Tuesday, 27 May 2014

कन्या के विवाह में होने वाले मांगलिक कार्य- क्रम ( नेग ) एक नजर में :-



कन्या के विवाह में होने वाले मांगलिक कार्य- क्रम ( नेग ) एक नजर में :-




विवाह हाथ लेना
हल्दात
रात्रिजागरण
चाब
बान
बिनोरी
बारात आगमन पर कवरजी का तिलक ( अपनी पा्रर्थनाअनुसार )
कुंवारा माण्डा, थाम्ब रोपण एवं ब्राहम्ण भोजन
भात
चाक पूजना एवं मूंग धोना
दात
घरूवा
कोरथ
बारात स्वागत ( द्वार-चार ) एवं जय माला
सजनगोठ, पतल निकालना एवं साख जलेबी
लग्न
कन्या दान
पाणिग्रहण संस्कार
थापा पूजन
सिरगूथी
पहरावनी
थली पूजन
विदार्इ एवं षिष्टाचार



( देष, समाज, काल ( समय ), परिसिथतियों व प्रथाओं के अनुसार उपयर्ुक्त कार्यक्रमों में विभिन्नता भी हो सकती है )।

-: आवष्यक सामग्री :-

विवाह हाथ :- रोली, मोली, चावल, पुष्प,दुर्वा ,धूप, अगरबती, दीपक, बती, माचिस , गुड़, -1.भेली, लौंग- 11.इलाइची-11, पान-11, सुपारी-11, जनेउ-1 जोडा़, केला-11, मिटटी की कलष -1, मिटटी की सरार्इ -2,आम का पता, मुंग, चावल -250ग्राम, हल्दी पीसी हुर्इ-50ग्राम, देषी घी-100ग्राम, मलमल का सफेद कपडा़ -2मीटर, निमंत्रण पत्रिका-1

हल्दात :-रोली, मोली, चावल, पुष्प, दुर्वा, धूप, अगरबती, दीपक,बती, गुड़, लौंग, इलाइची, पान, सुपारी, ऋतुफल, जनेउ 1 जोडा़, मिटटी का कलष-1, मिटटी की सरार्इ -2, आम का पता, मूंग -250ग्राम, जौ -250ग्राम, खडा़नमक -250ग्राम, दो सुपेली, उखल, मुसल, कठआ-1, लोहे का कुचीया-2, पीढा-1 पतल-2, पीसी हुर्इ मुंग की दाल-250ग्राम ( मंगोड़ी चूटने के लिये ) एक ताला चाबी सहित खडा़-लाल मिर्च-7, हसली, अगूठी ( छाप ), हल्दी की 7 गांठ ।

चाब :-कहीं-कहीं वर पक्ष की महिलायें वधू प्क्ष के यहां चाब लेकर जाती है। वधू पक्ष चाब का नेग देते हैं। इस समय महिलाओं की मिलनी भी होती है।

रात्रि जागरण :- थापा मांड कर रात्रि जागरण होता है। रात्रि जागरण के बाद बान का नेग किया जाता है।

बान:- मिटटी की सरार्इ -4, जौ का आटा-50 ग्राम, सरसों का तेल-50 ग्राम, पीसी हुर्इ मेहंदी-50 ग्राम, दही-50 ग्राम, दुर्वा,रोली, मोली, चावल, झोल वास्ते एक प्याला चांदी अथवा कांसी का, पाटा (लकड़ी का बिना कांटी का) चंदवे का ओढना एक मीठा चीला, चिल्ली, रेषमी फूलमाला, कंगन डोरा, नाल इत्यादि।े

बिनौरी :- देष, काल व समाज की प्र्रथाअनुसार ।

बारात आगमन एवं कंवरजी का तिलक :- देष, काल व समाज कि प्रथाअनुसार

कुंवारा माण्डा :- (1) वर पक्ष के यहां से पंणिडत जी व नेवगी के साथ, वधू पक्ष केेे यहां हीरमिच, प्याउड़ी, नाल, लाल एवं पीला कपडा़ तथा पाठा ( रंगा हुआ कागज ) भेजा जाता है । (2)वधू पक्ष के यहां थाम्बा रोप कर विवाह मंडप बन जाने के बाद वर पक्ष के पंणिडत जी सुहागन-पुडी़ और करी तथा चीनी लेकर आते है । (3)थाम्बा रोपण व कुंवारा माण्डा की पूजा के बाद ब्राहम्ण भेजन करवाया जाता है ।

कुवारा माण्डा व थाम्ब रोपण सामग्री:- रोली, मोली, पुष्प दूर्बा चावल 50 ग्राम रु9य मूंग 50 ग्राम पान 7, सुपारी 7 रु9य सरसों का तेल 50 ग्राम रु9य गुड. एक भेली (250 ग्राम) नाल 5 लाल वस्त्र 60 से.मी. रु9य बांस की छोटी डलिया 1 मिटटी का कलस 1 मिटटी का कोसासरार्इ 5 घंटी पीतल तांबे की 1 मूंज की रस्सी 250 ग्राम थाम्ब 1 सफेद कपड़ा 2.5 मी. बांस की केनसरकंडा 6 चाकू 1 मोटी सूर्इ 1 लाल रंग का धागा 1 रील वर पक्ष के यहां से आया हुआ सामान।

भात :- इस समारोह में भात भरने आये भाइ्र की अपनी बहिन (वरवधू की माता) को चुनड़ी उढाना ही विषेष महत्व रखता हैै। आवष्यक सामग्री:- पूजा की थाली, नारीयल गट मेवा व प्रथानुसार अन्य सामान भत्तर्इ (मामा) अपने भहनार्इ को तिलक करते हैं व साहजी को मिलनी देते हैं।

चाक पूजना एवं मूंग धोना:- कहीं-कहीं पुरानी प्रथानुसार यह भी नेग किया जाता है।

दात:- वधू पक्ष वाले विवाह मंडप के नीचे दात सजाके रखते हैं इसमें दो तील, सात तीलों के रुपये, पापड़, मंगोड़ी व ठोड-माठी होते हैं।

घरुआ:- वधू पक्ष के यहां उपर लिखेनुसार दात सजाकर गणगौर की पूजा की जाती है।

कोरथ:- वधू पक्ष वाले निम्नलिखित सामग्री लेकर वर पक्ष के यहां जाते हैं, वर के तिलक किया जाता है। लग्न पत्रिका रु9य पूजा की थाली रु9य रोली, मोली, चावल गुड़ भेली ग 250 ग्राम पुष्प, दुर्बा रु9य पान,सुपारी, लौंग, इलायची नारियल-1 रु9य कलष 1, सरार्इ 1 रु9य नीम की डाली 1 लडडू, चीनी रु9य ब्लाउज पीस 1 पुष्प हार 2 धौबी का लडडू 16 फेन्सी लिफाफे मूंग 1.250 कि.ग्रा. पित्री का सुहाल 16 तिलक का मिलनी का रु. अन्य आवष्यक सामग्री

द्वारचार एवं बारात स्वागत :- बारात वधू पक्ष के यहां पहूंचने पर तोरण एवं द्वारपूजा आदि का नेग होता हैै। वर-वधू तथा बारातियों के बैठने की सुन्दर व्यवस्था की जाती है। बारातियों का सुन्दर व षिष्ट ढंंग से स्वागत व सत्कार किया जाता है। स्वागत में सुगंधित पुष्पों की मालायें तथा गुलाब के ताजा फूलों के बटन आदि होते हैं। सत्कार में पेय, नाष्ता व ड्रार्इफ्रूटस इत्यादि होते हैं। इसी समय वर-वधू एक दूसरे को माला (विषेष आकर्षक ढंग से बनाये गये सुन्दर पुष्प हार) पहनाते हैं। इसे जयमाल भी कहते हैं।

सजन गोठ:- वधू पक्ष की ओर से वर पक्ष, बारातियों व अन्य सभी अतिथियों को स्वादिष्ट एवं सुरुचिपूर्ण भोजन कराया जाता है। इसी समय वर पक्ष के परिवार के सदस्य और उनके भत्तर्इ अपने-अपने कुल देवताओं व पितृों की पŸाल निकालते हैं व षुद्ध जल से अध्र्य देते हैं एवं वधू के लिए तथा गीत गाने वालियों की थाली भी करतें हैं। वधू पक्ष वाले मुख्य साहजी को साख जलेबी देते हैं।

लग्न (फेरा):- वर पक्ष के यहां से डाला आने के बाद वधू का श्रृंगार कर उसे लग्न मंडप में लाते हैं। इस अवसर पर वधू का सुन्दर श्रृंगार किया जाता है,फूलों का श्रृंगार भी किया जाता है। आवष्यक पूजन सामग्री व दोनों पक्षों के पीढियों की सूची भी चाहिए। वर वधू के बैठने के लिये सुन्दर सिंहासन की व्यवस्था की जाती है।

कन्यादान :- कन्यादान देने वाले (वधू के माता-पिता) को स्नान कर षुद्ध एवं सातिवक मन से कन्यादान का कार्य सम्पन्न करना चाहिए व कन्यादान के बाद ही भोजन ग्रहण करना चाहिए । इस अवसर पर 'युवान' (दामाद) 'ससुर' (कन्या के पिता) से कहता है - धर्म, अर्थ और काम-तीन पुरुषार्थों की सिद्धी के लिये विवाह रुप में, मैं आपकी कन्या का वरण करना चाहता हू, अत: आप अनुमति दें। इस पर कन्या का पिता कहता है धर्म, अर्थ, काम इन तीनों के बारे में जो भी करो, इस कनया को साथ लेकर करो। धर्म, अर्थ, काम के क्षेत्र में इसे न ठगने का वचन दो। 'धर्मे च अर्थे च कामे च एवं त्वया नाति चरित्वया' युवक तीन बार वचन देता है नातिचरामि, नातिचरामि, नातिचरामि। तब पिता अनुमोदन करता है, उपसिथत सगे- सम्बनिध और अन्य सज्जन अनुमोदन के साथ अभिनन्दन करते हैं। इसके बाद सप्तसदी आदि विधि होकर विवाह सम्पन्न होता है।

लग्न (फेरा) हेतु आवष्यक सामग्री :- पूजा की थाली 1 मिश्री 50 ग्राम रु9य बालू मिटटी 1 टिन रोली 20 ग्राम रु9य ऋतु फल सुपेली 1 पाटा 1 मोली (रक्षा सुत्र) रु9य केला, 1 दर्जन रु9य काठ का गुटकाखूंटी 4 चावल 250 ग्राम रु9य सेव या सन्तरा रु9य स्त्रुवा 1, लोढी 1 पान 25, सुपारी 25 पन्च मेवा 50 ग्राम रु9य बांस की हरी छड़ी सरकंडा 5 इलायची 10 ग्राम गरी गोला 1 आटा 50 ग्राम लौंग 10 ग्राम रु9य नारियल 1 पिसी हुर्इ हल्दी 25 ग्राम रुर्इ, माचिस मिटटी का कलस 1 रु9य पिसी हुर्इ मेहंदी 25 ग्राम देषी घी से युक्त दीपक 1 रु9य मिटटी की सरार्इ 25 केषर अगरबŸाी पैकेट 2 आम का पŸाा रु9य सिन्दूर प 5 ग्राम आम की डाली रु9य चावल भरा टोपिया 2 कपर्ूर 50 ग्राम रु9य दूर्बा घी भरा कासे का कटोरा 1 सफेद वस्त्र 1.25 मी. रु9य गाय का गोबर कासे की कटोरी 1 लाल वस्त्र 1.25 मी. रु9य मधू (षहद) 50 ग्राम रुपया, रेजगारी गेहू 250 ग्राम रु9य दही 50 ग्राम थैली 1 पीला सरसों 50 ग्राम रु9य गाय का कच्चा दूध पीढी का पन्ना पुष्प एवं पुष्प माला 5 रु9य गंगा जल पीला वस्त्र 1.25ग 5 मी. सर्वोषधी पुडि़या 1 तुलसी का पŸाा रु9य चणा दाल 2.25 किलो गुड़ 1 भेली 250 ग्राम रु9य देषी घी 500 ग्राम हल्दी गोटा 1.25 किलोलडडू 11 कच्चा सूत 50 ग्राम वर कन्या के वस्त्र बतासा 50 ग्राम धान का लावा धोती 1, तौलिया 1मिष्ढान्न जांट की पŸाी साड़ी 1, ब्लाउज पीस 1

पाणिग्रहण संस्कार:-कन्यादाम के पष्चात पति और पतिन हवन करते हैं और पति पतिन को लेकर होमागिन की परिक्रमा करता है। इस अवसर पर वह कुछ सुन्दर मंत्रोचारण भी करता है। हिन्दू षास्त्रों के अनुसार सप्तसदी के बाद एवं अगिन देवता के साक्षीत्व मे ही विवाह सम्पन्न होता है।इसके बाद हवन के कुछ और अंग पूरे कर लिये जाते हैं। अन्तेमं कार्य की समापित पर पति अपने दायें कर को वधू के सिर पर रखकर एकत्रितवबाल अतिथियों से विनय करते हुए कहता है कि उसने उनसे (......)ष्विवाह किया है अत: हम दोनों पर दषिअपात करें औरा उसे सौभाग्यवति रहने का आषिर्वाद दें। नव दम्पति को आषिर्वाद देकर अतिथिगण अपने- अपने घरों को चले जाते हैं।

पाणिग्रहण संस्कार के बाद कन्या अपने माता पिता के परिवार की सदस्या न रहकर पति के परिवार की सदस्या बन जाती है।

थापा पूजन:- पाणिग्रहण संस्कार के बाद सित्रयों द्वारा यह कार्य सम्पन्न कराया जाता है इसमें वर द्वारा कुछ ष्लोक बोले जाते हैं जिसके कुछ नेग भी दिये जाते हैं।इसी दौरान वर वधू परस्पर में कंगन की गांठ खोलते हैं। कंगन की गांठ खोलते समय इस बात का विषेष ध्यान रखा जाता है कि गांठ खुल जाये , टूटे नहीं वर वधू के कंगन की गांठ खोलता है ओर वधू वर के कंगन की गांइ खोलती है, इससे यह समझना चाहिये कि वर वधू के राग निवारण में और वधू वर के राग निवृŸाि में पूरा-पूरा सहयोग देने का प्रयास करेंगे। इस प्रथा का बाहय रुप तो अब भी प्रचलित है, पर इसके वास्तविक अर्थ पर ध्यान नहीं दिया जाता है।

सिरगूंथी:- वधू पक्ष की महिलाओं के सहयोग से वर पक्ष की महिलायें वधू के केषों का श्रृंगार करती हैं। महिलाओं की मिलनी भी होती है।

पहरावनी:- इस समय 'फेर पाटा' का नेग भी किया जाता है मुकलावा का नेग भी होता है। वर के तिलक किया जाता है दोनों पक्ष अपने-अपने जवाइयों के तिलक करते हैं। इसके बाद वर से विवाह मध्डप की डोरी खुलवाने का भटटी को पैर लगाने का नेग कराया जाता है।

विदार्इ एवं षिष्टाचार:- थली पूजन के बाद मांगलिक लोक-गीतों द्वारा विदार्इ समारोह सम्पन्न होता है।कन्या की प्रसन्नता के लिये उसके साथ तरह-तरह के उपहार भेजे जाते हैं। भगवान से प्रार्थना की जाती है कि विदा हुर्इ कन्या सकुषल अपने पति के घर पहूचे। यह भी षुभेच्छा प्रकट की जाती हैकि वहां वह गृह स्वामिनी बन कर रहे।अपने मृदु व्यवहार से वह ससुराल के समस्त गृहजनों का मन वषेमं कर ले। उसका प्रिय मनोरथ पूर्ण हो, वह गृहस्थ धर्म के पालन के प्रति सजग रहे।

आये हुए वर पक्ष के सदस्यों को सम्बोधित करते हुए कन्या पक्ष के प्रतिनिधि विद्वान पंडित जी कहते हैं कि यदि आपकी सेवा करने में हमारी कोर्इ त्रुटि रह गर्इ हो तो उसे क्षमा करेंगे यदि अनजान में आपको हमारी ओर से किसी ने कोर्इ अप्रिय बात कह दी हो तो उसे भी क्षमा करेंगे।

प्रत्युŸार में वर पक्ष के प्रतिनिधि विद्वान पंडितजी कन्या पक्ष को संबोधित करते हुए वर पक्ष की पूर्ण संतुषिट का जिक्र करते हुये उनके (कन्या पक्ष) द्वारा किये गये आतिथ्य सत्कार व व्यवस्था की भूरी-भूरी प्रषंषा करते हैं व धन्यवाद देते हैं।

समारोह के समापन में दोनों पक्ष के साहजी एक दूसरे को गले लगाकर मिलतें हैं।

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