Monday, 14 April 2014

'बैसाखी' के दिन मिला था बुद्ध को ज्ञान !

'बैसाखी' के दिन मिला था बुद्ध को ज्ञान !


अप्रैल, 1875 में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की और मूर्ति पूजा के बजाय वेदों को अपना मार्गदर्शक माना। संयोगवश तब यह दिन बैसाखी के शुभ अवसर पर ही था।

बौद्ध धर्म के कुछ अनुयायी मानते हैं कि महात्मा बुद्ध को इसी दिन दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। अत: यह दिन उनके लिए भी विशेष महत्व रखता है।

कृषि से जुड़े इस पर्व को असम में 'बिहू', केरल में 'विशु' तथा तमिलनाडु में 'पुथांदू' कहा जाता है।

जहां लोग इस पर्व को पारंपरिक श्रद्धा एवं हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं, वहीं वे जलियांवाला बाग कांड में शहीद हुए लोगों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना भी नहीं भूलते। बैसाखी के दिन 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के समीप हजारों लोग जलियांवाला बाग में अंग्रेजी शासन के रोलेट एक्ट के विरोध में एकत्र हुए थे। यहां जनरल डायर ने निहत्थी भीड़ पर गोलियां चलवाईं, जिसमें करीब 1000 लोग मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए थे। फसलों के जरिये खुशहाली और समृद्धि लाने वाले पर्व बैसाखी के ही दिन खालसा पंथ की भी स्थापना हुई थी।

घर में खुशहाली और समृद्धि आए, तो किसका मन नाचने-गाने को, उत्सव मनाने को नहीं करेगा। बैसाखी ऐसा ही पर्व है। यह फसल के तैयार होने की प्रसन्नता और उल्लास में मनाया जाता है। गेहूं, दलहन, तिलहन और गन्ने की रबी फसल किसानों को प्राप्त होती है। फसल ही किसानों के जीवन में समृद्धि लाती है, इसलिए किसान अपनी उमंग और उत्साह को रोक नहीं पाते और नाचने-गाने और उत्सव मनाने लगते हैं।

बैसाखी समृद्धि का उत्सव है। इस दिन किसान पकी हुई फसल को अग्नि को अर्पित करने के बाद इसका कुछ भाग प्रसाद के रूप में लोगों में बांट देते हैं। पंजाब में कृषि प्रमुखता से होती है इसलिए बैसाखी पर्व पंजाब के लिए बड़ा ही महत्वपूर्ण त्योहार है। इस अवसर पर पंजाब के लोग लोकसंगीत, लोकगीत, लोकनाट्य प्रस्तुत कर इसे और मोहक बना देते हैं।

खालसा का स्थापना पर्व : 13 अप्रैल, 1699 को सिखों के दसवें गुरु गोविंद राय जी ने आनंदपुर साहिब के श्रीकेसगढ़ साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की थी। 'खालसा' का अर्थ है 'खालिस' (शुद्ध) और इस पंथ के माध्यम से गुरु जी ने जात-पात से ऊपर उठ कर समानता, एकता, राष्ट्रीयता, बलिदान एवं त्याग का उपदेश दिया। श्रीआनंदपुर साहिब में बैसाखी के दिन गुरबाणी का पाठ हो रहा था। तभी गुरु गोविंद राय ने उठकर सिखों से धर्म और मानवता की रक्षा के लिए पांच शीश मांगे -'कौन मुझे अपना सिर भेंट करने के लिए तैयार है?' कुछ लोग वहां से खिसकने का मौका तलाशने लगे, लेकिन उनमें से दया राम, धरम दास, मोहकम चंद, हिम्मत राय और साहिब चंद सिर देने को प्रस्तुत हो गए। गुरु जी ने पांचों को सुंदर पोशाकें व कृपाण धारण करवा कर उन्हें 'पंज प्यारे' नाम दे दिया। तब गुरु जी ने 'पंच ककार' (केस, कंघा, कड़ा, कच्छ एवं कृपाण) धारण करने का विधान बनाया। पंज प्यारों को 'सिंह' उपनाम दिया गया। दसवें गुरु इसके बाद गोविंद राय से गोविंद सिंह बन गए। इतिहासकारों के अनुसार, उस दिन हजारों लोग ऊंच-नीच, जाति-पाति व भेदभाव त्यागकर 'खालसा' अर्थात शुद्ध बन गए। गुरु गोविंद सिंह जी ने दबे-कुचले लोगों को एकत्र कर 'खालसा' का सृजन कर ऐसी शक्तिशाली सेना तैयार की, जिसने अपने समय की सबसे बड़ी सैन्य शक्तियों को परास्त किया।

नव सौर वर्ष भी है बैसाखी : बैसाखी के दिन मेष संक्रांति के कारण स्नान-दान का तो विशेष महत्व रहता ही है, साथ ही इस दिन सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने के कारण इसे नए सौर वर्ष की शुरुआत भी माना जाता है।

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