Thursday, 29 May 2014

‘यदि भारत सांप्रदायिक हो गया और सेकुलर नहीं रहा तो जम्मू-कश्मीर उसका अंग नहीं रहेगा।’

‘यदि भारत सांप्रदायिक हो गया और सेकुलर नहीं रहा तो जम्मू-कश्मीर उसका अंग नहीं रहेगा।’

‘यदि भारत सांप्रदायिक हो गया और सेकुलर नहीं रहा तो जम्मू-कश्मीर उसका अंग नहीं रहेगा।’ यह बात केंद्रीय मंत्री फारूख अब्दुल्ला ने कही है। सवाल है इस बयान का क्या निहितार्थ है? क्या शेख अब्दुल्ला (फारूख अब्दुल्ला के पिता) के सन् 1931 में जम्मू-कश्मीर की राजनीति में अवतरण के बाद कश्मीर निरंतर सेकुलर होता गया या इस्लामी कट्टरवाद के केंद्र के रूप में उभरा?
कश्मीर घाटी हजारों वर्षों तक भारत की सनातन संस्कृति की प्रतीक रही हैं। संस्कृत अध्ययन, भगवान सूर्य पूजन, शिव भक्ति और बौद्ध मत का यह प्रमुख केंद्र रहा। चौदहवीं सदी में अंतिम हिंदू शासिका कोटारानी के आत्म बलिदान के बाद परशिया से आए मुस्लिम धर्मप्रचारक शाहमीर ने कश्मीर का राजकाज संभाला और यहीं से दारूल हरब को जबर्दस्ती व हिंसा के रास्ते दारूल इस्लाम में तब्दील करने का सिलसिला चल पड़ा, जो आज तक लगातार जारी है।
सन् 1823 में महाराजा रणजीत सिंह के द्वारा कश्मीर के अधिग्रहण के बाद वहां की मूल संस्कृति के लोगों में सुरक्षा भाव उत्पन्न हुआ। अंग्रेजों की पंजाब विजय के बाद सन् 1846 में महाराजा गुलाब सिंह सिंहासनारुढ़ हुए। इसी डोगरा वंश के महाराजा हरि सिंह (डॉ. कर्ण सिंह के स्वर्गीय पिता) सन् 1925 में सत्तारुढ़ हुए। सन् 1931 में शेख अब्दुल्ला का उदय हुआ। तब तक जम्मू-कश्मीर कश्मीरियत और सांप्रदायिक सौहार्द्र का उदाहरण था। शेख की शिक्षा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (अमुवि) में हुई थी। वह अमुवि के उस वातावरण से निकले थे, जो अलगाववाद और सांप्रदायिकता से विषाक्त था और जिस ने अंततोगत्वा पाकिस्तान का निर्माण कराया। उनके सार्वजनिक जीवन में आने के बाद कश्मीर का सांप्रदायिक वातावरण भी विषाक्त होना शुरू हुआ। उसी का परिणाम था कि जब 22 अक्टूबर, 1947 को पाकिस्तानी सेना ने कबीलाइयों के रूप में कश्मीर पर आक्रमण किया तो रियासती सेना का बड़ा भाग मजहबी कारणों से प्रेरित होकर अपने राज्य के साथ गद्दारी करते हुए दुश्मनों से जा मिला।
शेरे कश्मीर कहे जाने वाले शेख अब्दुल्ला वास्तव में कितने बहादुर थे? हकीकत में वे अपनी करतूतों के कारण जेल में रहे थे। उन्होंने 26 सितंबर, 1947 को महाराजा हरि सिंह को लिखे पत्र में माफी मांग महाराजा पर अपनी व पार्टी की निष्ठा प्रकट करते हुए लिखा था कि कश्मीर के प्रशासन को दुनिया में अनुकरणीय बनाने के लिए वह अपना समर्पित सहयोग देने के लिए हमेशा महाराजा के साथ हैं। बार-बार शेख ने महाराजा व उनके वंश के प्रति स्वामीभक्ति की लिखित में कसमें खाईं। परंतु जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय होते ही इसी शेख ने नेहरू से मिलकर देशभक्त महाराजा हरि सिंह को उनकी रियासत से बेदखल कर मुंबई जाकर रहने के लिए विवश कर दिया, जहां अपनी जन्मभूमि से दूर 26 अप्रैल, 1961 को उनकी मृत्यु हो गई। यह घटनाक्रम शेख के दोहरे चरित्र को रेखांकित करता है।
सवाल यह भी है कि जम्मू-कश्मीर में एक सच्चे सेकुलर राजतंत्र की स्थापना के लिए स्वयं अब्दुल्ला परिवार, जिनकी तीन पीढ़ियों ने आठ बार मुख्यमंत्री का पदभार संभाला, ने क्या किया? ना केवल अब्दुल्ला परिवार के व्यवहार और जीवन में सेकुलरवाद के लिए कोई स्थान नहीं है, बल्कि उन्हें इस शब्द मात्र से ही चिढ़ है।
आपातकाल के बर्बर दमन चक्र के बाद इंदिरा गांधी ने अपनी छवि दुरुस्त करने के लिए सन् 1976 में 42वां संविधान संशोधन विधेयक पारित कराया। इस संशोधन के द्वारा उन्होंने भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ‘‘सेकुलर’’ शब्द का समावेश कराया। यह भ्रांति पैदा करने की क्या आवश्यकता थी? क्या देश क्या सन् 1947 से 1976 तक ‘सेकुलर’ नहीं था? क्या यहां इस्लामी मुल्कों की तरह ईशनिंदा कानून अस्तित्व में था, जिसके अंतर्गत दूसरे मतावलंबियों को प्रताड़ित किया जाता है?
तब जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री शेख मोहम्मद अब्दुल्ला थे। उन्हें 75 सदस्यों वाली विधान सभा में 54 कांग्रेसी सदस्यों का समर्थन प्राप्त था। स्पष्ट है कि दो-तिहाई बहुमत होने के कारण वह आसानी से केंद्र सरकार द्वारा पारित 42वें संविधान संशोधन को स्वीकार करते हुए जम्मू-कश्मीर के संविधान में ‘सेकुलर’ शब्द जोड़ सकते थे। किंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। हां, इस बहुमत का लाभ उठाते हुए जरूर उन्होंने जम्मू-कश्मीर विधान सभा के पांच साल के कार्यकाल को बढ़ाकर छह साल का कर दिया।
सन् 1977 में शेख अब्दुल्ला फिर मुख्यमंत्री बने। उन्होंने इस बार भी राज्य को सेकुलर घोषित करने का प्रयास नहीं किया। 8 सितंबर, 1982 को उनकी मृत्यु हुई। फारूख अब्दुल्ला पहली बार मुख्यमंत्री बने। जून, 1983 में फारूख दुबारा मुख्यमंत्री बने। 1987 और 1996 में वे तीसरी और चौथी बार जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बने। चार बार के कार्यकाल के बावजूद फारूख अब्दुल्ला ने प्रदेश के संविधान में ‘सेकुलर’ शब्द जोड़ना तो दूर, कभी सेकुलरवाद की चर्चा तक नहीं की। 9 जनवरी, 2009 के बाद से फारूख अब्दुल्ला के पुत्र उमर अब्दुला राज्य के मुख्यमंत्री हैं, किंतु पिछले पांच सालों में उन्होंने संविधान में सेकुलर शब्द शामिल करने का प्रयास नहीं किया है। भला क्यों?
धारा 370 के कारण जम्मू-कश्मीर में देश के अन्य राज्यों के विपरीत अपना अलग संविधान है। पैंथर्स पार्टी द्वारा राज्य के संविधान में ‘सेकुलर’ शब्द जोड़ने के लिए विधानसभा में दो बार प्रस्ताव रखा भी गया, किंतु आजादी के 67 साल गुजर जाने के बावजूद जम्मू-कश्मीर का संविधान सेकुलर नहीं है। 29 मार्च, 2006 को पैंथर्स पार्टी द्वारा रखे गए प्रस्ताव को 9 फरवरी, 2007 को सेलेक्ट कमिटी के पास भेजा गया। 25 मई, 2007 को समिति के अध्यक्ष, तत्कालीन कानून व संसदीय मामलों के मंत्री प्रेम सागर अजीज ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी। रिपोर्ट में उन्होंने लिखा है, ‘‘मैं यह समझ पाने में विफल हूं कि जम्मू-कश्मीर को ‘सेकुलर राज्य’ बनाने के लिए संविधान में इस शब्द को जोड़ने से सरकार हिचकिचा क्यों रही है?’’ सन् 2011 में भी ऐसा प्रस्ताव रखा गया, किंतु इसे बहस के लिए सूचीबद्ध ही नहीं किया गया। क्यों? नरेंद्र मोदी को इतिहास की जानकारी नहीं होने का दावा करने वाले उमर अब्दुल्ला इसका क्या जवाब देंगे?
भारत में प्रचलित सेकुलरवाद की विकृतियों का जम्मू-कश्मीर एक ज्वलंत उदाहरण है। देश के रक्तंरजित विभाजन के दौरान करीब दो लाख हिंदू और सिख पलायन कर जम्मू में आकर बस गए थे, वे आज भी राज्य की नागरिकता से वंचित हैं। ये लोग लोकसभा के लिए तो मतदाता हैं, किंतु इन्हें जम्मू-कश्मीर विधान सभा के लिए मताधिकार प्राप्त नहीं है। ये वहां सपत्ति नहीं खरीद सकते। सरकारी नौकरियों से उन्हें वंचित रखा गया है, उन्हें तकनीकी और पेशेवर उच्च शिक्षा पाने का अधिकार नहीं है। जबकि 1947 में जो मुसलमान पाकिस्तान चले गए थे और जिन्होंने पूरी तरह पाकिस्तान की नागरिकता प्राप्त कर ली है, उन्हें दोबारा जम्मू बुला कर नागरिकता सौंपने के लिए सेकुलरिस्ट दुबले हुए जाते हैं।
सन् 1952 में कम्युनिस्ट चीनी शासकों से प्रताड़ित और शिनजियांग से खदेड़े गए उघेर मुसलमानों को शेख अब्दुल्ला ने श्रीनगर के ईदगाह क्षेत्र में पनाह दी थी। उनके बाद आई बख्शी गुलाम मोहम्मद की सरकार ने भी तिब्बती मुसलमानों को पूर्ण अधिकार के साथ इस क्षेत्र में बसने की अनुमति दी। आज केंद्र और राज्य सरकार कश्मीरी मूल के पाकिस्तानी आतंकवादियों को परिवार समेत कश्मीर लौटने के लिए लाल कालीन बिछाए बैठी है। एक आतंकी को संपूर्ण अधिकार के साथ नागरिकता देना और दूसरी ओर कश्मीर की मूल संस्कृति के वाहक, कश्मीरी पंडितों को पलायन के लिए मजबूर कर देना ही क्या सेकुलरवाद है?
1989 में घाटी में करीब चार लाख कश्मीरी पंडित थे। इस्लामी जिहादियों के उत्पीड़न के कारण घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ और अब वहां केवल चार हजार कश्मीरी पंडित ही शेष रह गए हैं। क्या ऐसा उदाहरण दुनिया के किसी दूसरे देश में मिल सकता है, जहां अपने ही देश के एक भाग में वहां के बहुसंख्यक दो दशक से भी कम समय में नगण्य हो गए हों? फारुख अब्दुल्ला सेकुलरवाद का उपदेश दे रहे हैं, उनके मुख्यमंत्री रहते कश्मीरी पंडितों को खदेड़ भगाया गया? घाटी की मस्जिदों से ‘निजामे मुस्तफा’ के नारे लगाने वालों ने बर्बरतापूर्वक कश्मीरी पंडितों की हत्या की। इन इस्लामी कट्टरपंथियों ने ‘एक को मारो, हजार को आतंकित करो’ की नीति पर कश्मीरी पंडितों का बलात पलायन कराया। फारूख अब्दुल्ला के कार्यकाल में 31 मंदिर ध्वस्त किए गए। क्या यही अब्दुल्ला परिवार का सेकुलरवाद है?
आज फारूख अब्दुल्ला मोदी को वोट देने वालों को समुद्र में फेंकने की बात कर रहे हैं तो इसमें भी आश्चर्य की बात नहीं है। वे वही कह रहे हैं, जो उनके पिता कहा करते थे। कश्मीर में शेखशाही का सपना देखने वाले शेख अब्दुल्ला ने अपनी आत्मकथा, ‘आतिशे चिनार’ में कश्मीरी पंडितों को दिल्ली सरकार का जासूस कहा है। अगस्त, 1953 में सत्ता खोने से पूर्व शेख अवसर के अनुसार दिल्ली में सेकुलरवाद की जुगाली करते थे, किंतु जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस का अलग राजनीतिक वजूद स्थापित होते ही शेख ने कांग्रेस के खिलाफ फतवा जारी किया। उन्होंने कांग्रेस को काफिरों की संस्था बताते हुए इसके मुस्लिम सदस्यों के ‘नमाजे जनाजा’ में शामिल होने को कुफ्र बताया। आज फारूख अब्दुल्ला भाजपा के पक्ष में वोट देने वालों के लिए ऐसे ही जुमलों को दुहरा रहे हैं तो आश्चर्य कैसा? (लेखक भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)

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