Friday, 21 November 2014

हिंदी हास्य कविता ................तुम कंप्यूटर युग की छोरी, मन की काली तन की गोरी

हिंदी हास्य कविता 


तुम कंप्यूटर युग की छोरी, मन की काली तन की गोरी,
किंचित अपनी बाहों का गल हार नहीं दे पाऊंगा।।
तुम करना मुझको माफ़, तुम्हें मैं प्यार नहीं दे पाऊंगा।

तुम फैशन टी.वी.सी लगती हो, मैं संस्कार का चैनल हूं,
तुम बंद बिसलेरी की बोतल, मैं गंगा का पावन जल हूं,
तुम करो मारुती की मांगे, मैं पांव-पांव चलने वाला,
तुम हैलोजन सी जलती हो, मैं दीपक सा जलने वाला,
तो तुमको ये चमक धमक वाला, संसार नहीं दे पाऊंगा।।
तुम करना मुझको माफ़ तुम्हें, मैं प्यार नहीं दे पाऊंगा।।

तुम पॉप म्यूजिक सी बजती, मैं बंसी की धुन का धुनिया,
मुझ पर डॉट कॉम भी न, तुम पर इंटरनेटी दुनिया,
तुम मोबाइल के मेसेज सी, मैं पोस्टकार्ड लिखने वाला,
तुम टेडी बेयर सी लगती, मैं गुब्बारा उड़ने वाला,
तो तुमको भौतिक सुख साधन संचार नहीं दे पाऊंगा।।
तुम करना मुझको माफ़ तुम्हें मैं प्यार नहीं दे पाऊंगा।।

तुम क्लॉक अलारम से न जगो, मैं गौ गायन से जगता हूं,
तुम डिस्को की धुन पर नाचो, मैं राम नाम ही जपता हूं,
तुम डैडी को अब डैड कहो, मम्मी को ममी बताती हो,
तुम करवा चौथ भूल बैठी, अब वैलेंटाइन मानती हो,
तो तुम्हे तुम्हारे स्वप्नों का त्यौहार नहीं दे पाऊंगा,
तुम करना मुझको माफ़ तुम्हें, मैं प्यार नहीं दे पाऊंगा।।

तुम रैम्प पे देह दिखाती हो, मैं संस्कार में जीता हूं,
जब तुम्हे देख बजती सीटी, मैं घूंट लहू का पीता हूं,
तुम सदा स्वप्न में जीती हो, मैं हूं यथार्थ जीने वाला,
तुम सूप सुंदरी पीती हो, मैं हूं मट्ठा पीने वाला,
तो तुम्हे और तुम्हारे सौंदर्य को श्रृंगार नहीं दे पाऊंगा।।
तुम करना मुझको माफ तुम्हें मै प्यार नहीं दे पाऊंगा..!!!

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