Sunday, 14 September 2014

मोहब्बत शायरी..........आलम वो मोहब्बत का...!!!

मोहब्बत
आलम वो मोहब्बत का...!!!


"आलम वो मोहब्बत का बड़ा बेमिसाल था, 
हर जर्रा सरोबार जब.. दीवानगी से था.' 

'सारी फिजायें खुश्बुओं में डूब गयीं थीं, 
रोशन दिल-ओ-दयार भी.. आज़ादगी से था.' 

'सूरत पे तेरी हमने भला गौर कब किया?? 
जब दिल ही फिदा यार !!! तेरी सादगी पे था.' 

'होमो-हवन में जल गये थे.. हाथ बेवजह , 
कुछ इश्क़ मुझे ऐसी.. परवानगी से था.' 

'महफूज़ दिल को इसलिये.. सच्चाई से रखा, 
कुछ रंज मुझे.. अपनी ही बानगी पे था.' 

'हम इश्क़ की मज़बूरियों में.. जुर्म कर गये, 
रिश्ता ही तेरे दर का जब.. हैवानगी से था.' 

'मैं प्यार में फ़ना हुआ था.. सिर्फ़ इसलिये, 
कुछ फख्र मुझे अपनी.. मर्दानगी पे था.'

'हमको पता था वो सफ़र.. तनहा ना कटेगा, 
उस बार मेरा वादा.. आवारगी से था.' 

'उँगली दबा के दाँत में.. वो सोचने लगी, 
मैने किया सवाल जब.. हैरानगी से था.'

'लमहों की भीड़ जेहन में.. थी बेहिसाब पर, 
मेरी ग़ज़ल का सामना.. वीरानगी से था...!!!" 
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राहों के सिलसिले...!!!


"अब तो गुम कर दो.. पतझड़ों के सर्द मौसम को,
आ के एक रोज़.. बरस जाओ बादलों की तरह.'

'इससे पहले कि उम्र हो गुज़र अँधेरों में,
लमहे-लमहे को तुम ज़ला दो.. मशालों की तरह.'

'कोई भटका हुआ राही है ज़िऩ्दगी अपनी,
इसकी महफ़िल का हर जवाब.. सवालों की तरह.'

'सुर्ख़ ख्वाबों के दरीचे ,चंद राहों के सिलसिले..!!
अपने दामन में समेटे हूँ.. ख़यालों की तरह.'

'मुझ पे हर वक़्त रहा.. मेरी दुआओं का असर ,
हिज्र की शब भी मिली.. रंग-ए-विसालों की तरह.'

'हमको दरकार.. समन्दर से उसी मंज़र की,
लहर जब आये.. ठहर जाये साहिलों की तरह.'

'फ़र्क़ दुश्मन में.. दोस्तों में, यहाँ कुछ भी नहीं,
जबसे रोशन.. दिल-ओ-दयार उज़ालों की तरह.'

'याद फिर आ गयी.. इज़हार-ए-मोहब्बत अपनी,
एक लमहा वो जब गुज़रा.. कई सालों की तरह.'

'तेरी जुल्फों का लहराना.. तेरी आँखों का पैमाना,
अब भी ज़िन्दा हैं ज़माने में.. मिसालों की तरह.'

'तुम्हारी अहद-ए-वफ़ा क़ी है ये क़ीमत 'शायर' !!!
चंद सिक्के हैं तेरे हाथ में.. छालों की तरह...!!!" 

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*** तुम ***

तुम एक हसीं रात के जैसी हो 
तुम किसी परी से मुलाकात के जैसी हो 
तुम दिल मैं छुपे किसी जज्बात के जैसी हो 
मेरे ख्वाबो की कायनात के जैसी हो तुम 

जून की तपती दोपहर मैं बरसात के जैसी हो तुम 
मेरी हसरतो चाहतो की आहट हो तुम 
और इस तनहा दिल की महफिल जैसी हो तुम 
किसी दिवाली मैं गरीब की लक्ष्मी जैसी हो तुम 

मेरी बंद आँखों में बनी तस्वीर जैसी हो तुम 
तन्हाईयों के तुफानो में फ़सी मेरी ज़िन्दगी के लिए 
साहिल जैसी हो तुम ............
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उसे कहना ............


बिछड़ने से मोहब्बत तो नहीं मरती 

बिछड़ जाना मोहब्बत की सदाक़त की अलामत है 

मोहब्बत ऐं फितरत है फितरत कब बदलती है 

सो जब हम दूर हो जाएँ 

नए रिश्तों मैं खो जाएँ 

तो ये मत सोच लेना तुम 

मोहब्बत मर गयी होगी ..

नहीं ऐसा नहीं होगा 

मेरे बारे मैं सुन कर जब तुम्हारी आंख भर आये 

छलक कर एक भी आंसू पलक के पार उतर जाए 

तू बस इतना समझ लेना 

जो मेरे नाम से इतनी तुम्हारे दिल को निस्बत है 

की इस दिल मैं बिछड़ कर भी अभी मेरी मोहब्बत है ..

मोहब्बत जो बिछड़ कर भी सदा आबाद रहती है .. 

मोहब्बत हो किसी से तो हमेशा याद रहती है !!

मोहब्बत वक़्त के बेरहम तुफानो से नहीं डरती 

उसे कहना ..

"बिछड़ने से मोहब्बत तो नहीं मरती "
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हमने वफ़ा से बहुत आगे तुम्हे सोचा....




हमने वफ़ा से बहुत आगे तुम्हें सोचा 

जहाँ से लौट आने का रास्ता नहीं मिलता 
हमने उस राह से बहुत आगे तुम्हें सोचा 

उन से कहो जिन की नज़र में मोहब्बत गुनाह-ऐ-अज़ीम है 
हमने उस गुनाह से बहुत आगे तुम्हें सोचा 

मोहब्बतों में हर्फ़ बा हर्फ़ मुझे मांगना नहीं आता 
हमने आदाब-ऐ-दुआ से बहुत आगे तुम्हें सोचा

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खड़ा हूँ मैं अब भी उसी रस्ते पर

खड़ा हूँ मैं अब भी उसी रस्ते पर 
अगर वो कभी मुड के देखे तो नज़र आऊँगा 
बिखरा हूँ मैं अब भी इस तरह 
की जब भी टूटे आईने को देखें तो याद आऊँगा ........... 


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