Friday, 18 July 2014

आदमी को आदमी रहने दो .कुत्ते को कुत्ता रहने दो ........कुत्तो की पंचायत (एक सामाजिक ब्यंग रचना )

कुत्तो की पंचायत (एक सामाजिक ब्यंग रचना )



एक कुत्ता दूसरे कुत्ते से भिड गया ,
उसके आदमी संबोधन से चिढ गया |
बोला तुम्हारी जबान बढ़ गयी है ,
या दारू पिए हो जो चढ़ गयी ||

वह गुर्राया दूजे से लड़ने लगा ,
दूसरे का पाला कमजोर पड़ने लगा 
तब तक दूजे का भाई सुखिया आ गया 
बात बढती कुत्तो का मुखिया आ गया |

मुखिया के समझाने पर वह मान गया
लेकिन अगले दिन पंचायत ठान गया ,
बोला विरादरी में तेरी शिकायत होगी 
तूने मुझे आदमी कहा पंचायत होगी |

अगले दिन इलाके में डुग्गी लगाई गयी 
गांव के बागीचे में पंचायत बुलाई गयी ,

कालू ,लालू , भूरा ,झबरा ,और टाइगर पंच आये 
मुखिया के साथ कुत्तो के सरपंच आये ,
पुराना मुखिया पूंछ का भुंडा भी आया 
साथ ही नया पंच मूंछ मुंडा भी आया ||

पंचो के आदेश पर वादी के पास सिपाही मूछा गया 
सिकायत के बारे में तफसील से पूछा गया ,
वादी का नाक भौ था चढ़ा हुआ 
आँखे तरेर गुर्राता वह खड़ा हुआ |

प्रतिवादी को देखा गुस्से से मुख खोला 
पंचायत की लाज रखी संभल कर बोला ,

जहाँपनाह !
इसने मुझे आदमी कहा बदनाम किया है
मेरी गैरत को ललकारा है ,मेरी स्वामिभक्ति 
पर ऊँगली उठाई है ..............................|

मै आप सबको आदमी नजर आता हूँ?
क्या मै कभी हराम की खाता हूँ?
हम टुकडो की लालच में दर दर जाते है ,
लेकिन क्या उसके बदले फर्ज नहीं निभाते है ||

हम अपनी वफादारी पर दाग नहीं लगाते 
कभी अपने भाई के घर आग नहीं लगाते ,
हम वह करते है जो हरिसन के ताले नहीं करते
सब जानते है हम कोई घोटाले नहीं करते ||

हम आज खाते आज की बात करते है 
अपनों से नहीं कोई घात करते है,
टुकडो पर ही अपना पेट पाल लेते है
नहीं मिला तो जूठन ही डाल लेते है||

हमें गर्व है !
हम आज की सोचते कल की नहीं सोचते 
दिल्ली सी किसी कुतिया को नहीं नोचते ,
किसी कुतिया को डिब्बे का दूध पिलाते देखा है ?
या दहेज़ के लिए डायन कह बहु जलाते देखा है ?

हम डायन , भूत और जंतर नहीं मानते,
उनकी तरह बेटा- बेटी में अंतर नहीं मानते,
हमे कभी झूठ का गीत गाते देखा है ? 
या चारा ,यूरिया,ताबूत खाते देखा है ?

जब हमारी सरहद में दूसरा कुत्ता आता है
हम उसे बेसक भगा देते है,
लेकिन हम कभी नहीं अपने कुत्तेपन को 
दगा देते है ||

माना बाताकही होती है होता झगड़ा भी है 
कभी लातामुक्की कभी थोडा तगड़ा भी है ,
लेकिन हम सरहद बाँटते है दिल नहीं बाँटते 
दाँत काटते है किसी का सिर नहीं काटते ||

हमारा नेता बिरादरी की शान समझता है 
आदमी का नेता तो खुद को भगवान समझता है,
हमारे पास गाड़ी , बंगला ,कार नहीं है 
लेकिन हमें इसकी दरकार नहीं है ||

हम खुले आसमान के नीचे रह लेते है 
जाड़ा ,गर्मी ,बरसात भी सह लेते है ,
हम अपनी कौम की बर्बादी का दम नहीं बनाते 
आदमी की तरह विनासक बम नहीं बनाते ||

मान्यवर ,
अब आप ही बताये ये संबोधन मेरे लिए जाली नहीं है?
क्या आदमी कहना किसी कुत्ते के लिए गाली नहीं है?

अगर इसे सजा नहीं मिली तो हमारी कौम का हौसला 
भी पस्त हो जायेगा ,
अपनी बिरादरी में भी न्याय का सूर्य अस्त हो जायेगा //

अब पंचो ने कुछ कहा आपस में कुछ भुनभुनाया ,
चिंतन के बाद पंचायत ने अपना फैसला सुनाया :-
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पंचायत का फैसला 
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वादी के तर्क सही है सत्य है 
पंचो के भी तर्क है कुछ कथ्य है ,
"आदमी के दो रूप है या दो भाग है 
एक इन्सान दूसरा शैतान रूपी नाग है |

इन्सान जिससे आदमियत अभी जिन्दा है 
दूसरा आदमी के रूप में दरिंदा है ,
हमारी आँखे इसी से तो नम है 
पहले की संख्या दुसरे से कम है |

इसलिए पहले पर दूसरा हावी है 
दूजे का मुख खुला पहले पर जाबी है ,
यही पंचो के निर्णय का तथ्य है 
वास्तव में वादी का कथन सत्य है |

वादी के लिए आदमी संबोधन जाली है
किसी कुत्ते को आदमी कहना गाली है |<><>|

<>सबको सचेत किया जाता है और पंचायत यह हुक्म देती है <>


टोपी को टोपी रहने दो .जूते को जूता रहने दो 
आदमी को आदमी रहने दो .कुत्ते को कुत्ता रहने दो 


रचनाकार:-संतोष कुमार श्रीवास्तव "तनहा "

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