Friday, 3 October 2014

Hindi Hasya Funny Poems ...........



आदिकाल से रही है परिवार के लिए बीबी की जरूरी,
लेकिन आजकल हर घर में है टी०वी० की मजबूरी।

टी०वी० के कई चैनल होते हैं,
और उन चैनलों के अलग अलग पैनल भी होते हैं।
एक ओर योग द्वारा रोग-मुक्ति के उपाय सुझाये जाते हैं, 
तो दूसरी ओर सिगरेट और शराब के विज्ञापन दिखाये जाते हैं।

बात समझ में आये, यह जरूरी नहीं,
पर अंग्रेजी चैनल देखना अनिवार्य है,
वर्तमान भारत में शान से जीने के लिए,
अंग्रेजियत की छाप भी तो अपरिहार्य है।

दो वक्त की रोटी भी जिसे नहीं मिलती,
उसकी संख्या सत्तर प्रतिशत के लगभग है,
पर अमूल वाले अपने विज्ञापन में समझाते हैं कि,
असली मक्खन के स्वाद पे सभी का हक है।

हजारों पूल और मकान बनते ही गिर जाते हैं,
बेवजह कई लोग मर जाते हैं,
सरकारी पक्ष बिठाते हैं जाँच आयोग,
रिपोर्ट आने पर विपक्षी कहते, गलत है अभियोग,
लेकिन असली कारण से सब अनजान है,
जबकि बिड़ला वाले रोज समझाते हैं कि इस सीमेंट में जान है।

कहीं सिनेमा तो कहीं सिर्फ गाना सुनाया जाता है,
कहीं रिमिक्स के नाम पर,
अत्यन्त छोटा और पारदर्शी कपड़ा पहनाया जाता है।
कई चैनलों में सबेरे सबेरे सुनायी पड़ती है संतों की वाणी,
तो किसी के कैमरे में कैद है,
उन्हीं संतों के काले कारनामे की कहानी।

सेविंग ब्लेड से लेकर ट्रेक्टर के टायर तक,
नारी देह का खुला प्रदर्शन होता है,
"यत्र नार्यास्तु पूज्यन्ते" का प्राचीन सिद्धान्त,
अपने आप पे रोता है।

एक तरफ दिखलाया जाता है महिलाओं का शोषण,
तो दूसरी ओर चलता है महिला-मुक्ति का आन्दोलन,
और महिला-मुक्ति आन्दोलन का समाज पे इतना प्रभाव है,
कि जन्म से पहले ही "मुक्ति" का प्रस्ताव है।

कहीं "आस्था" कहीं "साधना" तो कहीं "संस्कार" है,
कई चैनलों में तो सिर्फ समाचार ही समाचार है,
जिसका कैमरा सिर्फ चंद लोगों के इर्द गिर्द घूमता,
क्योंकि आम जनता से उसे क्या सरोकार है?
अपराधी-ब्रांड नेता की जब होती है जेल-यात्रा,
तो समाचार वाले, लाइव कवरेज करके,
बना देते इसको शोभा-यात्रा।
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कुत्ता जब आदमी को काटता है,
तो क्या यह 'समाचार' बन पाता है?
अगर आदमी कुत्ता को काट खाये,
तो तत्काल यह सुर्खियों के समाचार बन जाये।

एक दिन गजब हुआ,
एक पागल कुत्ता ने,
एक महत्वपूर्ण दल के महत्वपूर्ण नेता को काटा,
न्यूज चैनल वालों ने इसे,
तत्काल हाट केक की तरह बाँटा।
एक चैनल नेताजी के घाव तथा
इलाज का लाइव टेलिकास्ट दिखा रहा था,
तो दूसरा उस कुत्ता के नस्ल और
इतिहास का पता लगा रहा था।
सब अपने आप में इतना व्यस्त थे कि
मानो पूरा का पूरा देश ठहर गया,
पर सच मानिये जनाब, एक घंटे बाद,
नेता मुस्कुरा रहा था और कुत्ता मर गया।
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यूँ तो हम हर साल दशहरा मनाते हैं,
रावण के पुतले को पटाखों से सजाकर,
सामूहिक उत्सव में धूमधाम से जलाते हैं।
और नकली रावण को जलाने के लिए
अक्सर असली रावण को बुलाते हैं,

पटाखों की हर आवाज के साथ,
रावण अट्टाहास करता है,
क्योंकि भारत में कई कलियुगी रावण,
बड़े मजे से राज करता है।।

होकर व्यथित राम ने सोचा,
कुछ न कुछ अब करना होगा।
जल्द से जल्द किसी तरह भी,
राम के खाली पदों को भरना होगा।।
क्योंकि हर रावण के पीछे राम चाहिए,
अंगद और हनुमान चाहिए।
राम राज्य लाने की खातिर,
विभीषण जैसा नाम चाहिए।

रावण बोला हे राम,
तू व्यर्थ देख रहा है सपना।
इतने बरस बीत गए,
क्या बनबा सका तू मंदिर अपना।।

राम बोला हे दशकंधर,
तेरी संख्या लगातार बढ़ रही है अंदर अंदर।
मेरे भक्त मेरे ही रथ पे होकर सवार,
कर दिया मुझको बेबस और लाचार।।

हे दशानन,
तेरे विचार लगते अब पावन।
तुम्हीं बताओ कोई राह,
जो पूरा हो जन जन की चाह।।

रावण बोला हे राम,
तुम व्यर्थ ही हो परेशान।
आओ हम तुम मिलकर,
चुनाव पूर्व गठबंधन बनायें।
जीत जाने पर
प्रजा को ठेंगा दिखायें।।
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जब भी कोई नयी कविता बनाता हूँ,
खुशी से आत्म-मुग्ध हो जाता हूँ,
अगर कोई सुनने वाला नहीं मिलता,
तो अपने आप गुनगुनाता हूँ।

हजारों पत्नियाँ पतिव्रता होतीं हैं,
लेकिन मैं पत्नीव्रत पति के रूप में प्रसिद्ध हूँ,
घर, कपड़े की सफाई से लेकर,
चूल्हा-चौका के कार्यों में सिद्ध हूँ।
मेरे मित्र और परिचित अक्सर मेरा मजाक उड़ाते हैं,
समय, बेसमय तरह तरह के उपनाम से मुझे चिढ़ाते हैं,
मैं बिना प्रतिवाद के सब सुन लेता हूँ,
बदले में उन नासमझों को एक फीकी मुस्कान भर देता हूँ।
मेरी विवशता कुछ खास है,
पत्नी को काम के बोझ से मुक्त कराने का एक छोटा प्रयास है,
ताकि वो आसानी से मेरी कविता सुन सके,
क्योंकि मुझे एक अदद श्रोता की तलाश है।

लगातार कविता सुनते सुनते पत्नी हो गयी तंग,
पलक झपकते ही दिखलाया उसने अपना असली रंग,
बोली-हे कविरूपधारी पतिदेव,
मैं तो आपके चरणों की दासी हूँ,
सात जन्मों तक साथ निभाऊँ,
इसी आस की प्यासी हूँ।
वादा करती हूँ स्वामी, आप जैसा कहेंगे वैसा ही करूँगी,
पर एक विनती है प्राणनाथ,
भबिष्य में आपकी कविता नहीं सुनूँगी।

टूट गयी मेरी सब आशा,
पत्नी ने दी घोर निराशा,
कई बार सुन चुका हूँ, भगवान के घर में देर है,
पर वहाँ हमेशा के लिए नहीं अंधेर है।

रात के बारह बजे मेरी एक कविता पूरी हुई,
बेरहम समय के कारण प्रिय श्रोताओं से दूरी हुई,
हिम्मत करके खोला गेट,
बाहर मिला एक भिखारी ग्रजुएट,
मन हुआ आर्कमिडीज की तरह यूरेका यूरेका चिल्लाऊँ,
तुरन्त खयाल आया,
क्यों न आज इसी भिखारी को चाय पिलाऊँ,
भिखारी चाय पीने को हुआ तैयार,
मेरे मन में उपजा प्यार,
मैंने झटपट चाय चढ़ायी,
और तरातर उसे चार कविता सुनायी,
पाँचवीं की जब बारी आयी,
भिखारी लेने लगा जोर की जम्हाई,
यह परमानेन्ट श्रोता बन सकता है,
सोचकर मेरे मन का सुमन खिला,
पर हाय री मेरी किस्मत,
उस दिन से आज तक मुझे वह भिखारी नहीं मिला।

हारना मुझे नहीं स्वीकार,
फिर से मैंने किया विचार,
अपने जैसे बेचैन आत्माओं का बनाया लेखक संघ,
कुछ ही दिनों में सबने बदल लिया अपना ढ़ंग,
यूँ तो पढ़े लिखे लोगों ने समाज को बहुत कुछ दिया है,
पर चालाकी से उसी ने समाज का बहुत नुकसान भी किया है,
ठीक उसी प्रकार के चालाक कवि,
अपनी अपनी कविता सुनाकर सभागार से बाहर जाने लगे,
मेरे जैसे कुछ बुद्धू कविगण,
वाह वाह की तेज नाखूनों से एक दूसरे की पीठ खुजाने लगे।

वैसे भी आजादी के बाद से अबतक,
शेयर बाजार के सूचकांक की तरह,
श्रोताओं में भारी गिरावट और वक्ताओं में उछाल दर्ज है,
फिर बेरोजगारों की इस भारी भीड़ को,
श्रोता बना लेने में क्या हर्ज है,
नेता से लेकर अभिनेता तक सभी यही नुस्खा अपनाते हैं,
इसी बहाने, सीजनल ही सही,
बेरोजगारों को रोजगार तो मिल जाते हैं,
अपनी अपनी हैसियत के हिसाब से,
भाड़े में श्रोता जुगाड़ कर लिया जाता है,
यह कैसी व्यवस्था की बेबसी है कि,
आदमी को श्रोता से सामान बना दिया जाता है।
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