Wednesday, 26 November 2014

ओशो शरनम् गच्छामि" .....................कौशल— नरेश के पास बद्धरेक नाम का एक महाबलवान हाथी था............Must read it...........



ओशो शरनम् गच्छामि"


कौशल— नरेश के पास बद्धरेक नाम का एक महाबलवान हाथी था। उसके बल और पराक्रम की कहानियां दूर— दूर तक फैली थीं। लोग कहते थे कि युद्ध में उस जैसा कुशल हाथी कभी देखा ही नहीं गया था। बड़े— बड़े सम्राट उस हाथी को खरीदना चाहते थे पाना चाहते थे। बड़ों की नजरें लगी थीं उस हाथी पर। वह अपूर्व योद्धा था हाथी। युद्ध से कभी किसी ने उसको भागते नहीं देखा। कितना ही भयानक संघर्ष हो कितने ही तीर उस पर बरस रहे हो और भाले फेके जा रहे हो वह अडिग चट्टान की तरह खड़ा रहता था। उसकी चिंघाड़ भी ऐसी थी कि दुश्मनों के दिल बैठ जाते थे। उसने अपने मालिक कौशल के राजा की बड़ी सेवा की थी। अनेक युद्धों में जिताया था।

लेकिन फिर वह वृद्ध हुआ और एक दिन तालाब की कीचड़ में फंस गया। बुढ़ापे ने उसे इतना दुर्बल कर दिया था कि वह कीचड़ से अपने को निकाल न पाए।

उसने बहुत प्रयास किए लेकिन कीचड़ से अपने को न निकाल सका सो न निकाल सका। राजा के सेवकों ने भी बहुत चेष्टा की पर सब असफल गया।

उस प्रसिद्ध हाथी की ऐसी दुर्दशा देख सभी दुखी हुए। तालाब पर बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गयी। वह हाथी पूरी राजधानी का चहेता था। गांवभर में उसके प्रेमी थे बाल— वृद्ध सभी उसे चाहते थे। उसकी आंखों और उसके व्यवहार से सदा ही बुद्धिमानी परिलक्षित होती थी!

राजा ने अनेक महावत भेजे पर वे भी हार गए। कोई उपाय ही न दिखायी देता था तब राजा स्वयं गया। वह भी अपने पुराने सेवक को इस भांति दुख में पड़ा देख बहुत दुखी था। राजा को आया देख तो सारी राजधानी तालाब पर इकट्ठी हो गयी।

फिर राजा को बद्धरेक के पुराने महावत की याद आयी। वह भी अब वृद्ध हो गया था। राज्य की सेवा से निवृत्त हो गया था और निवृत्त होकर भगवान बुद्ध के उपदेशों में डूबा रहता था। उसके प्रति भी राजा के मन में बहुत सन्मान था। सोचा शायद वह बूढ़ा महावत ही कुछ कर सके। जन्म— जन्म का जैसे इन दोनों का साथ था—इस हाथी का और महावत का। बुद्ध ने अपनी कहानियों में कहा भी है कि तू इस बार ही इस हाथी के साथ नहीं है पहले भी रहा है। यहां सब जीवन जुड़ा हुआ है। फिर इस जीवन तो पूरे जीवन वह हाथी के साथ रहा था। हाथी उसी के साथ बडा हुआ था उसी के साथ जवान हुआ था उसी के साथ बूढ़ा हो गया था। हाथी को हर हालत में देखा था— शांति में और युद्ध में और हाथी की रग— रग से परिचित था राजा को याद आयी शायद वह बूढ़ा महावत ही कुछ कर सके।

उसे खबर दी गयी। वह बूढ़ा महावत आया। उसने अपने पुराने अपूर्व हाथी को कीचड़ में फंसे देखा। वह हंसा खिलखिलाकर हंसा और उसने किनारे से संग्राम— भेरी बजवायी। युद्ध के नगाड़ों की आवाज सुन जैसे अचानक बूढ़ा हाथी जवान हो गया और कीचड़ से उठकर किनारे पर आ गया। वह जैसे भूल ही गया अपनी वृद्धावस्था और अपनी कमजोरी। उसका सोया योद्धा जाग उठा और यह चुनौती काम कर गयी। फिर उसे क्षण भी देर न लगी।

अनेक उपाय हार गए थे, लेकिन यह संग्राम— भेरी, ये बजते हुए नगाड़े, उसका सोया हुआ शौर्य जाग उठा। उसका शिथिल पड़ गया खून फिर दौड़ने लगा। वह भूल गया एक क्षण को—यादें आ गयी होंगी पुरानी—फिर जवान हो उठा।

क्षण की भी देर न लगी— सुबह से सांझ हुई जा रही थी सब उपाय हार गए थे—और वह ऐसी मस्ती और ऐसी सरलता और सहजता से बाहर आया कि जैसे न वहां कोई कीचड़ हो और न वह कभी फंसा ही था। किनारे पर आकर वह हर्षोन्माद में ऐसे चिंघाड़ा जैसा कि वर्षों से लोगों ने उसकी चिंघाड़ सुनी ही नहीं थी। वह हाथी बड़ा आत्यवान था। वह हाथी संकल्प का मूर्तरूप था।

भगवान के बहुत से भिक्षु भी उस बूढ़े महावत के साथ यह देखने तालाब के किनारे पहुंच गए थे। उन्होंने सारी घटना भगवान को आकर सुनायी। और जानते हैं भगवान ने उनसे क्या कहा?

भगवान ने कहा—भिक्षुओ उस अपूर्व हाथी से कुछ सीखो। उसने तो कीचड़ से अपना उद्धार कर लिया तुम कब तक कीचड़ में फंसे रहोगे? और देखते नहीं कि मैं कब से संग्राम— भेरी बजा रहा हूं? भिक्षुओ जागो और जगाओ अपने संकल्प को। वह हाथी भी कर सका। वह अति दुर्बल बूढ़ा हाथी भी कर सका। क्या तुम न कर सकोगे? मनुष्य होकर सबल होकर बुद्धिमान होकर क्या तुम न कर सकोगे? क्या तुम उस हाथी से भी गए— बीते हो? चुनौती लो उस हाथी से तुम भी आत्यवान बनो और एक क्षण में ही क्रांति घट सकती है एक क्षण में ही एक पल में ही। स्मरण आ जाए भीतर जो सोया है जग जाए तो न कोई दुर्बलता है न कोई दीनता है। स्मरण आ जाए तो न कोई कीचड़ है न तुम कभी फंसे थे ऐसे बाहर हो जाओगे। भिक्षुओ अपनी शक्ति पर श्रद्धा चाहिए। त्वरा चाहिए भिक्षुओ तेजी चाहिए। एक क्षण में काम हो जाता है वर्षों का सवाल नहीं है लेकिन सारी शक्ति एक क्षण में इकट्ठी लग जाए समग्रता से पूर्णरूपेण।

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