Friday, 4 July 2014

जब दुसरे तुम्हारे झूठो में विश्वास करने लगते है ..........................

छादोग्य उपनिषद में एक सुन्दर कथा है |

सत्यकाम ने अपनी माँ जाबाला से पूछा : माँ , मैं परम ज्ञान के विद्यार्थी के रूप में जीवन जीना चाहता हूँ | मेरा पारिवारिक नाम क्या है ? मेरे पिता कौन है ?

मेरे बच्चे , माँ ने उत्तर दिया , मुझे ज्ञात नहीं : अपनी युवावस्था में जब मैं सेविका का कार्य करती थी तो मैंने अनेक पुरुषो का संसर्ग करते हुए अपने गर्भ में तुम्हे धारण किया था , मैं नहीं जानती तुम्हारा पिता कौन है --- मैं जाबाला हूँ और तुम सत्यकाम हो . इसलिए तुम स्वयं को सत्यकाम जाबाल कहो |

तब वह बालक उस समय के महान ऋषि गौतम के पास गया और स्वयं को शिष्य की भाति स्वीकार किये जाने को कहा | वत्स , तुम किस परिवार से हो ? ऋषि ने पूछा |

सत्यकाम ने उत्तर दिया : मैंने अपनी माँ से पूछा था कि मेरा गोत्र , पारिवारिक नाम क्या है ? और उन्होंने उत्तर दिया : मुझे ज्ञात नहीं ; अपनी युवावस्था में जब मैं सेविका का कार्य करती थी तो मैंने अनेक पुरुषो का संसर्ग करते हुए अपने गर्भ में तुम्हे धारण किया था , मैं नहीं जानती तुम्हारा पिता कौन है --- मैं जाबाला हूँ और तुम सत्यकाम हो . इसलिए तुम स्वयं को सत्यकाम जाबाल कहो |, श्रीमान अत : मैं सत्यकाम जाबाल जाबाल हूँ |

ऋषि ने उससे कहा : एक सच्चे ब्राह्मण , सत्य के सच्चे खोजी के सिवा यह कोई नहीं कह सकता | वत्स , तुम सत्य से विचलित नहीं हुए हो | मैं तुम्हे उस परम ज्ञान की शिक्षा दूंगा |

साधक का पहला गुण प्रमाणिक होना ,सत्य का पालन करना , सत्य से विचलित न होना , किसी भी प्रकार से धोखा न देना है ।

क्योंकि यदि तुम दूसरो को धोखा देते हो , तो अंततोगत्वा अपनी धोखेबाजियो से तुम ही धोखा खाते हो | यदि तुम एक ही झूठ को अनेकल बार बोलो तो यह तुमको करीब करीब सच जैसा ही प्रतीत होने लगता है | जब दुसरे तुम्हारे झूठो में विश्वास करने लगते है , तो तुम bhee विश्वास करना आरम्भ कर देते हो | विश्वास छूत की बीमारी है |

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