Friday, 27 June 2014

भारत के राष्ट्रीय गीत के लेखक बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय जी






देश में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो, जिसने ' वन्देमातरम 'यह राष्ट्रगीत ना सुना हो। बंकिमचंद्र ही तो हैं इसके रचयिता। उन्होंने बहुत से उपन्यास लिखे हैं। उनमे से एक का नाम है आनंदमठ। यह गीत उसी पुस्तक में है। इस पुस्तक में स्वतंत्रता - संग्राम का चित्रण किया गया है। आज़ादी की लड़ाई की एक झाँकी इस पुस्तक में देखने को मिलती है।


जन्म और शिक्षा


बंकिमचंद्र चटर्जी का जन्म कंतलपाड़ा नामक ग्राम में, २७ जून सन १८३८ को हुआ था। यह स्थान बंगाल प्रान्त के चौबीस परगना जिले में है।इनके पूर्वज बड़े विद्वान् ब्राम्हण थे। उनके यहाँ हमेशा यज्ञ हुआ करते थे। इनके पिता यादवचन्द्र मिदनापुर के डेप्युटी कलेक्टर थे। माता बड़ी स्नेहमयी साध्वी स्त्री थी। बांग्ला भाषा में बंकिमचन्द्र का अर्थ होता है दूज का चाँद। दूज का चाँद दिन प्रति दिन बढता जाता है। धरती चांदनी से जगमगाने लगती है। बंकिमचन्द्र का यश भी दूज के चाँद सा दिन प्रति दिन बढ़ता ही गया। माता - पिता की ऐसी ही अभिलाषा थी। इसलिए उनका नाम बंकिमचन्द्र ही रखा गया।

इनकी शिक्षा मिदनापुर में ही आरंभ हुई। ये बड़े मेघावी छात्र थे। इनकी बुद्धिमत्ता से लोग बड़े प्रभावित होते थे। इनकी होशियारी देखकर सबको बड़ा आश्चर्य होता था। दूसरे मेघावी बच्चों की तुलना, मिदनापुर के शिक्षक, बंकिमचन्द्र के साथ सदैव ही किया करते थे। शालांत परीक्षा उत्तीर्ण होते ही उन्होंने हुगली के मोहसिन कालेज में प्रवेश लिया। ६ वर्ष के कालेज जीवन में भी उनकी बुद्धिमत्ता चमक उठी। कालेज की प्रत्येक परीक्षा वे, प्रथम श्रेणी में पास हुए और बहुत से पुरस्कार भी उन्होंने प्राप्त किये। खेलकूद की अपेक्षा उन्हें पुस्तकों से अधिक लगाव था। अधिकांश समय वे भिन्न - भिन्न प्रकार की पुस्तकें पढने में ही व्यतीत करते थे। संस्कृत में इनकी काफी रूचि थी और इन्होने उसका अध्ययन स्वयं ही उसे पढकर, समझ कर किया। संस्कृत भाषा के सौन्दर्य से वे बहुत प्रभावित हुए। इसका ज्ञान आगे चल कर उन्हें बहुत काम आया। आगे चलकर उन्होंने जब बंगला में पुस्तकें लिखी, तो संस्कृत का यह आधार उन्हें बहुत सहायक रहा।


सन १८५६ में इन्होने कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कालेज में प्रवेश किया। दूसरे ही वर्ष, सन १८५७ में देश की सेना ने स्वतंत्रता संग्राम छेड़ दिया। इस समय कलकत्ता का वातावरण बड़ा उलझन भरा था। बंकिमचन्द्र ने अपनी पढाई में बाधा न आने दी। उन्होंने तथा उनके मित्र यदुनाथ बोस ने बी. ए. पास कर लिया। बी.ए. पास होते ही कलकत्ता के लेफ्टी. गव्हर्नर ने इन्हें डेप्युटी कलेक्टर के पद पर नियुक्त कर दिया। अपने पिता, यादवचन्द्र के कहने पर उन्होंने इस पद को स्वीकार किया था। इनकी अवस्था तब केवल बीस वर्ष की थी।उन्होंने, इसी बीच, कानून की भी परीक्षा पास कर ली। स्मरण रहे उनके पिता भी डेप्युटी कलेक्टर थे।


स्वाभिमानी अधिकारी 


कानून का ज्ञान प्राप्त होने पर इन्हें डेप्युटी मजिस्ट्रेट बनाया गया। बत्तीस वर्ष सरकारी नौकरी करके ये सन १८९१ में निवृत्त हुए। उस समय अधिकांश अधिकारी अंग्रेज ही रहा करते थे , क्योंकि अपने देश पर तब उन्हीं का शासन था। अंग्रेजों को इस बात काबड़ा गर्व था। 

बंकिमचन्द्र भी बड़े सजग अधिकारी थे और ये कभी भी अंगेजों के आगे झुके नही। अगर वे अंग्रजों से डर जाते तो क्या आनंदमठ तथा 'वन्देमातरम' सा देशभक्ति पूर्ण गीत लिक सकते थे ? वे निडर थे, कट्टर थे, तभी तो अंग्रेज अदिकारी इनसे असंतुस्ट थे। कदम - कदम पर उनसे संघर्ष होता, परिणाम यह हुआ कि और ऊँचे ओहदे तक ये परिश्रम करने के बढ भी कभी नहीं पहुँच सके।

घटना उस समय की है जब वे डेप्युटी मजिस्ट्रेट थे। उस समय मनरो नामक अंग्रेज कलकत्ता का कमिश्नर था। एक बार अचानक,ईडन बगीचे में बंकिमचन्द्र की मनरो से भेंट हो गई। बंकिमचन्द्र सलामदुआ किये बगैर सीधे आगे बड़ गये। इस रूखे व्यवहार से मनरो इतना बौखला गया कि उसनेइनकी कलकत्ता से बदली कर दी। नौकरी के दौरान ये कभी एक जगह टिक न सके। उनका स्वाभिमान अंग्रेजों को खलता था इसलिये।


पत्नी का देहांत 


उस समय की रीति के अनुसार ग्यारह वर्ष की अवस्था में इनका विवाह हो गयाथा। उस समय उनकी पत्नी पाँच वर्ष की थी। जब ये जैसोर में डेप्युटी कलेक्टर थे, तभी पत्नी का देहांत हुआ। पत्नी के न रहने से इन्हें बड़ा सदमा पहुँचा। उनकी आयु उस समय मात्र २२ वर्ष की थी। अपनी युवा, सुंदर पत्नी की म्रृत्यु से वे बहुत दुखी हुए। कुछ दिनों बाद उन्होंने दूसरा विवाह किया। दूसरी पत्नी थीं राजलक्ष्मी देवी। उनकी तीन बेटियाँ थीं। जैसोर में ही इनका परिचय दीनबन्धु मित्र से हुआ। मित्रजी उस समय के बड़े नामी बंगला नाटककार थे। वे दोनों घनिष्ठ मित्र बन गये। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक '' आनंदमठ '' इन्होने दीनबन्धु मित्र को ही समर्पित की है।


लेखक बंकिमचन्द्र 


धीरे-धीरे बंकिमचन्द्र बंगला भाषा के सिद्धहस्त लेखक हो गये। इनके उपन्यास, कविताएँ बहुत ही लोकप्रिय हुई। इनके लेख निष्पक्ष विचारकों के लिये प्रेरक होते थे। देश की सभी भाषाओं में इनके उपन्यासों का अनुवाद हो चुका है। बंकिमचन्द्र इतने बड़े लेखक कैसे बन गये? वे स्वयं तो कहते हैं कि यह सिर्फ माता - पिता का आशीर्वाद है। अपने माता - पिता को वे देवतुल्य मानते थे। उनका चरण स्पर्श कर उनका चरणोंदय लिये बगैर वे कोई भी काम आरम्भ नहीं करते थे।

एक और भी बात है जिसने इनके जीवन पर काफी प्रभाव डाला। बचपन से ही ये रामायण - महाभारत के संपर्क में आये। फिर जीवन के कडुवे - मीठे प्रसंगों ने भी इन पर अमिट छाप डाली। सारी घटनाएँ, सारे प्रसंग उनके मन में अंकित हो गये। दूसरे, जगह-जगह इनकी बदली होती रही। भिन्न- भिन्न प्रकार के लोगों से पाला पड़ा। इन्हीं सभी घटनाओं की छाया इनके उपन्यासों में दिखलाई देती है। आईने में हम अपना प्रतिबिम्ब देखते हैं उसी तरह नाना प्रकार के आदमियों में, घटनाओं में इन्हें देश की स्थिति का प्रतिबिम्ब दिखलाई पड़ा। उपन्यास में आकर ये प्रसंग अमर हो गये।

जिस समय बंकिमचन्द्र ने लिखना शुरू किया उन्हीं दिनों जागृति की लहर बंगाल में आई हुई थी। अपनी हालत में उचित सुधार कैसे हो, इसके उपाय ढूढने में, बड़े-बड़े महापुरुष व्यस्त थे। इनमे से ही थे राजा राममोहनराय तथा ईश्वरचन्द्र विद्यासागर। राजा राममोहनराय सामाजिक कुरीतियों के पीछे पड़े थे। राजा राममोहनराय अंध श्रद्धाओं को नष्ट कर नये विचारों के लिये खुला वातावरण उत्पन्न हो, चेतना जागृत हो, इसलिये नई शिक्षा पद्धति लागू करने हेतु प्रयत्नशील थे। विद्यासागर बंगाली भाषा और बंगाला समाज के सुधार में व्यस्त थे। देशभक्ति की भावना सर्वत्र जोर पकड़ रही थी। सारा वातावरण अत्यंत उत्साह की लहर से व्याप्त था।


अंतिम तीन वर्ष 


बंकिमचन्द्र ने पहले कुछ कविताएँ लिखी फिर अंग्रेजी में एक उपन्यास लिखा। इसके बाद अपनी मातृभाषा, बंगाली में लिखना आरंभ किया। नौकरी के कारण लेखन में बड़ी बाधा आती थी। अंग्रेज अफसरों ने यहाँ भी टाँग अड़ाने की कोशिश की। उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाने की कोशिश की।

अत: उन्होंने निवृत्त होने की अनुमति चाही। उस समय उनकी आयु ५३ वर्ष थी। पर चूँकि अंग्रेज अधिकारी असंतुष्ट थे,वे उन्हें निवृत्त भी नहीं होने दे रहे थे। जब एक नया लेफ्टी. गवर्नर चार्लस इलियट नियुक्त हुआ तो बंकिमचंद्र उनसे मिले। उन्होंने बताया कि वे पुस्तकें लिखना चाहते हैं, अत: समय चाहिए। वे निवृत्त होना चाहते हैं। इलियट ने अनुमति दे दी। बंकिमचंद्र निवृत्त हुए तो उन्हें चार सौ रूपये प्रति माह पेंशन मिलने लगी। निवृत्त होने पर उनकी इच्छा अनेक पुस्तकें लिखने की थी। परन्तु वे लेखनकार्य को अधिक समय नहीं दे सके। उनका स्वास्थ्य ख़राब होता गया। और आयु के ५६ वें वर्ष में उनका देहांत हो गया। वह सन था १८९४। अपने अंतिम समय में दार्शनिक हो गये थे। जीवन से मोह समाप्त हो गया था। वे बीमार थे, पर उन्होंने औषधि लेना बंद कर दिया था।

डॉक्टरों ने उनसे कहा, "आप औषधि नहीं लेंगें तो आप अधिक समय जीवित नही रह सकोगे। आप तो अपनी मृत्यु को स्वयं बुला रहे हैं। "

"पर आपसे किसने कहा कि मैं दवाई नहीं ले रहा हूँ। मैं उसका प्रयोग कर रहा हूँ।" उन्होंने कहा।
डॉक्टर चकित थे।'' पर दवाई है कहाँ ? देखूँ ? '' उन्होंने कहा।
बंकिमचंद्र ने अपने पास रखी श्रीभगवतगीता उठायी और कहा, "यह रही मेरी दवाई।"
श्रीभगवतगीता के अध्ययन से उनका स्वभाव पूर्णत: परिवर्तित हो गया। उन्होंने उपन्यास लिखना बन्द कर दिया। उनका लेखन अब दार्शनिक और भगवत - भक्ति पर अधिक केन्द्रित हो गया। उन्होंने "कृष्णचरित्र " लिखा, धर्म पर पुस्तकें लिखी, गीता और वेदों का अनुवाद उन्होंने प्रारंभ किया। परंतु वेदों का अनुवाद पूर्ण करने के पूर्व ही उनकी मृत्यु हो गयी। बंकिमचन्द्र निर्मल ह्रदय के व्यक्ति थे।


अन्य प्रसिद्ध व्यक्तियों के संस्मरण


भारत के विश्व - प्रसिद्ध कवि रविन्द्रनाथ ठाकुर ने उनके बारे में एक संस्मरण दिया है। एक समय कवि सम्मेलन में लोग, अलग-अलग गुटों में चर्चा कर रहे थे। एक व्यक्ति संस्कृत की कुछ स्वरचित काव्य पंक्तियाँ सुना रहा था। विषय देशभक्ति था। कवि कविता पढ़ता जा रहा था। एक स्थान पर दारिद्र्य से पीड़ित भारतीयों का उपहास किया गया था। बंकिम ने वह सुना तो उनसे रहा नहीं गया। अपना मुँह दोनों हाथों से ढाँककर, वे वहाँ से तुरंत चले गये।

भगवान रामकृष्ण परमहंस और बंकिम दोनों एक- दूसरे से परिचित थे। बंकिम शब्द का अर्थ ही है- "जो झुका हुआ है।" श्री रामकृष्ण ने एक बार विनोद में उनसे पूछा," तुम्हे किसने झुकाया है ? "बंकिम का उत्तर था,"अंग्रेज की लात जो पड़ी थी। "श्रीरामकृष्ण बन्किम केऐतिहासिक उपन्यासों से परिचित थे। जब स्वामी विवेकानंद नरेंद्र नाम से ही परिचित थे, श्रीरामकृष्ण ने उन्हें बंकिमचन्द्र के पास भेजा था।


वह अनोखी कथा


वह बड़ा घना जंगल था। तरह तरह के झाड़ पेड़ लगे थे। जंगल इतना घना था कि वहाँ तक सूर्यप्रकाश भी नहीं पहुँच पाता। चारों ओर पत्ते ही, नजर आ रहे थे। अंधकार भी घना था। दिन-दहाड़े भी वहाँ जाते समय भय लगता। कहीं भी किसी कि आवाज़ तक नहीं सुनाई पड़ती थी। जंगल की शांति भंग होती थी पत्तों की सरसराहट से और जंगली जानवरों की आवाज़ से।

इस तरह का घना जंगल। समय आधी रात का। जंगल की यह शांति अकस्मात किसी मनुष्य की आवाज़ से भंग हुई।
"क्या मेरी मनोकामना पूरी नहीं होगी? " फिर शांति छा जाती है।
फिर कोई आवाज़ लगाता है,"क्या मेरी मनोकामना पूरी नहीं होगी? " इस बार भी कोई उत्तर नहीं मिलता।
एक बार और वही प्रश्न दोहराया जाता है। इस बार प्रश्न का उत्तर मिलता है। उत्तर के बदले उलटा प्रश्न पूछा जाता है,"बदले में मुझे तुम क्या दोगे ? "
पहली आवाज़ जवाब देती है, "जो कुछ भी मेरे पास है,सब देने के लिये तैयार हूँ। अपनी जान तक ! "
"अरे जान देने में क्या रखा है ? यह काम तो कोई भी कर सकता है। " 
"फिर अब मैं क्या करूँ ? क्या दे सकता हूँ बदले में ? " पहली आवाज़ ने पूछा।
झट दूसरी तरफ से उत्तर आया,"समर्पण ! दूसरों के सुख के लिये तिल-तिल जलने की तैयारी ! "
कैसी मजेदार है कहानी ! घना जंगल, सूनी भयावह रात और वहाँ सुनाई पड़ती है आदमी की आवाज़ ! पुस्तक छोड़ने की तो इच्छा ही नहीं होती। यह प्रसंग "आनंदमठ " पुस्तक का है। इसी पुस्तक में वन्देमातरम गीत आता है। फिर इसमें क्या आश्चर्य कि लोग बंकिमचंद्र के उपन्यास उत्सुकता से पढ़ते।


प्रकाशित कृतियाँ


उन्होंने ' बंगदर्शन ' नामक मासिक पत्रिका चली थी। आनंदमठ उपन्यास उसी में प्रकाशित हुआ था। बाद में १८८२ में वह पुस्तक के रूप में छपा। उस उपन्यास ने बंकिमचंद्र को कीर्ति के शिखर पर पहुँचा दिया। इसका दूसरा संस्करण भी हाथोंहाथ बिक गया। उनके जीवन काल में ही उसके पाँच संस्करण निकले। बंकिम के उपन्यास पाठकों के लिये एक नई अनुभूति थे। बंगाल की जनता तो उनके पीछे दीवानी थी। जब ये उपन्यास अन्य भाषाओं में अनूदित हुए तो उन भाषाओं के पाठक भी आनंदित हुए।

बंकिम इस भांति बंगाल के लिये एक अमूल्य निधि हो गये। बंकिमचंद्र ने लेखक की शैली कैसी हो, इस पर लोगों को विचार करने बाध्य किया। उपन्यासकार एक कथा प्रस्तुत करता है। फिर उसे वह कैसे लिखे? उसकी भाषा ऐसी होनी चाहिए - पाठक समझ सके। जैसी वे बोलते हैं- भाषा भी वैसी ही हो। बंकिम की भाषा बोलचाल की जरुर थी, पर फिर भी आकर्षक थी उनकीं लेखनशैली से बंगला भाषा को नया गौरव मिला।

कुल पन्द्रह उपन्यास उन्होने लिखे। इनमें से "दुर्गेशनंदिनी ", "कपालकुंडला ", "मृणालिनी", "चंद्रशेखर "तथा "राजसिंह " बहुत ही लोकप्रिय हैं। "आनंदमठ ",  "देवी चौधरानी" तथा "सीताराम" इन पुस्तकों में उस समय की परिस्थिति का चित्र है।

वे बड़े ही सजग लेखक थे। लोगों की भावना को भलीभांति ताड़ लेते थे। समाज की अच्छाइयों और बुराइयों का चित्रण वे खूबी से करते थे। इन्ही का चित्र "विषवृक्ष ", " इंदिरा", "युगलांगुरिया ","राधारानी ","रजनी " और "कृष्णकांत की वसीयत" में देखने को मिलता है।


आनंदमठ 


यह उपन्यास, जैसा पहले कहा जा चुका है, किश्तों में छाप चुका था, पाठक बंगदर्शन में इसकी अगली किश्त की उत्सुकता से प्रतीक्षा करते थे। सन १७७३ में स्वराज्य के लिये बंगाल में जो आन्दोलन हुआ था, उसीकी कहानी आनंदमठ में है।इस वर्ष बंगालमें भीषण अकाल पड़ा था। अंग्रेज भूखों मरनेवाली जनता की परवाह ही नहीं करते थे। बेचारी सीधी - सादी जनता अंग्रेजों से डरती थी। लोग बहुत ही दुखी थे, फिर भी सच बात कहने से डरते थे।" चारों ओर जैसे अँधेरा छाया था।

सत्यानंद नामक व्यक्ति को यह हालत देखकर बहुत ही दुःख हुआ। उसने प्रतिज्ञा की कि वह अपनी मातृभूमि की मुक्ति के लिये, छुटकारे के लिये, भरसक प्रयत्न करेगा। पहले हम पढ़ चुके हैं कि घने, अँधेरे जंगल में एक आदमी चीख-चीख कर कहता है, "क्या मेरी मनोकामना पूरी नहीं होगी ? " तो यह पुकार इन्ही सत्यानंद की है और घना अँधेरा - भरा जंगल है बंगाल ! धन्य है लेखक की कल्पना की !
" पदचिह्न " नाम के गाँव में एक सम्पन्न व्यक्ति रहता था। वह बहुत ही धनवान था। उसका नाम था महेंद्र। कल्याणी उसकी पत्नी थी। उनका एक बच्चा भी था। अकाल के कारण उन्हें अपना गाँव छोड़ना पड़ता है।चलते - चलते वे रास्ता भूल जाते हैं। जंगल में भटक जाते हैं। कल्याणी और उसके बच्चे को अकाल पीड़ित, भूखे आदमी पकड़ लेते हैं। अवसर मिलते ही कल्याणी वहाँ से भाग निकलती है।

सत्यानंद ने साधु सन्यासियों की एक टोली बनाई थी। इस टोली को सन्तान कहते थे। सत्यानंद कल्याणी को अपनी शरण में ले लेते है। मुखिया सत्यानंद अपने साथी भवानंद को महेंद्र को ढूंढ़ने के लिये भेजता है। भवानंद इस काम में सफल हो जाता है। इसी बीच अंग्रेजों के सिपाही दोनों को पकड़ लेते हैं। रस्सियों से बांधकर दोनों को एक बैलगाड़ी में पटक देते हैं। इस बैलगाड़ी में सरकारी खजाना भी रहता है। दोनों भाग निकलने में सफल हो जाते हैं। बाद में सन्यासी अंग्रेजों का खजाना भी लूट लेते हैं।

महेंद्रफिर अपने परिवार से मिलता है। पत्नी की इच्छानुसार वह भी इन सन्यासियों की टोली में शामिल हो जाता है। अपनी मातृभूमि की मुक्ति के लिये वह भी कुछ करना चाहता है। शुभ काम में हरेक को योगदान देना ही चाहिए। इसी बीच कल्याणी डूब जाती है। उसे जीवानंद नामक दूसरा सन्यासी बचा लेता है। उस वह अपनी पत्नी और बहन की देखरेख में छोड़ जाता है।

अकाल की भीषणता बढती जाती है। जंगली जानवर और चोर-डाकू दिन दहाड़े अपने करतब दिखाते हैं। उस समय वारेन हैंस्टिंग्ज भारत का गवर्नर जनरल था। इन सन्यासियों को नष्ट करने के लिये वह केप्टन थामस को भेजता है। इस लड़ाई में थामस मरा जाता है संय्सियों के नेता भवानंद की भी मृत्यु हो जाती है। मरते समय वन्देमातरम गीत गाकर मातृभूमि की आराधना करते हैं।

सत्यानंद आनंदमठ में लौट आते हैं। वहाँ उनकी भेंट एक बड़े विद्वान् पंडित से होती है। पंडितजी बताते हैं, " मुस्लिम राज्य अब बहुत जल्द ख़त्म हो जायेगा। यह लड़ाई तुम अब बंद कर दो ! अब इस देश पर अंग्रेज राज करेंगे। अंग्रेजों से जीत पाना टेढ़ी खीर है क्योंकि आपसी फूट के कारण हिन्दू कमजोर पड़ गये हैं। अज्ञान ने उन्हें अंधा बना दिया है। "

सत्यानन्द का क्रोध बढ़ जाता है,कारण उन्हें अंग्रेजी राज से भी घृणा है। बस; यहीं आनंदमठ उपन्यास समाप्त हो जाता है। यह उपन्यास अंत तक उत्कंठा कायम रखता है।

प्रत्येक पात्र के हर्ष-शोक, विजय-पराजय के साथ उन बातों में पाठक स्वयं को भूल जाता है। इसके पात्र स्त्री-पुरुष कोई देवी-देवता नहीं - हम जैसे ही स्त्री - पुरुष हैं। सन्तान - साधारण - जन हैं। इसी भूमि के पुत्र, जिन्होंने मातृभूमि के लिये, अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया है। आनंदमठ देशभक्ति की कहानी है। देश के लिये जीनेवाले और देश के लिये मरनेवालों की यह कहानी है। सन्यासी, जो घर द्वार तक का मोह छोड़ देते हैं, देश के लिये अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं। जीवानंद की पत्नी शांति कितनी बहादुर है। वह मर्दाने वेश में घूम - घूम कर दुश्मनों की तोह लेती है। अंग्रेज अधिकारियों की आँख में धूल झोंकने वह दाढ़ी - मूछ लगाकर भी घूमती है। सत्यानन्द को दुश्मन की खबर उससे बराबर मिलती रहती है।

भवानंद को मातृभूमि से कितना प्रेम है यह एक ही बात से साफ़ हो जाता है। महेंद्र से वह कहते हैं,"हमारी तो बस एक ही माँ है और वह है मातृभूमि। न हमारी और कोई माँ है,न पिटा,न पत्नी,न बच्चे,न घरद्वार ! यह सुजला, सुफला धरती ही तो हमारी माँ है। "

जो भी साधु - सन्यासीयों की इस टोली का सदस्य बनना चाहता था,उसे मातृभूमि की शपथ लेनी पड़ती थी। सत्यानन्द सवाल पर सवाल पूछते जाते थे और सदस्य उनके जवाब देते जाते थे। उपन्यास का यह अंश आज भी अगर हम पड़ते हैं तो शरीर आनंद से रोमांचित हो जाता है। मन आनंदविभोर हो उठता है। अब सवाल जवाबों का नमूना देखें –

"जब तक मातृभूमि मुक्त नहीं हो जाती, क्या तब तक के लिये तुम अपना घर - द्वार छोड़ सकते हो ? "
"क्यों नहीं।" 
"क्या तुम अपने माता - पिता, भाई-बहिन इन सबको छोड़ सकते हो ? "
"जरुर ! "
"पत्नी, बच्चे भी ? "
"धन, सुख _ चैन इन सब पर पानी छोड़ सकते हो ? "
"जी हाँ, हमने तो ऐसा संकल्प ही किया है ! "
"लड़ाई का मैदान छोड़कर तुम भाग न सकोगे ! "
"ऐसी कल्पना तो हम स्वप्न में भी नहीं कर सकते ! "
"देखो, तुम्हे अपनी जात - पात सब कुछ भूलना होगा। न यहाँ कोई ब्राम्हण ही है, न शुद्र। है तुम्हारी तैयारी ? "

"हम जात - पात मानते ही नहीं ! हम सब एक ही माँ की संतान हैं ! "
"धन्य हो भाई ! तुमको हम सहर्ष हम अपनी संस्था का सदस्य बनाते हैं। "
यदि हम चाहते कि हमारी खूब उन्नति हो, तो भी हमारे पास दूसरा कोई चारा नहीं सिवाय इसके कि हम "संतान" इस संस्था के नियमों का पालन करें। उनपर अमल करें।

आनंदमठ नामक कोई संस्था नहीं थी। बंकिम ने यह इतिहास स्वयं रचा। पाठकों को प्रेरणा दी। स्वार्थभाव से परे सोचने कीशक्ति दी। देश के लिये ही जीनेवाले अमर पात्रों की रचना की।बंकिमचंद्र ने इस पुस्तक के द्वारा यह मन्त्र दिया। "वन्देमातरम। मातृभूमि को प्रणाम। "

बंकिम का सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यास आनंदमठ है। उन्होंने अन्य भी रचनाएँ की। हम अब दुर्गेशनंदिनी उपन्यास की कहानी बताते हैं। एक किला है। नाम मंदारन। वीरेन्द्रसिंह इस किले का प्रधान अधिकारी है। इस अधिकारी को दुर्गेश कहते है।उसकी लड़की तिलोंत्तमा दुर्गेशनंदिनी है। यह कहानी तिलोत्तमा और जगतसिंह की है। जगतसिंह का पिता मालसिंह राजपूत होकर भी मुग़ल बादशाह अकबर का सैनिक था। एक दिन जगतसिंह की नजर तिलोत्तमा पर पड़ती है। वह उससे विवाह करना चाहता है। इसमें एक मुश्किल है। वीरेन्द्रसिंह जगतसिंह का शत्रु है। शत्रु की लड़की से विवाह ? यह तो असंभव है। कहानी का एक पात्र, आयशा, जो दूसरों के सुख के लिये अपना सुख भूल जाती है। उपन्यास का अंत जगतसिंह और तिलोत्तमा के विवाह के साथ होता है। इस उपन्यास का प्रथम प्रकाशन १८६५ में हुआ और २८ वर्षों में इसके तेरह संस्करण निकालने पड़े।


विषवृक्ष


जैसा पहले कहा है बंकिम ने अपने चारों ओर के लोगों पर ही लिखा है। इस क्रम में उपन्यास "विषवृक्ष " है। यह एक सामाजिक कहानी है - गोविंदपुर हरिपुरा जिले में एक छोटा सा गाँव है। नगेन्द्र इस गाँव का धनी जमींदार है। वह बहुत धनी है। कुंदनंदिनी नामक युवती से उसकी अचानक भेंट होती है। वह युवती बेसहारा है। नगेन्द्र उसे आश्रय देता है। कुछ दिनों बाद ताराचरण के साथ उसका विवाह हो जाता है। विवाह के तीन वर्ष पश्चात ताराचरण की मृत्यु हो जाती है और कुंदनंदिनी फिर अकेली रह जाती है। नगेन्द्र पुन: आश्रय देता है। इसी समय हीरा नाम की स्त्री ऐसा कपट नाटक करती है कि नगेन्द्र, उसकी पत्नी सुर्यमुक्ति और कुंदनंदिनी का जीना दूभर हो जाता है। सुर्यमुक्ति कि मृत्यु तो बहुत ही दर्दनाक होती है। 

"विषवृक्ष" का अर्थ ही होता है,जहर का वृक्ष। स्वार्थ, विष ही तो है। यह विष वृक्ष हरेक के मन में उगता है, पनपता है। मन अगर साफ है तो यह वृक्ष पनप ही नहीं सकता। जिसके मन में कपट है, जिसका मन मैला है,वहीँ यह पनपता है। जिसका मन स्वछ है, दृढ निश्चयी है, जो मनुष्य क्रोध और लालच के वशीभूत हो जाता है, उसका सर्वनाश निश्चित है।

बंकिम के तीन उपन्यासों कि ही चर्चा यहाँ कि है। उनके अन्य उपन्याश "कपाल कुण्डला " और " देवी चौधरानी " भी अंत्यंत लोकप्रिय रहे। बंकिमचंद्र ने अपने उपन्यासों के द्वारा समाज को नयी रह दिखाई। नई दिशा दी। आजतक के उपन्यासों में केवल कपोल- कल्पित कथाएं रहा करती थीं। दुर्गेशनंदिनी ने इस प्रथा को तोडा। एक नया युग प्रारंभ हुआ। कथानक रोचक था। समाज के हमारे आसपास के लोगों से ही सम्बंधित था। अछे और बुरे दोनों। क्रोधी और संयमी।

इसकी विशेषता यह थी कि पाठक पात्रों में ही खो नहीं जाता, वह स्वयं से प्रश्न करने लगता है ऐसा क्यों हुआ ? सही कौन है ? गलत कौन है ? लोग समय काटने के लिये उपन्यास नहीं पढ़ते थे। मनोरंजन के साथ साथ उपन्यास लोगों कि विचारशक्ति को जागृत कर्ता था। 

उनकी सबसे बड़ी देन है " वन्दे मातरम "। स्वराज्य के लिये जिन-जिन लोगों ने आन्दोलन किया, वे सब इसी मन्त्र का उपयोग करते थे। वन्दे मातरम कि गूँज सुनते ही अंग्रेज सरकार होश खो बैठती थी। यहाँ तक कि वन्दे मातरम कहने पर लोगों को जेल तक भेजा जाता था। 

हमारे लिये तो वन्दे मातरम एक अमूल्य धरोहर है। एक ऐसा खजाना है जिसकी कीमत नहीं आंकी जा सकती। यह हमेशा भारत माता के चरणों में नत होने की प्रेरणा देता रहेगा।


भगवान कृष्ण की दृष्टि


बंकिमचंद्र अपने उपन्यास के कारण विख्यात हुए। पर उन्होंने अन्य ग्रंथ भी लिखे जो उत्कृष्ट हैं। इनमे से कुछ विशेष है "कृष्ण चरित्र " "धर्मतत्व " "देवतत्व "। और श्रीमदभगवतगीता पर विवेचन। अंग्रेजी और बंगला में उन्होंने हिंदुत्व पर लेख लिखे। अंग्रेजी के ग्रंथों का भी उनका अध्ययन गहरा था। वे स्वयं एक सनातन हिन्दू - परिवार के थे। वे स्वयं एक तत्वचिंतक थे। उनका लिखा "कृष्णचरित्र " उत्कृष्ट रचना है। कृष्ण, लोगों की नजरों में एक देवता रहे हैं और उसी रूप में उन्हें पूजा जाता है। पर कृष्ण के बारे में कई ऐसी कथाएं हैं जिन्हें पढ़कर यह विचार उठता है कि क्या कृष्ण पूजा के लिये योग्य पात्र हैं ? कृष्ण कि सोलह हजार पत्नियाँ थी, ऐसा विश्वास है। बंकिमचंद्र ने "महाभारत " और "हरिवंश " का अध्ययन किया था। पुराण भी पढ़े थे जिनमें कृष्ण का जीवन आता है। उन्होंने प्रत्येक ग्रंथ का गहराई से अध्ययन किया और क्या स्वीकार्य किया जाय और क्या छोड़ा जाय, इसका विवेक के साथ विचार किया। उनकी दृष्टिमें कृष्ण ने जो जीवन दर्शन दिया है, उससे बढ़कर दर्शन, कोई दे नहीं सकता। कृष्ण, पावित्र्य, न्याय कि सकर मूर्ति थे| उन्होंने स्वयं के लिये कुछ भी अपेक्षा नहीं की। कृष्ण- सा त्यागी महापुरुष दूसरा हो ही नहीं सकता, इसलिए उनका जीवन अनुकरणीय है| वह हेशा प्रेरणा देता रहेगा।

बंकिमचंद्र पत्रकार भी रहे। उन दिनों इनी - गिनी पत्रिकाएं थी। विविध सामग्री से पूर्ण पत्रिका की आवश्यकता उन्होंने अनुभव की। कथा- कहानियों के साथ आधुनिक विज्ञानं पर भी लेख चाहिये यह उन्होंने अनुभव किया।

सन १८७२ में "बंगदर्शन " पत्रिका आरंभ की। पत्रिका के पहले अंक में वे लिखते हैं, न मुझे अंग्रेजी से घृणा है, न अंग्रेजों से। हमें अंग्रेजी सीखनी चाहिये। उसका साहित्य पढ़ना चाहिये। इतना होते हुए भी हमें एक बात याद रखनी चाहिये कि जो अपना है वह हमेशा अपना ही रहेगा। जब तक हम अपनी भावनाओं को अपने विचारों को मातृभाषा में व्यक्त नहीं करेंगें, तब तक हमारी उन्नति हो ही नहीं सकती।

बंकिमचंद्र का उद्देश्य था लोगों कि विज्ञान के प्रति रूचि बढ़ाना। प्रगति के चरणों कि ओर उनका ध्यान बढ़ाना। यह वह समय था जब शिक्षित भारतीय अपनी मातृभाषा कि बजाय, अंग्रेजी में बोलना गौरव समझते थे। बंकिम बंगला भाषा के प्रति प्रेम, शिक्षित बंगला भाषी लोगों में बढ़ाना चाहते थे। वे चाहते थे कि ये लोग अपना ज्ञानभंडार अपनी भाषा के माध्यम से, दूसरों के लिये लुटा दें।

रवींद्रनाथ टागोर कहते हैं कि "बंगदर्शन अषाढ़ कि प्रथम बौछार सा (जून, जुलाई ) सुखद है। अषाढ़ कि पहली बौछार से, गर्मी में झुलसे पेड़ - पौधों को नवजीवन मिलता है| बंगदर्शन ' ने जानता को प्रगति का नया रास्ता दिखाया है। " जानता उसके अंकों कि प्रतीक्षा करती।उपन्यास, नाटक,काव्य,लेख, आलोचना के स्तंभ इसमें रहते। भावी पत्रिकाओं के लिये इसने मार्ग प्रशस्त किया।


महान लेखक, महान शिक्षक


देश के महान लेखकों में बंकिमचंद्र का नाम पहली श्रेणी में ही रहेगा। उनका अधिकांश लेखन बंगाली में हुआ है। पर उसमें भारतीय संस्कृति का आधार लिया गया है। उन्होंने हिंदुत्व पर उत्तमोत्तम पुस्तकें लिखीं। हिंदुत्व के सिद्धांतों का कड़ाई से परीक्षण किया। जहाँ आवश्यक हुआ, सामाजिक सुधार सुझाये। कई लोगों ने उनका विरोध किया।भगवान कृष्ण पर उनके विचारों का सनातनी लोगों ने उपहास किया। पर बंकिम विचलित नहीं हुए। तत्कालीन शिक्षित समाज अंग्रेजी और अंग्रेजीयत के प्रति आकर्षित था। ऐसे लोगों को लक्ष्य कर उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति को, अपनी भाषा पर लज्जा नहीं आनी चाहिये। उन्होंने कहा, अपनी भाषा से ही लोग प्रगति कर सकते हैं।हमें किसी भाषा से घृणा नहीं करनी है, हमें तो अपना ज्ञान संग्रह बढ़ाने के लिये, प्रत्येक भाषा का प्रयोग करना चाहिये। पर यदि प्रगति करनी है तो एक ही मार्ग है - अपनी भाषा का। वे उन महान लोगों में से थे, जिन्होंने भारतीयों में स्वाधीनता के लिये संघर्ष करने की प्रेरणा दी। उनके लेखन से लोग राष्ट्रीयता का अर्थ लोग समझ सके। 'आनंदमठ ' राष्ट्रभक्ति पर लिखा एक शानदार उपन्यास है।

उपन्यासकार, कथा लेखक द्वारा रचित प्रत्येक पात्र उसकी राष्ट्र के लिये एक देन होती है। बंकिम ने ऐसे कई पात्रों की रचना की। वे उनमे से एक थे, जिन्होंने साहित्य को दिशा दी। "आनंदमठ " में भवानंद कहते हैं "हमारी मातृभूमि ही हमारी माता है। हमारी कोई माँ नहीं - पिता नहीं - पत्नी नहीं - पुत्र नहीं - परिवार नहीं। हमारी केवल यही सुजला सुफला - मलयजशीतला मातृभूमि ही है। "

इसी उपन्यास में शांति अपने पति से, कहती है "स्वामी - आप मेरे गुरु हैं। क्या आपके कर्तव्य का बोध मैं कराऊँ ? आप वीर हैं। क्या वीरता का पाठ मैं आपको दूँ ? आइये हम "वन्देमातरम "का घोष करें।" भवानंद तथा शांति से पात्र हमारे ह्रदय में सदा अमर रहेंगें। यह बंकिमचंद्र ही थे जो ऐसी सशक्त रचना दे सके। उनके साथ ही हम अपने ह्रदय से पुकारें –

'वन्देमातरम'

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