Wednesday, 22 October 2014

दीपावली पर हिंदी कवितायेँ............

दीपावली पर हिंदी कवितायेँ............


कुम्हारन बैठी रोड़ किनारे,लेकर दीये दो-चार।
जाने क्या होगा अबकी,करती मन में विचार।।
याद करके आँख भर आई,पिछली दीवाली त्योहार।
बिक न पाया आधा समान,चढ गया सर पर उधार।।
सोंच रही है अबकी बार,दूँगी सारे कर्ज उतार। 
सजा रही है, सारे दीये करीने से बार बार।। 
पास से गुजरते लोगों को देखे कातर निहार।
बीत जाए न अबकी दीवाली जैसा पिछली बार।
नम्र निवेदन मित्रों जनों से,करता हुँ मैँ मनुहार। 
मिट्टी के ही दीये जलाएँ,दीवाली पर अबकी बार।। .... Prasoon Singh
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पर्वों का मेला दीवाली




याद दिलाने सिया-राम की
भरने उर में रस उजास का,
जगमग करता घर चौराहे
आया उत्सव फिर प्रकाश का !

दीपों की ये दीर्घ कतारें
गगन उतर आया ज्यों भू पर,
तमस मिटाने अंतरतम् का
आया है दीपों का उत्सव !

कोना-कोना अपने घर का
स्वच्छ करें, चमचम चमकाते ,
रंगोली, तोरण, ध्वज, लड़ियाँ
भर उर में उल्लास सजाते  !

अंधकार में लख प्रकाश को
लक्ष्मी भूलोक पर आतीं,
देख उजाला जगमग राहें
यहीं अटक कर वह रह जातीं !  

धनतेरस दो दिन पहले है
पर्वों का मेला दीवाली,
एक आस्था युगों-युगों से
बन इक धारा बहती आती !

नरकासुर का अंत हुआ था  
नरसिंह रूप धरा विष्णु ने,
धनवंतरि भी जन्मे इस दिन
लक्ष्मी प्रकटी थीं सागर से !

एक दीप तुलसी के चौरे
याद उसी की कर रख आते,
मीलों तक वैभव हो शोभित,
द्वारे द्वारे दीप जलाते !

यम पूजा छोटी दीवाली
खील, बताशे, खाँड, मिठाई,
गुंजित होता नभ शुभ स्वर से
पूजित हों गणपति, लक्ष्मी !

काली थी जो रात अमावस
पूनम से भी ज्यादा रोशन,
याद कृष्ण की हमें दिलाये
अगले दिन पूजित गोवर्धन !

भाईदूज चला आता फिर
स्नेह बढ़ाता सहोदरों में
अंधकार की हुई पराजय
छा जाती उमंग हर दिल में ! 
by Anita
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झूल रहे कंदील हवा में
क्या क्या रंग दिखाएँ 

रोशनियाँ तीली ने बदलीं
चकरी हुई सयानी 
सहमी सहमी जले फुलझड़ी
गुपचुप कहे कहानी 

राकेट फुर्र हुये तेजी से
वापस घर ना आएँ .

आँगन में जगमगा रही है
ये बनावटी लड़ियाँ
यूँ तो जले दीप बाती 
पर ,टूट रही है कड़ियाँ

बिखर रहे माला के मोती
शायद ही जुड़ पाएँ  

हुई विलीन कहाँ, ना जाने 
वह खुशियों की दुनिया
तारे गिनती बैठी है 
आँगन में छोटी मुनियाँ 

शायद कोई तारा टूटे 
खुशियाँ घर मेंआएँ 
--  शशि पुरवार
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एक मूर्ति बेचने वाले के लिए 
दो लाइन अर्ज है, पसंद आये तो शेयर जरुर किजीयेगा।
बच्चे उस गरीब के खा सके
खाना त्योहारों में.....
तभी तो भगवान खुद बिक जाते है

बाजारों में....
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चाक घुमा कर हाथ से, गढ़े रूप आकार।
समय चक्र ऐसा घुमा, हुआ बहुत लाचार।।
चीनी झालर से हुआ, चौपट कारोबार।
मिट्टी के दीये लिए, बैठा रहा कुम्हार।।
माटी को मत भूल तू, माटी के इंसान।
माटी का दीपक बने, दीप पर्व की शान।।


सज धज कर तैयार है, धनतेरस बाजार।
महँगाई को भूल कर, उमड़े खरीददार।।
सुख, समृद्धि, सेहत मिले, बढ़े खूब व्यापार।
घर, आँगन रौशन रहे, दूर रहे अँधियार।।
कोई मालामाल है, कोई है कंगाल।
दरिद्रता का नाश हो, मिटे भेद विकराल।।


चकाचौंध में खो गयी, घनी अमावस रात।
दीप तले छुप कर करे, अँधियारा आघात।।
दीपों का त्यौहार यह, लाए शुभ सन्देश।
कटे तिमिर का जाल अब, जगमग हो परिवेश।। 
ज्योति पर्व के दिन मिले, कुछ ऐसा वरदान।
ख़ुशियाँ बरसे हर तरफ़, सबका हो कल्याण।।


 हिमकर श्याम 
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एक नहीं ले पांच पर्व , दीपोत्सव संग में लाया है ,
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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पांच पर्व का महापर्व ,जन-जन सर्वत्र मनाता है ,
कार्तिक मास की त्रयोदशी से ये आरम्भ हो जाता है ,
नीरस जीवन में रस भर दे इस उत्सव की ये माया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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त्रयोदशी का पर्व महा ;धनतेरस रूप में प्रचलित है ,
पूजे जाते धन्वन्तरी हैं ;आयुर्वेद के जनक जो है ,
स्वस्थ रहो -दीर्घायु हो वरदान इन्ही से पाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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चतुर्दशी पर नरकासुर के वध का उत्सव मनता है ,
दीप जलाये जाते हैं ; यम का दीपक भी जलता है ,
वनवास काट आते रघुवर इस पर्व ने याद दिलाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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आती है तिथि अमावस की इस पर होता लक्ष्मी -पूजन ,
तम पर प्रकाश की जीत का पर्व ,श्री राम आगमन हर्षित जन ,
चीर निशा -तम-जाल को ये प्रकाशित करने आता है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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अन्नकूट का पर्व महा आयोजित होता अगले दिन ,
इंद्र-कोप से रक्षा हित कृष्ण उठायें गोवर्धन ,
सामूहिक रूप से जन-जन ने अन्नकूट को खाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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इस महापर्व का अंतिम पर्व 'यम द्वितीया' कहलाता है,
बहन यमी के भ्रातृ प्रेम की सबको याद दिलाता है ,
हो दीर्घायु भाई मेरा बहनों ने तिलक लगाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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आओ जानें अब कारण भी दीवाली पर्व आयोजन के ,
आये थे राम वनवास काट तब दीप जले घर-आँगन में ,
घोर निशा को दीपों से आलोकित कर चमकाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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कहते हैं हुआ इसी दिन था सर्वज्ञात समुद्र मंथन ,
क्षीरोदधि से निकले थे रत्न ;माँ लक्ष्मी प्रकट हुई तत्क्षण ,
इसीलिए लक्ष्मी-पूजन का अटल विधान बनाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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सिक्खों में भी इस दिन जन-जन खुश होकर दीप जलाता है ,
औरंगजेब की कैद से मुक्त गुरु जी की याद दिलाता है ,
अत्याचारों के आगे कब वीरों ने भाल झुकाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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कहते हैं कृष्ण कन्हैय्या ने इस दिन ही वरा कन्याओं को ,
दुष्ट असुर के चंगुल से छुड्वाया था राजाओं को ,
अंत पाप का करें प्रभु ये विश्वास जगाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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महावीर,दयानंद ने इस दिन परम -धाम प्रस्थान किया ,
भक्तों ने दीप जला हर वर्ष नम्र ह्रदय से याद किया ,
सत्य-अहिंसा अपनाने का मार्ग हमें दिखलाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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इसी दिवस पर रचना की विक्रमादित्य ने संवत की ,
किया पराजित शकों को व् शक्ति हर ली थी हूर्णों की ,
भारत-वीरो ने भुजबल से माता का मान बढाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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महाराज बलि व् वामन की कथा लोक में कहें सुनें ,
पाताल लोक जब गया बलि देवों को राहत तभी मिले ,
तब हर्षित हो जलाये दीप ऐसा ही सुना-सुनाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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प्रहलाद पिता हिरण्यकश्यप ; ऋषियों को अकारण कष्ट दिए ,
पुत्र ने पूजा विष्णु को ,उस पर भी अत्याचार किये ,
नृसिंह ने मारा आकर जब चहुँ हर्ष तब छाया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !
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दीपोत्सव संग जुडा ये सब हमको प्रतिपल सिखलाता है ,
नन्हे प्रज्वलित एक दीपक से अंधकार मिट जाता है ,
झूठ की सत्ता मिली धूल में सत्य आज मुस्काया है !
उत्साह असीम ,प्रफुल्ल ह्रदय ,उर में आनंद समाया है !


शिखा कौशिक 'नूतन'

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