Friday, 10 October 2014

भन्गी.......फिर भेदभाव क्यों ..............Mind Blowing .......



एक थे पण्डित जी और एक थी पण्डिताइन।
पण्डितजी के मन में जातिवाद कूट-कूट कर भरा था।
परन्तु पण्डिताइन समझदार थी।
समाज की विकृत
रूढ़ियों को नही मानती थी।
एक दिन पण्डित जी को प्यास लगी।
संयोगवश् घर में पानी नही था।
इसलिए पण्डिताइन पड़ोस
से पानी ले आयी।
पानी पीकर पण्डितजी ने पूछा।)

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पण्डितजी- कहाँ से लाई हो। बहुत
ठण्डा पानी है।

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पण्डिताइन जी- पड़ोस के कुम्हार के घर से।
(पण्डित जी ने यह सुन कर लोटा फेंक दिया और उनके
तेवर चढ़ गये।
वे जोर-जोर से चीखनेलगे।)
पण्डित जी- अरी तूने तो मेरा धर्म भ्रष्ट
कर दिया।
कुम्हार के घर का पानी पिला दिया। (पण्डिताइन भय से
थर-थर काँपने लगी, उसने पण्डित
जी से माफी माँग ली।)

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पण्डिताइन- अब ऐसी भूल
नही होगी। (शाम को पण्डित
जी जब खाना खाने बैठे तो पण्डिताइन ने उन्हें
सूखी रोटियाँ परोस दी।).

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पण्डितजी- साग नही बनाया।

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पण्डिताइन जी- बनाया तो था, लेकिन फेंक दिया।
क्योंकि जिस हाँडी में वो पकाया था, वो तो कुम्हार के घर
की थी।
पण्डितजी- तू तो पगली है।
कहीं हाँडी में भी छूत
होती है?
(यह कह कर पण्डित जी ने दो-चार कौर खाये और
बोले-)
पण्डितजी- पानी तो ले आ। पण्डिताइन
जी-पानी तो नही है
जी।
पण्डितजी- घड़े कहाँ गये? पण्डिताइन जी-
वो तो मैंने फेंक दिये।
कुम्हार के हाथों से बने थे ना। (पण्डित जी ने फिर दो-चार
कौर खायेऔर बोले-)
पण्डितजी- दूध ही ले आ। उसमें ये
सूखी रोटी मसल कर खा लूँगा।
पण्डिताइन जी-दूध भी फेंक
दिया जी।
गाय को जिस नौकर ने दुहा था, वह भी कुम्हार
ही था।
पण्डितजी- हद कर दी! तूने तो, यह
भी नही जानती दूध में छूत
नही लगती।

पण्डिताइन जी- यह कैसी छूत है
जी! जो पानी में तो लगती है,
परन्तु दूध में
नही पण्डितजी जी के मन में
आया कि दीवार से सर फोड़ ले, गुर्रा कर बोले-)
पण्डितजी- तूने मुझे चौपट कर दिया। जा अब आँगन में
खाट डाल दे। मुझे नींद आ रही है।
पण्डिताइन जी- खाट! उसे तो मैंने तोड़ कर फेंक दिया।
उसे नीची जात के आदमी ने
बुना था ना।
(पण्डित जी चीखे!)

पण्डितजी- सब मे आग लगा दो।
घर में कुछ बचा भी है या नही।
पण्डिताइन जी- हाँ!
घर बचा है। उसे भी तोड़ना बाकी है।
क्योकि उसे भी तो नीची जाति के
मजदूरों ने ही बनाया है।

(पण्डित जी कुछ देर गुम-सुम खड़े रहे! फिर बोले-)
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पण्डितजी- तूने मेरी आँखें खोल
दीं।
मेरी ना-समझी से ही सब
गड़-बड़ हो रही थी।
कोई भी छोटा बड़ा नही है।
सभी मानव समान हैं!......
सभी एक दुसरेँ के पुरक हैँ
फिर भेदभाव क्यों
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टायलेट
पाण्डेय जी अपने लड़के का हाथ पकड़कर खींचते हुए बड़बड़ाये-''अछूत को छूता है, धर्म भ्रष्ट करेगा, चल अंदर। पण्डिताइन को रोते हुए लड़के पर तरस आया और बोली-''क्या हुआ? क्यों बच्चे को इतना डाँट रहे हो।'' पाण्डेय जी ने क्रोध के उसी तेवर में कहा- ''भंगी को छूकर आ रहा है तुम्हारा लाडला। हजार बार कहा है कि उन लड़कों के साथ मत खेल पर मानता ही नहीं है। अब जायेगा खेलने... बोल...'' तड़ाक-एक जोर का थप्पड़ लड़के को जड़ दिया पण्डित जी

ने। लड़का रोते-रोते माँ के पल्लू में छुप गया। पण्डिताइन ने बच्चे को प्यार से समझाया-''बेटा! ये लोग दूसरे के द्घरों का टायलेट सापफ करते हैं। इनकी जाति गंदी होती है, इन्हें छूना नहीं चाहिए। तीन साल के भोले बच्चे ने डर और प्यार से चेहरा देखा और हुंकारी भर दी। सभी अपने-अपने काम में लग गये। तभी पण्डिताइन ने कहा ''सुनिए जी! आज शाम को कथा रखी है। मेरा तो काम पफैला हुआ है, आप टायलेट सापफ कर दीजिए।'' पण्डित जी बड़बड़ाये- इस बड़े शहर में कोई भंगी नहीं मिलता है। नौकरी पाकर सब बड़े आदमी हो गये हैं।'' और टायलेट सापफ करने चले गये। नन्हा बच्चा बोलना सीख रहा था। पा(पा... टालेट... पा (( पा... भन्गी ई ई ई...।))

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