Saturday, 25 October 2014

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में इतनी ऊर्जा कहां से आती है ??




प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे तो एक बार एक बच्चे ने उनसे सवाल पूछा कि उनमें इतनी ऊर्जा कहां से आती है। जवाब में मोदी ने कहा था कि योग उन्हें कड़ी मेहनत के लिए तैयार करता है। ये बात इसलिए हो रही है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिना पहले ट्रेनिंग लिए, बिना किसी तैयारी के सियाचिन पहुंचकर सभी को चौंका दिया है।

नरेंद्र मोदी ने वहां कहा कि जब तक कोई इन बर्फीले ग्लेशियर को नहीं देखेगा, माइनस 30-40 डिग्री में जवान कैसे तैनात होता है, इसे नहीं देखेगा, तो उसे कल्पना नहीं आ सकती कि हमारी फौज, हमारे हवान कितनी कठिनाइयों के बीच, कितने दुर्गम इलाकों में, मातृभूमि की रक्षा के लिए पुरुषार्थ कर रहे हैं।

मोदी जितनी देर सियाचिन की बर्फीली पहाड़ियों में सैनिकों के बीच रहे, उनका चेहरा चमकता रहा। जबकि आमतौर पर ऐसे ही अचानक सियाचिन पहुंचने का मतलब है जबर्दस्त सिरदर्द, असामान्य ब्लड प्रेशर, सांस लेने में तकलीफ लेकिन मोदी को जैसे इतनी ऊंचाई से कोई फर्क नहीं पड़ा। जवानों से मिलने के बाद मोदी जब हेलीकॉप्टर की तरफ बढ़े तो भी ऐसा नहीं लगा कि उनकी सेहत पर कोई असर हुआ है।

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल पी एन हूण के मुताबिक ये आसान यात्रा नहीं थी। 15 हजार फीट से ऊपर ऑक्सीजन की कमी होती है, इसलिए कोई सीधा इतनी ऊंचाई पर नहीं जाता। पहले उसे परिवेश में ढलना पड़ता है। 1984 में जब हमने ये जगह हासिल की थी तब हमने अपने जवानों को कई दिन तक इस तरह की ऊंचाई पर रहने की ट्रेनिंग दी थी।

ऐसे में सियाचिन की 15 हजार फीट की ऊंचाई पर 64 साल के प्रधानमंत्री को इस तरह देखना देश के लिए एक बड़ा सवाल भी लेकर आया। सवाल ये कि आखिर वो कौन सी शक्ति है, जिसकी वजह से मोदी को 15 हजार फीट की ऊंचाई पर कोई दिक्कत नहीं हुई? आखिर वो कौन सा जादू है जो मोदी को सियाचिन पर भी आराम से जाने देता है? आखिर वो कौन सी ताकत है, जो मोदी को 18 घंटे तक काम की शक्ति देती है?


सियाचिन ग्लेशियर जाने की ये है प्रक्रिया


लेह के ट्रांजिट कैंप से सियाचिन जाने की पूरी एक प्रक्रिया है। लेह के ट्रांजिट कैंप में आपके ब्लड प्रेशर पर लगातार नजर रखी जाती है। 6 दिन तक लगातार आर्मी हॉस्पिटल में ब्लड शुगर और यूरीन की जांच होती है। 6 में से 4 दिन तीन से पांच किलोमीटर तक पैदल चलाया जाता है। जांच रिपोर्ट देखने के बाद सीएमओ स्टेज- II की इजाजत देता है। स्टेज-II का मतलब है सियाचिन बेस कैंप तक जाना। सियाचिन बेस कैंप में पहुंचने के बाद फिर 6 दिन रुकना होता है। पहले दो दिन मौसम के लिहाज से खुद को ढालना होता है। तीसरे दिन से बेस कैंप के आसपास पैदल चलाया जाता है। 6 दिन तक लगातार ब्लड प्रेशर पर नजर रखी जाती है। सारी जांच की रिपोर्ट ठीक आने पर स्टेज-III की मंजूरी मिलती है। स्टेज-III का मतलब होता है सियाचिन ग्लेशियर। यहां भारतीय सेना की करीब 150 पोस्ट हैं। आमतौर पर एक फौजी की सियाचिन पर सिर्फ 3 महीने के लिए तैनाती होती है लेकिन तीन महीने की तैनाती के लिए भी फौजियों को 3 हफ्ते की खास ट्रेनिंग लेनी पड़ती है।

साफ है कि सियाचिन तक पहुंचने के लिए दो-तीन हफ्ते की ट्रेनिंग जरूरी होती है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसी कोई ट्रेनिंग नहीं ली। वो सीधे पहुंच गए सियाचिन, देश के जवानों के साथ दिवाली मनाने। उन जवानों के साथ जो करीब 30 साल से सियाचिन के बर्फीले रेगिस्तान में भारत-पाकिस्तान की फौज की सामरिक स्थिति को बनाए हुए हैं। मोदी अगर बिना किसी तैयारी के दुनिया के सबसे ऊंचे रणक्षेत्र में पहुंच गए तो इसका श्रेय योग को दिया जा रहा है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था जब किसी प्रधानमंत्री ने दुनिया के सबसे दुश्वार रणक्षेत्र में जाकर जवानों के साथ दीवाली मनाई हो।


सियाचिन में सबसे बड़ा दुश्मन है मौसम


सियाचिन यानी दुनिया का सबसे ऊंचा रणक्षेत्र। यहां दुश्मन से खतरा कम होता है और वहां तैनात फौजी दुश्मन की गोली से नहीं बल्कि बेरहम मौसम-दुर्गम ऊंचाइयों का मुकाबला करते हुए मारे जाते हैं। सियाचिन ऐसी जगह है जहां सिर्फ बर्फ ही बर्फ है, बर्फ के सिवा कुछ नहीं है। यहां सांस लेने के लिए पूरी ऑक्सीजन नहीं मिलती। पीने के लिए पानी नहीं मिलता। सियाचिन में अक्सर दिन में भी तापमान शून्य से 40 डिग्री नीचे और रात में माइनस 70 डिग्री तक चला जाता है।

सियाचिन की ऊंचाइयों पर देश की सरजमीं की रक्षा करते हुए 1984 से 2012 तक 846 सैनिक मारे जा चुके हैं। इसके बावजूद देश की सरजमी की रक्षा करने के लिए देश को यहां पूरे साल अपने फौजियों को तैनात रखना पड़ता है, क्योंकि सियाचिन में आमने सामने डटी हुई हैं भारत और पाकिस्तान की सेनाएं। यहां जाना कितना कठिन है इस बात का अंदाजा आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि एक सामान्य नागरिक के तौर पर यहां पहुंचना नामुमकिन है। अगर आप बहुत अच्छे पर्वतारोही हैं तभी भी आपको सियाचिन जाने के लिए कड़ी ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है।


तैनाती से पहले होती है फौजियों की ट्रेनिंग


भारतीय फौजियों को सियाचिन की तैनाती के लिए कश्मीर के खिल्लनमर्ग के गुज्जर हट में करीब साढ़े तेरह हजार फुट की ऊंचाई पर एक विशेष ट्रेनिंग सेंटर बनाया गया है। सेना के इस ट्रेनिंग सेंटर को हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल कहते हैं। इसी स्कूल में सेना के जवानों को बर्फ पर रहने, पहाड़ काट कर ऊंचाई पर चढ़ने, भयंकर सर्दी में भी लड़ने की ट्रेनिंग दी जाती है। ट्रेनिंग पूरी हो जाने के बाद सैनिकों को सियाचिन ग्लेशियर से पहले बने बेस कैंप तक ले जाया जाता है, जहां से सियाचिन की चौकियों पर तैनाती के लिए हेलीकॉप्टर से सफर करना पड़ता है। इन चौकियों पर रसद और गोला-बारूद की अपूर्ति भी हेलीकॉप्टर से ही की जाती है, और कोई सैनिक बीमार पड़ जाए तो उसे बेस कैंप के अस्पताल में पहुंचाने के लिए भी हेलीकॉप्टर का ही इस्तेमाल किया जाता है।

एक औसत आंकड़ा है कि अगर पूरी तरह फिट लोगों की 20 लोगों की टीम सियाचीन के लिए निकलती है तो सिर्फ 10 लोग ही वहां तक पहुंच पाते हैं। बाकी को बीच रास्ते में वापस लौटना पड़ता है। आपकी सेहत से जुड़ा एक भी पैरामीटर गड़बड़ होने पर तुरंत आपको वापस भेज दिया जाता है। ऐसे में दिल्ली से अक्टूबर के हल्के जाड़े में हमारे प्रधानमंत्री सियाचिन के लिए निकले और वहां तैनात सैनिकों का हौसला बढ़ाया।

योग ने बनाया मोदी को फिट और हिट

रिटायरमेंट के बाद की जिस उम्र में ज्यादातर लोग भक्ति और वैराग्य की बात करते हैं, उस उम्र में भारत के प्रधानमंत्री नौजवानों से लेकर कामकाजी लोगों के लिए हौसले और उम्मीद के प्रतीक बन गए हैं। हमेशा ऊर्जा से लबालब रहने वाले नरेंद्र मोदी को कहां से मिलता है ये सब। ये रहस्य नहीं। खुद प्रधानमंत्री कई मौकों पर इसका खुलासा कर चुके हैं। बहुत कम लोगों को ये पता होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को योग में महारथ हासिल है। वो योग के तमाम आसन आसानी से कर लेते हैं। योग ही उन्हें वो शक्ति देता है जिसके चलते वो सियाचिन की बर्फीली पहाड़ियों पर बिना किसी तैयारी के पहुंच गए। सैनिकों से मिले और घंटों वहां बिताए। योग के साथ मोदी का रिश्ता दशकों पुराना है। हर रोज अपने व्यस्त कार्यक्रम में से कुछ वक्त निकालकर मोदी योग जरूर करते हैं। योग के प्रति उनकी आस्था ही है जिसकी वजह से उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने संबोधन के दौरान अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाए जाने का आह्वान किया था। ये योग ही है जो मोदी को फिट रहे हैं और हिट भी रखे है ।

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