Sunday, 20 July 2014

कांवर की परम्परा एवं श्रावण मास में कांवर की महिमा..........भोलेनाथ को कांवर चढ़ाने की परंपरा क्यों है.................




संसार में विभिन्न देशों के भिन्न-भिन्न धर्मों के मानने वाले लोग रहते हैं। प्रत्येक धर्म के मानने वाले भक्त अपने-अपने ईश्वर की पूजा-अर्चना करते हैं। सब धर्मों के अपने-अपने पवित्र तीर्थ स्थल हैं जहां पर वर्ष भर में भक्तजन एकत्र होकर पूजा-अर्चना करते है। परन्तु बाबा वैद्यनाथ धाम की एक विशेषता यह है कि यहां श्रावण मास में मेला लगता है जिसमें लाखों नर-नारी एकत्र होते हैं। हालांकि यहां पर साल भर भक्तगण आते रहते है। बीबीसी लन्दन ने पिछले वर्ष एक सर्वे में इसका उल्लेख किया था और दावा किया है कि वैद्यनाथ धाम का मेला दुनिया का सबसे बड़ा मेला है। यहां पर सावन में भोले के भक्तों का रेला लग जाता है। एक भोजपुरी फिल्म में महेंद्र कपूर का गाया गीत ‘हाथी ना घोड़ा ना कवनों सवारी, पैदल ही अईबों तोर दुआरी! हे भोले नाथ.....बोल बम के नारा बा इहे एक सहारा बा...’ खूब धूम मचाता है। इसके अलावा अन्य गायकों की भी जमकर कमाई होती है। 

श्रावण मास में देश के भिन्न-भिन्न स्थानों के साथ-साथ विदेशों में शिव भक्तगण कांवर चढ़ाने के लिए बाबा वैद्यनाथ धाम में पहुंचते हैं। यह मेला सुल्तानगंज से प्रारम्भ होता है और बाबा वैद्यनाथ धाम से बासुकीनाथ तक आकर पूर्ण होता हैं। इस प्रकार यह मेला 140 किलोमीटर तक फैला होता है जो अपने आप में एक आश्चर्य की बात है। आश्चर्य की बात यह है कि यदि एक कांवरिया सुल्तानगंज में एक लोटा जल बाबा धाम पर चढ़ाने के लिए अपने आगे वाले कांवरियों को पास करता चला जाए तो हाथों हाथ देवघर पहुंच सकता है। इससे आप अंदाज लगा सकते हैं कितना बड़ा मेला लगाता है। सभी कांवरिया स्त्री, पुरुष, बच्चे, बूढ़े भगवा रंग के कपड़े पहनकर चलते हैं। 

सुल्तानगंज से उनकी यात्रा शुरू होती है। वहां पर सब कांवरिये अपनी-अपनी कांवर में जल भरते हैं और अपने-अपने कांधे पर कांवर को रखकर सम्पूर्ण रास्ते में ‘बोल बम’ का नारा लगाते हुए आगे बढ़ते जाते है। सारे कांवरिये नंगे पैर एक-दूसरे को बम कहकर पुकारते हुए बढ़ते हैं। इस स्थान पर कोई ऊंच-नीच की भावना नजर नहीं आती। सबका खान-पान भी लगभग एक सा रहता है। सभी एक ही मंजिल की ओर बिना किसी भेद-भाव के बढ़ते नजर आते हैं। 110 किमी लंबा सफर तय करने के बाद प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने घरों को लौटते हैं। इतना बड़ा मेला बाबा वैद्यनाथ धाम की मर्यादा में चार चांद लगा देता है। नासिक, प्रयागराज, उज्जैन एवं हरिद्वार में 12 वर्षोें में कुम्भ का मेला लगता है। छ: वर्षों में अर्द्ध कुम्भी मेला लगता है। इन मेलों में भी इतनी संख्या में भक्त एकत्र नहीं होते जितने बाबा वैद्यनाथ धाम में श्रावण मास में कांवरिये एकत्र होकर वैद्यनाथ पर जल चढ़ाते हैं। इस श्रावणी मेले को सभी शिव भक्त बाबा वैद्यनाथ की अद्भुत लीला मानते हैं।


वैद्यों के वैद्य बाबा वैद्यनाथ

एक बार देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमार अस्वस्थ हो गए। उनके अस्वस्थ होने से सभी देवी-देवता चिंतित हो गए। क्योंकि सबका इलाज करने वाला जब स्वयं हीं रोगी हो जाए और उसके पास अपनी बीमारी की कोई औषधि न हो तो दूसरों का चिन्तित होना स्वाभाविक है। अंत में विवश होकर अश्विनी कुमार महादेव के पास आकर बोले, ‘प्रभु! आपके अतिरक्ति इस संसार में ऐसा कोई नहीं है जो मुझे रोग से मुक्त कर सके।’
अश्विनी कुमार की विनती सुनकर महादेव ने उनको रोगमुक्त कर दिया। तब महादेव का नाम वैद्यनाथ पड़ गया तथा कामदलिंग को वैद्यनाथ कहा जाने लगा। बाबा वैद्यनाथ धाम में संसार के कोने-कोने से लोग अपनी-अपनी चिन्ताएं, अपने-अपने दु:ख और तरह-तरह की कामनाएं लेकर आते हैं। उनकी कामनाएं पूरी होने पर दोबारा उनके दर्शन करने आते हैं। भगवान वैद्यनाथ सबकी कामनाएं पूरी करते हैं। उनके कष्टों को दूर करते हैं। सभी को जो उनकी शरण में आते हैं आश्रय देते हैं। कितना ही असाध्य से असाध्य रोग क्यों न हो जो बाबा वैद्यनाथ की शरण में आता है वह ठीक हो जाता है। यह भी बाबा वैद्यनाथ की एक अद्भुत लीला ही है।


श्री वैद्यनाथ महात्म्य

ज्योतिलिंगों की कुल संख्या बारह है- 1. सोमनाथ, 2. मल्लिकार्जुन, 3. महाकाल, 4. आेंकारेश्वर, 5. केदारनाथ, 6. भीमशंकर, 7. काशी विश्वनाथ वाराणसी, 8. त्रयम्बक, 9. नागेश, 10. रामेश्वरम्, 11. घुश्मेश, 12. वैद्यनाथ। बिहार प्रान्त के सन्थाल परगने में स्थित कामदलिंग वैद्यनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। कहते हैं कि यहां पर सती का हृदय गिरा था। इसलिए इसे हृदयपीठ भी कहते हैं। मत्स्य पुराण के अनुसार इसे शक्ति पीठ भी कहते हैं। वैद्यनाथ स्थित ज्योतिर्लिंग की यात्रा करने वाले शिव भक्तों की सब मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना में एक कथा प्रचलित है। 

एक बार राक्षस राज रावण हिमालय पर जाकर भगवान शिव के दर्शन प्राप्त करने हेतु घोर तपस्या करने लगा। उसने एक-एक करके अपने नौ सिर काटकर चढ़ा लिये। अब वह अपना अंतिम दसवां सिर काटकर चढ़ाने वाला ही था कि भगवान शिव उसके सामने प्रकट हुए। उन्होने उसके चढ़ाये हुये नौ सिरों को यथावत् जोड़ दिया और वर मांगने को कहा। रावण ने वर के रूप में उस शिवलिंग को अपनी राजधानी लंका ले जाने की आज्ञा मांगी जिस पर उसने अपने शीश काट काटकर चढ़ाये थे। भगवान शिव ने उसे लिंग ले जाने की आज्ञा तो दे दी परन्तु उसके साथ एक शर्त भी लगा दी कि यदि रास्ते में इसे कहीं रख दोगे तो यह वहीं अचल हो जायेगा। तुम इसे वहां से फिर उठा न सकोगे। रावण ने उनकी शर्त स्वीकार कर ली और शिवलिंग को लेकर लंका के लिए चल दिया। चलते-चलते एक जगह मार्ग में उसे लघुशंका की आवश्यकता होने लगी। वह उस शिवलिंग को एक अहीर के हाथों में थमाकर लधुशंका निवृत्ति के लिए चल पड़ा। उस अहीर को शिवलिंग का भार बहुत अधिक प्रतीत हुआ। वह उसके भार को संभाल न सका। विवश होकर रावण के लौटने से पहले ही उसने उसे वहीं भूमि पर रख दिया। 

रावण जब लौटकर आया तब फिर वह बहुत प्रयत्न करने के बाद भी उस शिवलिंग को न उठा सका। अंत में निरुपाय होकर उस शिवलिंग पर अपने अंगूठे का निशान लगाकर लंका लौट गया। तत्पश्चात् ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं ने वहां आकर उस शिवलिंग का पूजन किया। इस प्रकार वहां उसकी प्रतिष्ठा कर वे अपने अपने धामों को लौट गए। यहां ज्योतिर्लिंग श्री वैद्यनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में एक बैजू नामक एक भील ने शिवलिंग की पूजा एवं अर्चना की तथा आजीवन इसका अनन्य सेवक बना रहा। पुराणों में बताया जाता है कि जो मनुष्य इस ज्योतिर्लिंग का दर्शन कर लेता है उसे समस्त पापों से छुटकारा मिल जाता है। उस पर हमेशा भगवान शिवजी की कृपा बनी रहती है। दैविक, दैहिक, भौतिक कष्टों से छुटकारा मिल जाता है। उसे परम शान्तिदायक शिवधाम की प्राप्ति होती है। ऐसा आदमी सदैव सभी के कल्याण और भलाई में लगा रहता है। हमें ऐसे आदमी का संग साथ अवश्य करना चाहिए।

कांवर की परम्परा एवं श्रावण मास में कांवर की महिमा

कांवर चढ़ाने का प्रचलन कहते हैं त्रेता युग से प्रारम्भ हुआ था। भगवान राम ने त्रेता युग अवतार लिया था। उन्होंने भगवान शंकर पर कांवर चढ़ाई थी। तभी से यह परंपरा आज तक द्वापर और कलियुग में भी चली आ रही है। श्रावण मास में समुद्र मंथन का कार्य प्रारम्भ हुआ था जो पूरे मास चलता रहा समुद्र मंथन का कार्य देवता और असुरों ने मिलकर किया। इसलिए श्रावण मास में कावर चढ़ाने का विशेष महत्व माना जाता है। समुद्र मंथन में ऐरावत हाथी, उच्चश्रवा, लक्ष्मी, सरस्वती,कलश, चन्द्रमा, अमृत एवं हलाहल आदि 14 रत्न निकले थे। हलाहल को छोड़कर शेष 13 रत्नों को सुरों और असुरो ने आपस में बांट लिया था। हलाहल का पान भगवान शंकर ने किया। भगवान शंकर ने जहर को गले ही में रहने दिया था। इस लिए उन्हें नील कंठ भी कहा जाता है। विष के प्रभाव को कम करने के लिए भगवान शंकर ने अपने सिर पर चंद्रमा को धारण कर लिया। विष की जलन को कम करने हेतु सभी देवता बाबा भोलेनाथ को गंगा जल चढ़ाने लगे। क्योेंकि भगवान शंकर ने श्रावण मास में विषपान किया था इसलिए शिव भक्त श्रावण मास को ही कांवर चढ़ाने का उत्तम मास मानते है। वैसे तो कांवर की महिमा बारहोें मास निराली है। कांवर में भगवान शिव विराजमान रहते है। बाबा वैद्यनाथ में शिव की विष ज्वाला को कम करने के लिए सबसे ज्यादा 12 महीने कांवर चढ़ाई जाती है। इसलिए यह बाबा वैद्यनाथ की एक अद्भुत लीला है।
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पुराणों में बताया गया है कि 'धूपैदीपैस्तथा पुण्यै नैवेद्यै विविधैरपि। नः तुष्यति तथा शम्भुर्यथा कामर वारिणी।। यानी भगवान शिव शंकर कांवर से गंगाजल चढ़ाने से जितना प्रसन्न होते हैं उतना प्रसन्न धूप, दीप, नैवेद्य या फूल चढ़ाने से भी नहीं होते।

कांवर और शिव भक्ति के संबंध में यह भी कहा गया है कि 'स्कन्धे च कामरं धृत्वा बम-बम प्रोज्य क्षणे-क्षणे, पदे-पदे अश्वमेधस्त अक्षय पुण्यम् सुते।। यानी कांधे पर कांवर रखकर बोल बम का नारा लगाते हुए चलने से हर कदम के साथ एक अश्वेध यज्ञ करने का पुण्य प्राप्त होता है।


कांवर में जल लेकर भगवान शिव का अभिषेक करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस परंपरा की कड़ी में भगवान का राम का नाम भी शामिल है। 

बोल बम का महत्व

बताया जाता है कि ‘बोल बम’ ब्रह्मा, विष्णु, महेश के संक्षिप्त नाम से बना है। ‘बोल बम’ बोलने से बाबा वैद्यनाथ अपने भक्तों को कष्टों से रक्षा करते है, मन चहा  वरदान प्रदान करते है, पंचाक्षरी मंत्र को ‘ओम नम: शिवाय’ की तरह दो अक्षर का नाम बम। एक महामंत्र है। इस मंत्र से केवल भगवान शंकर ही नहीं ब्रह्मा व विष्णु जी भी प्रसन्न हो जाते है। सारे रास्ते जब कांवरियां प्रेम से बोल बम का नारा लगाते है तो सारा वातावरण ‘बम’ मय हो जाता है। यह ऐसा प्रतीत होता है जैसे सारे शरीर में स्फूर्ति फै ल गई है। कांवरियें भाई एक दूसरे को बम कहकर ही पुकारते है।

शिव शब्द की महिमा एवं उनके आठ नाम

भगवान शिव के हजारों नाम हैं परन्तु ज्योतिर्लिंगों की संख्या कुल बारह है। यदि हम शिव के नाम की महिमा पर विचार करने बैठें तो हम देखेंगे कि सृष्टि के प्रत्येक जीव-जन्तु, कंद-पत्थर इत्यादि में भगवान शिव का ध्वास मिलेगा। शिव शब्द दो वर्ण श और व से मिलकर बना है। संसार के किसी भी धर्म के प्राणी का हम नाम लें तो ज्ञात होता है कि उसमें वर्णों की कुल संख्या दो ही है। दो का अर्थ है शिव। इस प्रकार प्रत्येक प्राणी शिवमय है। आओ इस बात की सच्चाई का पता लगायें।

उदाहरण के तौर पर हम एक मुसलमान के नाम पर विचार करें जैसे ‘करीम’। इसमें वर्गों की कुल संख्या क+र+म अर्थात् 3 है। अब
3 को 9 से गुणा करें और गुणनफल को जोड़कर एक अंक बना लें। 3 गुणा 9 = 27, 2 + 7 = 9। अब इसमें एक जोड़कर 5 से भाग करें। भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक श्री बाबा वैद्यनाथ जी हैं और इनके आठ नाम हैं जिनकी महिमा बड़ी निराली है। इनके आठ नाम निम्न प्रकार हैं-

 1. आत्मलिंग- माता पार्वती द्वारा इनकी पूजा कैलाश पर्वत पर होती है जिसका उल्लेख शिव पुराण में आया है।

 2. माघेश्वर लिंग- इस लिंग का नाम उनके नाम पर माघेश्वर लिंग पड़ा।

 3. कामदलिंग- भगवान विष्णु ने इनकी उपासना अभीष्ट सिद्धि के लिए की थी। इसलिए इस लिंग का नाम कामद लिंग पड़ा।

 4. रावणेश्वर लिंग- रावण भगवान शिव का अनन्य भक्त था। और भगवान शंकर स्वयं भक्तवत्सल हैं इसलिए भगवान वैद्यनाथ रावणेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हो गए।

 5. वैद्यनाथ लिंग- देवताओं के वैद्य श्री अश्विनी कुमार जी एक बार स्वंय बीमार पड़ गए। तीनों लोकों में चिन्ता व्याप्त हो गई। भगवान शंकर की शरण में जाने पर श्री अश्विनी कुमार रोगमुक्त हो गए। तभी से इस ज्योतिर्लिंग का नाम वैद्यो के वैद्य अर्थात् वैद्यलिंग पड़ा।

 6. मर्गलिंग- मर्ग का अर्थ होता है सूर्य जैसा प्रकाशवान। चूंकि इसमें चन्द्रकान्त मणि का तेज है इसलिए इन्हें ‘मर्ग’ की संज्ञा मिली।

 7. तत्पुरुष- तत्पुरुष का अर्थ होता है- ‘सर्वशक्तिमान,’ ‘सर्वोपरी।’ भगवान वैद्यनाथ हर प्रकार की कामना पूरी करने में समर्थ हैं इसलिए इनका नाम ‘तत्पुरुष लिंग’ पड़ा।

 8. वामदेव या बैजूनाथ लिंग- जब कामना ज्योतिर्लिंग की स्थापना 

भगवान विष्णु द्वारा झारखंड की चिताभूमि में हुई थी तब बैजू नामव्य ग्वाले से भगवान विष्णु ने कहा था कि यदि तुम इस शिवलिंग पर प्रति दिन जल चढ़ाओगे तो तुम्हारी गायें दुगुना दूध देने लगेंगी। बैजू प्रतिदिन भगवान शिव की पूजा अर्चना करने लगा। भगवान ने प्रसन्न होकर उससे वर मांगने को कहा। बैजू बोला, भगवान! यदि आप सचमुच मुझसे प्रसन्न हैं तो अपने साथ मेरा नाम भी जोड़ दीजिए। श्री वैद्यनाथ ‘तथास्तु’ कहकर अन्तर्ध्यान हो गए। तभी से श्री वैद्यनाथ जी का नाम वैद्यनाथ पड़ गया। शिव पुराण में वर्णित एक श्लोक में लिखा है-

 ऐतैरस्यमि शम्भु पूजयति यो नमामि:।
 तस्मै सर्वे प्रदयात्यत्र वैद्यनाथे ने संशय:।।

उपरोक्त आठ नामों से जो भगवान वैद्यनाथ की पूजा अर्चना करते हैं उनकी हर मनोकामना वैद्यनाथ पूरी करते हैं। ये अति सूक्ष्म आठ नाम गागर में सागर के समान हैं, जो अपने आप में एक चमत्कार है और लीलाधर वैद्यनाथ की एक लीला।

वैद्यनाथ धाम मंदिर

काफी वर्षों के बाद वैजनाथ नामक एक व्यक्ति को पशु चराते हुए इस शिवलिंग के दर्शन हुए। इसी के नाम से यह ज्योर्तिलिंग वैद्यनाथ धाम के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मान्यता है कि वैद्यनाथ धाम के मंदिरों का निर्माण देव शिल्पी विश्वर्मा ने किया है। मंदिर निर्माण के विषय में कथा है कि मंदिर बनाते समय जब देवी पार्वती के मंदिर का निर्माण विश्वकर्मा कर रहे थे। उस समय अचानक दिन निकल आने के कारण विश्वकर्मा को निर्माण कार्य बंद कर देना पड़ा जिससे पार्वती का मंदिर विष्णु एवं शिव के मंदिर से छोटा रह गया। इस मंदिर के प्रांगण में गंगा मैया, भैरव नाथ सहित कई देवी-देवताओं के मंदिर हैं। मंदिर के प्रांगण में एक प्राचीन कुआं भी है।

वैद्यनाथ धाम देवघर यात्रा

वैद्यनाथ धाम में यूं तो साल भर लोग शिव के नवम ज्योर्तिलिंग के दर्शन के लिए आते हैं, किन्तु सावन एवं अश्विन मास में यहां श्रद्धालुओं की अपार भीड़ पहुंचती है। यहां आने वाले श्रद्धालु भक्तों को ‘बम’ के नाम से पुकारा जाता है।
देवघर कांवड़ यात्रा
देवघर में कांवड़ चढ़ाने का बड़ा ही महत्व है। श्रद्धालु भक्त सुल्तानगंज से गंगा का जल लेकर लगभग 106 किलोमीटर की दूरी की पैदल यात्रा करते हुए देवघर बाबाधाम की यात्रा करते हैं। रास्ते में कई धमर्शाला हैं जहां वह विश्राम करते हुए अपनी यात्रा पूरी करते हैं। कांवड़ चढ़ाने वाले इन बमों को सामान्य बम कहा जाता है। यह रास्ते भर बोल बम-बोल बम का नारा लगाते हैं।

डाक बम

कुछ लोग सुल्तान गंज से गंगाजल लेकर डाकबम बनकर 24 घंटे में 106 किलोमीटर की दूरी तय कर बाबा के धाम पहुंचते हैं और बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करते हैं।

दंड प्रणाम करने वाले बम

कुछ लोग अपनी मन्नतों को पूरा करने के लिए अपने घर से ही दंड प्रणाम करते हुए देवघर की यात्रा करते हैं। इनकी यात्रा काफी कष्टकारी एवं लंबी होती है।

देवघर का महात्म्य

बाबा भोले नाथ अनाथों के नाथ हैं। यह औघड़ दानी कहे जाते हैं। श्रद्धा पूर्वक जो भी इनके द्वार पर पहुंचता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। कुछ लोग यहां अपनी मनोकामना मांगने आते हैं तो कुछ अपनी मनोकामनापूर्ण होने पर शिव का आभार प्रकट करने यहां आते हैं। बाबा वैद्यनाथ की कृपा से पुत्र की प्राप्ति होती है। जिन कन्याओं की शादी में बाधा आ रही होती है, उसे शिव के इस द्वार पर कांवड़ चढ़ाने से उनकी शादी में आने वाली बाधा टल जाती है और जल्दी उनकी शादी हो जाती है। बाबा गरीबों की झोली भरते हैं। रोगी को रोग से मुक्ति देते हैं।

देवघर का प्रसाद

बाबा वैद्यनाथ के मंदिर के चारों तरफ बाजार है जहां चूड़ा, पेड़ा, चीनी का बना ईलायची दाना, सिंदूर, माला आदि मिलता है। लोग प्रसाद स्वरूप इन चीजों को खरीदकर अपने घर ले जाते हैं। यहां से कुछ किलोमीटर दूर वासुकीनाथ के रास्ते में घोड़मारा नामक स्थान हैं जहां का पेड़ा अति स्वादिष्ट होता है। आप बाबाधाम की यात्रा करते समय अपने परिवार एवं कुटुम्ब के लिए प्रसाद के तौर पर यहां से पेड़ा खरीद सकते हैं।

वासुकीनाथ देवघर

भगवान भोलेनाथ के गले में नाग की माला शोभा पाती है। नाग शिव का अभूषण है। शिव का सान्निध्य नागों को इसलिए प्राप्त है क्योंकि, वह शिव के उपासक माने जाते हैं। देवघर से लगभग 42 किलोमीटर दूर झारखंड प्रांत के दुमका जिले में स्थित भगवान शिव का मंदिर इसी का प्रत्यक्ष प्रमाण है जो नागराज वासुकी के नाम पर वासुकीनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। वासुकीनाथ का मंदिर भी वैद्यनाथ धाम मंदिर के समान ही आस्था एवं श्रद्धा का केन्द्र है। जिस प्रकार वैष्णों देवी के दर्शन के बाद भैरोनाथ का दर्शन किये बगैर यात्रा अधूरी मानी जाती है उसी तरह वैद्यनाथ धाम की यात्रा के बाद वासुकी बाबा का दर्शन आवश्यक माना जाता है।

वासुकीनाथ से जुड़ी कथाएं 

वासुकी नाथ से जुड़ी एक कथा है कि सागर मंथन के समय शिव ने नागराज वासुकी की सेवा से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी भक्ति का आशीर्वाद दिया था। दंत कथाओं में कहा जाता है कि यह शिव लिंग नागराज वासुकी द्वारा स्थापित है। वर्षों पहले रात्रि के समय नाग इस शिवलिंग की पूजा किया करते हैं। रात्रि के समय बड़ी संख्या में नाग यहां आकर शिव जी को दुग्ध स्नान कराते थे। बाद में लोगों को जब इस स्थान का पता चला तब यहां वासुकी नाथ का मंदिर बनवाया गया।  वासुकी नाथ से जुड़ी एक दूसरी कथा है कि इस क्षेत्र में एक शुद्र को कुष्ठ रोग हुआ। उसने रोग से मुक्ति के लिए शिव की उपासना की। शिव जी ने उसकी उपासना से प्रसन्न होकर उसे स्वप्न में बताया कि वासुकी नाथ के पंडित को अपने घर भोजन पर आमंत्रित करो। उनके भोजन करने से तुम्हें रोग से मुक्ति मिलेगी। स्वप्न में शिव के संदेश के अनुसार शुद्र पंडित के पास शिव का संदेश लेकर पहुंचा। पंडित ने उनके यहां भोजन करने से मना कर दिया। अगले दिन शिव जी ने पंडित से कहा कि वह शुद्र मेरा भक्त है अत: उसके घर भोजन करके उसे रोग से मुक्त होने में सहायता प्रदान करो।  पंडित ने शिव जी से इस कार्य के लिए मना कर दिया। इस पर क्रोधित होकर शिव जी ने पंडित को भी कुष्ठ रोग का श्राप दे दिया। पंडित शिव जी के श्राप से कुपित हो गया और उन्होंने आवेश में आकर शिव को श्राप दे दिया कि उनके ऊपर भी वज्रपात होगा। शिव जी के श्राप से पंडित को कुष्ट रोग हो गया तथा पंडित के श्राप से शिव जी पर व्रजपात हुआ जिससे शिवलिग खंडित हो गया। इस घटना के बाद पंडित को काफी दु:ख हुआ कि उनके श्राप के कारण उनके भगवान को कष्ट उठाना पड़ा। पंडित ने इसके बाद शुद्र के घर भोजन करना स्वीकार किया. वहां की महारानी ने खंडित शिवलिंग को चांदी से मेढ़वा दिया।

कांवरियों हेतु आवश्यक निर्देश

आवश्यक सामग्री- 

1. कांवर
2. दो जल पात्र
3. अगरबत्ती का पैकेट एवं दियासलाई
4. एक थैला
5. एक दरी व दो चादर
6. एक प्लास्टिक का टुकड़ा
7. टार्च एवं मोमबत्ती
8. एक तौलिया

नियम:

1. ब्रह्माचर्य का पालन करना।
2. मन, वचन, बुद्धि को शुद्ध रखते हुए भोले शंकर का स्मरण करते रहना।
3. सदा सत्य बोलना।
4. परोपकार एवं सेवा भावना रखना।
5. कांवर उठाने से पहले शौच, स्नान एवं भोजन से निवृत्त होना।
6. बम बम का नारा लगाना।
7. तेल, साबुन का प्रयोग वर्जित है।
8. जूते पहनना निषेध है।
9. कुत्ते से बचकर चलना चाहिए।

मार्ग विवरण

सुल्तान गंज से वैद्यनाथ धाम की दूरी का विवरण-
1. बाबा अजगैबी धाम से कमराय  6 किमी.
2. कमराय से मासूम गंज की दूरी  2 किमी.
3. मासूम गंज से असरगंज (धर्मशाला)  5 किमी.
4. असरगंज धर्मशाला से रणगांव धर्मशाला  5 किमी.
5. रणगांव से तारापुर    3 किमी.
6. तारापुर से माधोडीह   2 किमी.
7. माधोडीह से रामपुर धर्मशाला   5 किमी.
8. रामपुर से कुमरसार धर्मशाला   8 किमी.
9. कुमरसार से विश्वकर्मा टोला   4 किमी.
10. विश्वकर्मा टोला से महादेव नगर  3 किमी.
11. महादेव नगर से चन्दन नगर   3 किमी.
12. चन्दन नगर से जिलेबिया मोड़ धर्मशाला 8 किमी.
13. जिलेबिया मोड़ से टगेश्वर नाथ  5 किमी.
14. टगेश्वर नाथ से सुइया धर्मशाला  3 किमी.
15. सुइया से शिवलो    2 किमी.
16. शिवलोक से अबरखिया धर्मशाला  6 किमी.
17. अबरखिया से कांवरिया धर्मशाला कोटरिया 8 किमी.
18. कांवरिया कोटरिया धर्मशाला से लक्ष्मण झूला 8 किमी.
19. लक्ष्मण झूला से इनावरण धर्मशाला  8 किमी.
20. इनावरण से भूलभुलैया नदी   3 किमी.
21. भूलभुलैया नदी से गोरयारी धर्मशाला  5 किमी.
22. गोरयारी से पटनिया धर्मशाला  5 किमी.
23. पटनिया धर्मशाला से कलकतिया धर्मशाला 3 किमी.
24. कलकतिया धर्मशाला से भूतबंगला  5 किमी.
25. भूतबंगला से दार्शनिया   1 किमी.
26. दार्शनिया से शिवगंगा बाबा मन्दिर की दूरी 1 किमी.

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