Saturday, 8 November 2014

महान वैज्ञानिक चन्द्रशेखर वेंकट रमन............

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चंद्रशेखर वेंकट रामन पहले व्यक्ति थे जिन्होंने विज्ञानं के क्षेत्र में भारत को ख्याति दिलाई। रामन ने स्वाधीन भारत में विज्ञान के अध्ययन और शोध को जो प्रोत्साहन दिया उसका अनुमान कर पाना कठिन है। डॉ.रामन को उनके योगदान के लिए भारत के सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न और नोबेल पुरस्कार, लेनिन पुरस्कार जैसे अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।



श्री रामन संगीत, संस्कृत और विज्ञान के वातावरण में बड़े हुए थे । उनके पिता को पढ़ने का बहुत शौक़ था। इसलिए उन्होंने अपने घर में ही एक छोटी-सी लाइब्रेरी बना रखा थी। रामन का विज्ञान और अंग्रेज़ी साहित्य की पुस्तकों से परिचय बहुत छोटी उम्र से ही हो गया था।

वह हर कक्षा में प्रथम आते थे। रामन ने 'प्रेसीडेंसी कॉलेज' में बी. ए. में प्रवेश लिया। 1905 में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाले वह अकेले छात्र थे और उन्हें उस वर्ष का 'स्वर्ण पदक' भी प्राप्त हुआ। उन्होंने 'प्रेसीडेंसी कॉलेज' से ही एम. ए. में प्रवेश लिया और मुख्य विषय के रूप में भौतिक शास्त्र को लिया।

कुछ दिनों के बाद रामन ने एक शोध पेपर लिखा और लन्दन में विज्ञान की अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पत्रिका 'नेचर' को भेजा। रामन ने उस समय के एक सम्मानित और प्रसिद्ध वैज्ञानिक लॉर्ड रेले को एक पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने लॉर्ड रेले से अपनी वैज्ञानिक खोजों के बारे में कुछ सवाल पूछे थे। लॉर्ड रेले ने उन सवालों का उत्तर उन्हें प्रोफ़ेसर सम्बोधित करके दिया। वह यह कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि एक भारतीय किशोर इन सब वैज्ञानिक खोजों का निर्देशन कर रहा है।

'ऑप्टिकस' नाम के विज्ञान के क्षेत्र में अपने योगदान के लिये सन् 1924 में रामन को लन्दन की 'रॉयल सोसाइटी' का सदस्य बना लिया गया। यह किसी भी वैज्ञानिक के लिये बहुत सम्मान की बात थी।

रामन के सम्मान में दिये गये भोज में आशुतोष मुखर्जी ने उनसे पूछा,-
अब आगे क्या? 
तुरन्त उत्तर आया- अब नोबेल पुरस्कार।

भौतिकी का नोबेल पुरस्कार सन् 1927 में, अमेरिका में, शिकागो विश्वविद्यालय के ए. एच. कॉम्पटन को 'कॉम्पटन इफेक्ट' की खोज के लिये मिला। यह घटना 28 फ़रवरी सन् 1928 में घटी। अगले ही दिन वैज्ञानिक रामन ने इसकी घोषणा विदेशी प्रेस में कर दी। प्रतिष्ठित पत्रिका 'नेचर' ने उसे प्रकाशित किया। इस महान खोज की याद में 28 फ़रवरी का दिन हम 'राष्ट्रीय विज्ञान दिवस' के रूप में मनाते हैं। सन् 1928 में इसी दिन देश में सस्ते उपकरणों का प्रयोग करके विज्ञान की एक मुख्य खोज की गई थी।

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