथ धाम मे भगवान विष्णु के छठवें अवतार परशुराम ने तपस्या कि थी। परशुराम टांगीनाथ कैसे पहुचे इसकी कथा इस प्रकार है। जब राम, राजा जनक द्वारा सीता के लिए आयोजित स्वयंवर मे भगवान शिव का धनुष तोड देते है तो परशुराम बहुत क्रोधित होते हुए वहा पहुंचते है और राम को शिव का धनुष तो़डने के लिए भला-बुरा कहते है। सब कुछ सुनकर भी राम मौन रहते है, यह देख कर लक्ष्मण को क्रोध आ जाता है और वो परशुराम से बहस करने लग जाते है।

इसी बहस के दौरान जब परशुराम को यह ज्ञात होता है कि राम भी भगवान विष्णु के ही अवतार है तो वो बहुत लज्जित होते है और वहां से निकलकर पश्चाताप करने के लिये घने जंगलों के बीच आ जाते है। यहां वे भगवान शिव की स्थापना कर और बगल मे अपना फरसा ग़ाड कर तपस्या करते है। यहीं जगह आज का टांगीनाथ धाम है। यहां पर गडे लोहे के फरसे कि एक विशेषता यह है कि हजारों सालों से खुले मे रहने के बावजूद इस फरसे पर जंग नही लगी है और दूसरी विशेषता यह है कि ये जमीन मे कितना नीचे तक गडा है इसकी भी कोइ जानकारी नही है। एक अनुमान 17 फीट का बताया जाता है।

कहा जाता है कि एक बार क्षेत्र मे रहने वाली लोहार जाति के कुछ लोगो ने लोहा प्राप्त करने के लिए फरसे को काटने प्रयास किया था। वो लोग फरसे को तो नही काट पाये पर उनकी जाति के लोगो को इस दुस्साहस कि कीमत चुकानी पड़ी और वो अपने आप मरने लगे। इससे डर के लोहार जाति ने वो क्षेत्र छोड़ दिया और आज भी धाम से 15 km की परिधि में लोहार जाति के लोग नही बसते है।

कुछ लोग टांगीनाथ धाम मे गड़े फरसे को भगवान शिव का त्रिशुल बताते हुए इसका सम्बन्ध शिवजी से जोड़ते है। इसके लिए वो पुराणों कि एक कथा का उल्लेख करते है जिसके अनुसार एक बार भगवान शिव किसी बात से शनि देव पर क्रोधित हो जाते है। गुस्से में वो अपने त्रिशूल से शनि देव पर प्रहार करते है। शनि देव त्रिशूल के प्रहार से किसी तरह अपने आप को बचा लेते है। शिवजी का फेका हुआ त्रिशुल एक पर्वत को चोटी पर जा कर धस जाता है। वह धसा हुआ त्रिशुल आज भी यथावत वही पडा है। चुकी टांगीनाथ धाम मे गडे हुए फरसे की उपरी आकर्ति कुछ-कुछ त्रिशूल से मिलती है इसलिए  शिव जी का त्रिशुल भी मानते है।

1989 में पुरातत्व विभाग ने टांगीनाथ धाम मे खुदाई कि थी।  खुदाई में उन्हें सोने चांदी के आभूषण सहित अनेक मूल्यवान वस्तुए मिली थी। लेकिन कुछ कारणों से यहां पर खुदाई बन्द कर दि गई और फिर कभी यहां पर खुदाई नही कि गई। खुदाई में हीरा जडि़त मुकुट, चांदी का अर्धगोलाकार सिक्का, सोने का कड़ा, कान की सोने की बाली, तांबे की बनी टिफिन जिसमें काला तिल व चावल रखा था, आदि चीजें मिलीं थीं। यह सब चीज़े आज भी डुमरी थाना के मालखाना में रखी हुई है। 






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