Friday, 15 August 2014

चम्बल में भी है संसद ............ मितावली स्थित चौसठ योगिनी शिवमंदिर

चम्बल में भी है संसद



मितावली स्थित चौसठ योगिनी शिवमंदिर 



 अ तुलनीय भारत का दिल बेहद खूबसूरत है। घुमक्कड़ी के शौकीनों के लिए मध्यप्रदेश में कई ठिकाने हैं। यह अलग बात है कि कई शानदार पर्यटन स्थल अब भी पर्यटकों की बाट जोह रहे हैं। मुरैना जिले के मितावली गांव में स्थित चौसठ योगिनी शिवमंदिर अपनी वास्तुकला और गौरवशाली परंपरा के लिए आसपास के इलाके में तो प्रसिद्ध है लेकिन मध्यप्रदेश पर्यटन के मानचित्र पर जगह नहीं बना सका है। अपने क्रियेटिव विज्ञापनों को लेकर चर्चित मध्यप्रदेश का पर्यटन विभाग चौसठ योगिनी शिवमंदिर की मार्केटिंग ढंग से नहीं कर सका है। आप यदि मितावली आएंगे और नौवीं सदी के इस मंदिर को निहारेंगे तो हैरत से भर उठेंगे। जमीन से करीब ३०० फीट ऊंचाई पर एक पहाड़ी पर बने गोलाकार शिवमंदिर को देखकर अनायास ही आपको मशहूर ब्रिटिश वास्तुकार सर एडविन लुटियंस की याद आएगी। सर लुटियंस, जिन्होंने दिल्ली को एक नया रूप, रंग और आकार दिया था। भारत के खूबसरत संसद भवन की रचना के लिए आज भी उन्हें तहेदिल से याद किया जाता है। मितावली में इकंतेश्वर महादेव मंदिर के नाम से भी पहचाने जाने वाला चौसठ योगिनी शिवमंदिर हू-ब-हू हमारी संसद के जैसा दिखता है। मंदिर परिसर में आकर दिमाग की कुछ खिड़कियां खुलने लगती हैं और हवा के साथ कुछ प्रश्न इन खिड़कियों से होकर भीतर घुस आते हैं। क्या वाकई हमारी संसद के भवन की परिकल्पना लुटियंस की मौलिक सोच थी? १२ फरवरी १९२१ को दिल्ली में जिस संसद भवन की आधारशिला रखी गई, क्या उसके वास्तु की प्रेरणा लुटियंस को चम्बल के चौसठ योगिनी शिवमंदिर से मिली थी? ये कुछ सवाल हैं जो इतिहास के विद्यार्थियों के लिए शोध का विषय तो बनते ही हैं। गहन शोध के जरिए ही इन सवालों के सही जवाब भी हमारे सामने आएंगे। तब ही हम गर्व के साथ कह सकेंगे कि दुनिया में अपनी खूबसूरती के लिए विख्यात भारतीय संसद की इमारत की परिकल्पना सर लुटियंस के दिमाग की उपज नहीं बल्कि गौरवशाली भारतीय वास्तुकला का ही एक नायाब नमूना है। 
     


भारत का संसद भवन 



       मितावली का यह चौसठ योगिनी शिवमंदिर मुरैना जिला मुख्यालय से करीब ३५ किलोमीटर की दूर पर स्थित है। यहां तक पहुंचने के लिए सिंगललेन सड़क है, कई जगह जिसकी हालत खराब है। यहां तक पहुंचने में पर्यटकों को थोड़ी मुश्किल का सामना जरूर करना पड़ता है लेकिन यहां आने के बाद उन्हें महसूस होगा कि यदि वे इस मंदिर को न देखते तो देखने के लिए बहुत कुछ छूट जाता। नौवीं सदी में शिवमंदिर का निर्माण तत्कालीन प्रतिहार राजवंश ने कराया था। मंदिर गोलाकार है, ठीक भारतीय संसद के भवन की तरह। मंदिर की गोलाई में चौसठ कमरे हैं। प्रत्येक कमरे में एक-एक शिवलिंग है। कभी इन कमरों में भगवान शिव के साथ देवी योगिनी की मूर्तियां भी थीं। देवी योगिनी की चौसठ मूर्तियों के कारण ही इसका नाम चौसठ योगिनी शिवमंदिर पड़ा। देवी योगिनी की काफी मूर्तियां ग्वालियर किले के संग्रहालय में रखी हैं। परिसर के बीचों-बीच एक बड़ा गोलाकार शिवमंदिर भी है। मुख्य मंदिर में १०१ खंभे कतारबद्ध खड़े हैं, जो संसद भवन के गलियारे की याद दिलाते हैं। मंदिर के निर्माण में लाल-भूरे बलुआ पत्थरों का उपयोग किया गया है, जो मितावली और उसके आसपास के इलाके में पाए जाते हैं। स्थानीय लोग कहते हैं कि प्राचीन समय में मंदिर में तांत्रिक साधना की जाती थीं। यह तांत्रिक अनुष्ठान का बड़ा केन्द्र था। 

      भव्य शिवमंदिर को देखने के लिए जनवरी-फरवरी के माह में हम घुमक्कड़ मित्रों की टोली ने योजना बनाई थी।  हम ग्वालियर से किराए की टैक्सी से मितावली की ओर निकले। मितावली के नजदीक पहुंचकर जब कुछ स्थानीय लोगों से हमने मंदिर तक पहुंचने के रास्ते के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा- 'चम्बल की संसद देखने जा रहे हो।' इस कथन से स्पष्ट होता है कि स्थानीय लोगों के लिए देश में दो संसद भवन हैं। एक दिल्ली में तो दूसरा उनके गांव मितावली में। वैसे रास्ता बताने में गूगल मैप ने भी हमारी खूब मदद की। आखिर गूगल मैप और ग्रामवासियों की मदद से हम जल्द ही चौसठ योगिनी शिवमंदिर पहुंच गए। टैक्सी नीचे छोड़कर पैदल ही करीब २०० सीढिय़ां चढ़कर पहाड़ी के ऊपर मंदिर के सामने पहुंचे। पर्यटकों की ज्यादा संख्या नहीं थी। किसी दूसरे शहर से आए करीब पांच-छह और लोग वहां मौजूद थे। मंदिर को लेकर उनसे काफी देर तक बातचीत हुई। वे भी आश्चर्यचकित थे चम्बल में संसद भवन का प्रतिरूप देखकर। पर्यटकों के उस समूह में एक बुजुर्ग धोती-कुर्ता पहने हुए थे। बातचीत में पता चला कि वे पंडित हैं और मुम्बई से आए हैं। उनके साथ अप्रवासी भारतीय थे, जो उनके यजमान थे। पंडितजी भारत के गौरव से रू-ब-रू कराने के लिए अपने यजमानों को कुछ चिह्नित जगहों पर घुमाने निकले थे। उनकी भारत दर्शन की योजना में चम्बल का यह हिस्सा भी शामिल था, यह जानकर सुखद अनुभव हुआ। 


मितावली के आसपास बिखरा पड़ा है सांस्कृतिक इतिहास : 


मध्यप्रदेश सरकार और केन्द्र सरकार चाहे तो चम्बल में पर्यटकों की संख्या को आसानी के साथ बढ़ाया जा सकता है। इसका फायदा यहां के ग्रामवासियों को तो होगा ही साथ ही सरकारों के राजकोष में भी इजाफा हो सकेगा। आगरा का ताजमहल और ग्वालियर का किला तो दुनिया के लोगों को आकर्षित कर अपने पास बुलाता ही है। अगर सरकार थोड़े से प्रयास करे तो आगरा और ग्वालियर आने वाले इन मेहमानों को डकैतों-बागियों के लिए कुख्यात चम्बल की खूबसूरत और ऐतिहासिक रूप से समृद्ध तस्वीर भी दिखाई जा सकेगी। ग्वालियर-चम्बल क्षेत्र पर्यटन के नजरिए से काफी समृद्ध है। मुरैना से सिहोनिया गांव (ककनमठ), मितावली, पडावली, बटेश्वर होते हुए नूराबाद तक के बेल्ट में गौरवशाली इतिहास के दर्शन होते हैं। मुरैना शहर से उत्तर-पूर्व दिशा में करीब २० किलोमीटर दूर सिहोनिया गांव में आठवीं सदी का ककनमठ मंदिर है। ककनमठ मंदिर खजुराहो के कंदारिया महादेव मंदिर से भी विशाल है। ककनमठ मंदिर से पश्चिम की दिशा में करीब ३० किलोमीटर की दूरी पर मितावली का चौसठ योगिनी मंदिर स्थित है। मितावली से दक्षिण-पश्चिम दिशा में करीब चार किलोमीटर ही आगे बढऩे पर पडावली आता है। पडावली में विशाल विष्णु मंदिर है। मंदिर के मण्डप की चार दीवारों पर चार युगों, सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग में मनुष्य की प्रवृत्ति को दिखाने का प्रयास किया गया है। इसके लिए सेंड स्टोन पर खूबसूरती से संभोग से लेकर समाधि में लिप्त आकृतियां उकेरी गई हैं। पडावली में शानदार नक्काशी को देखकर करीब एक किलोमीटर ही आगे बढऩा होगा कि शिवमंदिरों का खजाना हमारी प्रतीक्षा कर रहा होता है। कहते हैं आठवीं शताब्दी में कभी यहां ३००-४०० शिवमंदिरों का समूह था। एक समय में ये सभी मंदिर जमींदोज हो गए थे। पुरातत्व विभाग के प्रयासों से यहां फिर से आधा सैकड़ा से अधिक मंदिर पुनर्जन्म ले चुके हैं। यहां आकर पर्यटकों को अलौकिक शांति का अनुभव होता है। अब यहां से उत्तर-पूर्व की दिशा में करीब आठ किलोमीटर आगे बढऩे पर शनिश्चरा मंदिर के दर्शन होते हैं। यह भारत का दूसरा शनिमंदिर है। यह पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। यहां से ग्वालियर की दूर २७ किमी रह जाती है। पर्यटन के नजरिए से इस बेल्ट पर ध्यान दिया जाए तो ग्वालियर-चम्बल को डकैत, बीहड़, बंदूक के अलावा उसकी खूबसूरती, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक समृद्धि के लिए भी पहचाना जाएगा। 
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