Sunday, 17 August 2014

सरदार पटेल का पत्र नेहरू जी के नाम

 सरदार पटेल का पत्र नेहरू जी के नाम

( इस पत्र को अत्‍यंत ध्‍यानपूर्वक गम्‍भीर होकर पढिये । सन 1950 में सरदार पटेल द्वारा तत्‍कालीन प्रधान मंत्री पण्डित जवाहरलाल को लिखा यह पत्र आज भी प्रासंगिक है । इस पत्र में उत्‍तर के जिन खतरों के प्रति सावधान किया था, वे सभी खतरे आज भी बरकरार है । स्‍पष्‍ट है कि हमने पटेल की चेतावनी की उपेक्षा की । प्रस्‍तुत है सरदार पटेल का पत्र नेहरू के नाम;;;;;)

          07 नवम्‍बर 1950, नई दिल्‍ली ।

          ‘’जबसे मेरी अहमदाबाद से वापसी हुई है और उसी दिन 15 मिनट की नोटिस पर मुझे कैबिनेट मीटिंग में हाजिरी देनी पडी, मुझे इस बात का अफसोस है कि मीटिंग में हाजिरी देने की वजह से मैं सारे कागजात पढ नहीं सका । मुझे लगता है मुझे आपके साथ मेरे मन में चल रहे विचारों को व्‍यक्‍त करना चाहिए ।

         मैंने विदेश मंत्रालय और हमारे पेचिंग में राजदूत के जरिये चाइना सरकार के साथ हुए पत्र व्‍यवहार का ध्‍यान से अध्‍ययन किया है । मैंने हमारे राजदूत और चीन सरकार के बीच इस पत्राचार को आगे बढने की प्रशंसात्‍मक ढंग से कोशिश की , पर मुझे अफसोस के साथ कहना पड रहा है कि इस अध्‍ययन के फलस्‍वरूप दोनों ही सही नहीं उतर रहे हैं । चीनी सरकार हमें शान्तिपूर्ण इरादों की वकालत कर के धोखा दे रही है । मुझे आशंका है कि उन्‍होंने ऐसे महत्‍वपूर्ण समय पर हमारे राजदूत के मन में गलत विश्‍वास बिठा दिया है कि वे शान्तिपूर्ण तरीके से तिब्‍बत की समस्‍या का हल लाने के इच्‍छुक हैं ।

          इसमें कोई शक नहीं कि इस पत्राचार की अवधि के दौरान चीन तिब्‍बत पर भीषण आक्रमण करने पर ध्‍यान केन्द्रित कर रहे होंगे । मेरा मानना है कि चीनियों की अन्तिम कार्रवाई किसी रपट से कम नहीं होगी । सबसे बडी दुखद बात यह है कि तिबेतियन हम पे भरोसा करते हैं और उन्‍होंने हमें पथप्रदर्शक चुना है और हम उन्‍हें  चीनी कूटनीति के जाल में से बाहर नहीं ला सके हैं । अभी की स्थिति देखते हुए लगता है कि हम दलाई लामा को भी बचा नहीं सकेंगे ।

          हमारे राजदूत चीनियों की नीति एवं करनी को प्रमाणित करने या समझाने के लिए अथक प्रयत्‍न कर रहे हैं, विदेश मंत्रालय के एक तार में की गई टिप्‍पणी से विदित होता है ,हमारे राजदूत के द्वारा हमारी ओर से किये गये प्रतिनिधित्‍व में द्रढता का अभाव एवं अनावश्‍यक माफी मांगी गयी है । किसी भी जानकार व्‍यक्ति यह बात कि एंग्‍लो अमेरिकन कूटनीति एवं व्‍युराचना से चाइना को कोई खतरा है यह मानें यह असंभव है । आपके द्वारा सीधी चर्चा के वावजूद अगर ऐसी भावना चीनियों के द्वारा सच मानी जा रही हो तो यह बताता है कि हम चाहे चीनियों को अपना दोस्‍त मानें, वे हमें अपना दोस्‍त नहीं मानते हैं । हमें यह समझना चाहिए कि यह कम्‍युनिस्‍ट मानसिकता है जो हमारे साथ नहीं, वह हमारा विरूद्ध है ।

          पिछले कुछ महीनों से हम रूसी कैम्‍प से बाहर रहकर अकेले ही चाइना का यू;एन;ओ; में प्रवेश के प्रश्‍न पर अमेरिकन का भरोसा करने का प्रयास कर रहे हैं । चीनी भावनाओं को शान्‍त करने ,दर कम करने और उसकी वैध मांगों का समर्थन हमने अमेरिकन एवं ब्रिटेन के साथ चर्चा एवं पत्राचार में किया है । इस सबके अतिरिक्‍त चाइना हमारे स्‍वार्थ रहित किए गये  प्रयासों से सन्‍तुष्‍ट नहीं है । उसे हम पर शक है जो बाहय तौर पर अविश्‍वास और कुछ हद तक शत्रुता है ।

          मुझे नहीं लगता चाइना को हम इससे अधिक हमारे परम ध्‍येय मित्रता एवं सदभावना का सबूत दे पायेंगे । पेंचिंग में हमारे राजदूत हैं वो उत्‍क्रष्‍ट  रूप से योग्‍य हैं ,हमारे मित्र भाव को समझाने के लिए, लेकिन वे इस प्रयास में विफल रहे रहे हैं, चीनी सेना का तिब्‍बत में घुसने के हमारे विरोध को चाइना संकलिटी रूप से खारिज ही नहीं करता है बल्कि निराधार आरोप लगाता है कि हमारा रवैया विदेशियों से प्रभावित है, ऐसा लगता है जैसे एक दोस्‍त नहीं बल्कि एक संभावित दुश्‍मन बोल रहा है ।

         इस आधार पर तिब्‍बत के गायब हो जाने पर और चाइना के हमारे द्वार तक पहुंच जाने से उपस्थित हुए नये हालात पर ध्‍यान देना होगा । समग्र इतिहास में हमने उत्‍तर पूर्वी सीमाओं की कभी भी चिन्‍ता नहीं की । हिमालय उत्‍तर से आने वाले सभी खतरों के बीच अभेद अवरोध बनता रहा है । तिब्‍बत एक अच्‍छा दोस्‍त है जिसने हमारे लिए कभी कोई मुश्किल खडी नहीं की । चाइना हमेशा से विभाजित रहा है, उनकी अपनी आंतरिक समस्‍यायें थीं और हमारी सीमाओं पे कभी कोई चिन्‍ता नहीं होने दी । इस कारण से भिन्‍न संस्कृति ,लोग एवं विचारों के अनुरूप हमारे और तिब्‍बत के बीच पिछली अर्द्ध सदी से कार्यरत एवं कार्यकारी सारे सरहदी एवं आर्थिक करारों का अन्‍त होगा ।

          चाइना अब विभाजित नहीं है, वह ताकतवर और संगठित है । हिमालय की उत्‍तर और उत्‍तर-पूर्वीय सीमा पर हमारी प्रजा जातीय और सांस्कृतिक तौर पर तिब्‍बत और मंगोलिया की प्रजाति से भिन्‍न नहीं है, अपरिभाषित सीमायें एवं जीवन  शैली के कारण हमारी प्रजा के तिब्‍बती और चीनियों के साथ सम्‍बंध हमारे और चीनियों के बीच  संभावित परेशानियों का कारण बन सकती है । आधुनिक और कडवे इतिहास हमें बताता है कि साम्‍यवाद ,साम्राज्‍यवाद के खिलाफ ढाल नहीं हो सकता है, और दूसरों के मुकाबले  साम्‍यवादी जितने ही अच्‍छे और बुरे हो सकते हैं ।

          इस संदर्भ में चाइना की महत्‍वाकांक्षा न केवल हिमालय की समतल धरा पर बल्कि असम के कुछ हिस्‍सों को भी समाविष्‍ट करती है उनकी महत्‍वाकांक्षा वर्मा की भी है । वर्मा का दुर्भाग्‍य है कि उसके आसपास मैकमोहन लाइन नहीं होने के कारण वर्मा करार की रूपरेखा के गठन करने में भी असमर्थ है । जातीय ,राष्ट्रीय या ऐतिहासिक दावे वैचारिक विस्‍तारवाद के रूप में छुपे हैं, इसीलिए उत्‍तर, उत्‍तर-पूर्व के ओर से खतरा दोनों साम्‍यवाद एवं साम्राज्‍यवाद हो जाता है, जबकि हमारी पश्चिम और उत्‍तर-पश्चिम की और सुरक्षा को खतरा पहले से बरकरार है । नया खतरा उत्‍तर और उत्‍तर-पूर्व की ओर से बढ गया है ।

          हमें भी इस संभावित परेशानियों वाली सरहदों पर राजनैतिक स्थितियों पर विचार करना होगा । हमारी उत्‍तर अरैर उत्‍तर-पूर्व पालिसी में नेपाल ,भूटान, सिक्किम ,दार्जिलिंग और असम के आदिवासी इलाकों का समावेश होता है । संचार की दृष्टि से वे कमजोर हैं , यहां अविभाजित रक्षात्‍मक रेखा का भी अभाव हे । घुसपैठियों के लिए असीमित संभावनायें हैं । बहुत छोटी संख्‍या में पुलिस सुरक्षा बल उपलब्‍ध है । हमारी चौकियां भी पूरी तरह से आबाद नहीं लग रहीं हैं । इन क्षेत्रों के साथ हमारा सम्‍पर्क घनिष्‍ठ एवं अन्‍तरंग भी नहीं है ।

         इस इलाकों में बसने वाले लोगों में भारत की ओर वफादारी और निष्‍ठा का अभाव है । दार्जिलिंग और कलिम्‍पोंग इलाका  भी मंगोलिई पूर्वाग्रहों से मुक्‍त नहीं है । पिछले तीन वर्षों में हम नागा और दूसरी असामी जातियों से पर्याप्‍त पहुंच नहीं बना पाए हैं । यूरोपियन मिशनरी उनके सम्‍पर्क में हैं पर उनका प्रभाव भारतीयों को लेकर कतई मैत्रीपूर्ण नहीं है । सिक्किम में भी कुछ वक्‍त से राजकीय उबाल है ,वहां असंतुष्‍ट दाहक रहा है ।

          भूटान शांत है पर उसकी भी तिब्‍बत के साथ सम्‍बंधों को लेकर लाचार है । नेपाल में कमजोर सत्‍ता है  जो सम्‍पूर्ण तौर पर सैन्‍य आधारित है । जो प्रजा में उग्र तत्‍व एवं आधुनिक  विचारों के साथ संघर्ष में है ,ऐसे हालत में प्रजा को नए खतरों से अवगत करना या सैन्‍य शक्ति को बढाना बहुत ही कठिन है । इस मुसीबत का सामना जाग्रत द्रढता ,शक्ति और दृढ़ निश्‍चय से किया जा सकता है । मुझे विश्‍वास है कि चाइना और उनके प्रेरणा स्रोत सावियत रूस हमारी इस कमजोरी का कुछ उनकी विचारधारा और कुछ उनकी महत्‍वाकांक्षा के कारण फायदा उठाने से चुकेगा नहीं । मेरे मत अनुसार ऐसी स्थिति में हम आत्‍मसंतुष्‍ट या ढुलमुल नहीं हो सकते हैं । हमें क्‍या चाहिए और उसे कैसे पाया जा सकता है ये हमें ज्ञात होना जरूरी है । उद्देश्य के निरूपण या उनकी प्राप्ति के लिए बनाई गई नीतियों में इच्‍छा शक्ति की कमी हमें न केवल कमजोर बल्कि खतरे में बढोतरी कर सकती है ।

         बाह्य खतरों के साथ साथ हमें आन्‍तरिक खतरों का भी सामना करना है । भारतीय साम्‍यवादी पार्टी को विदेशों में ,साम्‍यवादियों से सम्‍पर्क करने में और उनके पास से हथियार साहित्‍य प्राप्‍त करने में मुश्किल हो रहा है । उन्‍हें बर्मा और पूर्वी पाकिस्‍तान की सरहदें और समुद्र का सामना करना पड रहा है । अब उनके पास चाइना और उसके जरिये अन्‍य साम्‍यवादियों से सम्‍पर्क करना आसान हो जायेगा । जासूस घटिया लेखकों और साम्‍यवादियों की घुसपैठ आसान हो जायेगी । सारे हालातों ने कई मुसीबतों को खडा कर दिया है, जिसके कारण हमें त्‍वरित निर्णय लेना होगा और जैसे मैंने कहा उद्देश्य एवं नीतियों का निरूपण करना होगा ।

         यह अब निश्चित है कि हमें व्‍यापक कार्रवाई करनी होगी ,जिसमें हमें हमारी रणनीति और तैयारियां ही नहीं पर आं‍तरिक सुरक्षा के खतरों पर भी ध्‍यान रखना होगा । हमें इन सरहदी कमजोर स्‍थानों पर राजकीय एवं शासनिक मुसीबतों का भी सामना करना होगा ।

          मेरे लिए विस्‍तार से सारी समस्‍याओं का वर्णन करना संभव नहीं है ,पर नीचे मैंने ऐसी समस्‍यायें बताईं हैं , मेरे हिसाब से जिस पर तुरन्‍त समाधान की  आवश्‍यकता है और जिसके आसपास ही हमें प्रशासनिक एवं रणनीति बनाने की जरूरत है ।

(1) हमारी रक्षा जरूरतों पर लम्‍बी अवधि का विचार । मेरा मानना है कि जब तक हम अपने हथियार ,गोला-बारूद और कवच की आपूर्ति को आश्‍वाशित नहीं करेंगे हम हमारी रक्षा स्‍ि‍थति को सदा कमजोर करेंगे और दोहरी मुसीबतें ,पश्चिम और उत्‍तर-पूर्वीय का सामना नहीं कर सकेंगे ।

(2)  चाइना का यू;एन;ओ; में प्रवेश का प्रश्‍न । चाइना का दो टूक जवाब और तिब्‍बत के साथ व्‍यवहार करने में उसने जिस तरह की पद्धति अपनाई है इससे  देखते हुए हमारा उसके दावे की वकालत करें इस पर मुझे शंका है । उसकी कोरियाई युद्ध में  भागीदारी के कारण यूएनओ चाइना को बहिष्कृत  कर देगा । इस पर हमारा दृष्टिकोण निर्धारित होना वाहिए ।

(3) हमारे उत्‍तर और उत्‍तर-पूर्व क्षेत्र को मजबूत करने के लिए राजकीय और प्रशासनिक कदम हमें उठाने चाहिए  । इसमें समग्र सरहद जिसमें नेपाल ,भूटान, सिक्किम ,दार्जिलिंग और असम के आदिवासी इलाके भी शामिल हैं ।

(4) सीमा क्षेत्र जैसे कि उत्‍तरप्रदेश, बिहार ,बंगाल और असम  में अतिरिक्‍त सुरक्षा के लिए कदम ।

(5) इन क्षेत्रों में संचार ,रास्‍ते ,रेल, हवाई और वायरलेस में सुधार ।

(6) सीमा चौकियों की पुलिसिंग और गुप्‍तचर ।

(7) ल्‍हासा में हमारे भविष्‍य का मिशन । ज्ञान्‍त्‍से और तिब्‍बत में जो हमारी सुरक्षा बल है वह व्‍यापार मार्गों की रक्षा करें ।

(8) मेकमोहन रेखा के संदर्भ में हमारी नीति ।

          यह संभव है कि इन मामलों का विचार करने पर हमारे चाइना, रूस, अमेरिका, ब्रिटेन और बर्मा के साथ सम्‍बंधों पर व्‍यापक प्रश्‍न उठ सकते हैं लेकिन यह महत्‍वपूर्ण होने के बावजूद समय प्राकृत का प्रश्‍न हो सकता है । उदाहरण के तौर पर हमें इस बात पर विचार करना होगा कि क्‍या हमें बर्मा के साथ निकटतम सम्‍बंध बढने पर रोक लगनी चाहिए ताकि अगले के चाइना के साथ व्‍यवहार को मजबूत किया जा सके ।

          इस बात की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है कि हम पर दबाव बढने से पहले चाइना बर्मा के साथ भी ऐसा करे । बर्मा के साथ सीमा पूरी तरह से अपरिभाषित है और चाइना का क्षेत्रीय दावों पर्याप्‍त हैं । अपनी वर्तमान स्थिति में बर्मा चीन के लिए एक आसान समस्‍या पेशकश कर अपनी ओर पहले ध्‍यान खींच सकते हैं ।

          मेरा सुझाव है कि हम इन समस्‍याओं पर सामान्‍य चर्चा के लिए बैठक करें और ऐसे कदमों पे निर्णय लें जिस पर विचार करना तुरंत आवश्‍यक है और अन्‍य समस्‍याओं का मूल्‍यांकन करके उनके निपटने के लिए त्‍वरित कदम उठाएं ।
                                                                                                     आपका
                                                                                            वल्‍लभ भाई पटेल

( ‘मेकर आफ इण्डियन फॉरेन पालिसी- राजाराम मोहन राय से यशवंत सिन्‍हा तक ‘नामक पुस्‍तक जिसके लेखक श्री जे;एन; दीक्षित हैं से साभार )(राष्‍ट-किंकर-4-10 अगस्‍त  2013)

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