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Friday, 4 April 2014

जब हॉकी के जादूगर ने नंगे पांव हिटलर के देश को हराया


आज पूरे देश में सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न मिलने के बाद बहस हो रही है कि हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को यह सम्मान क्यों नहीं. क्या ध्यानचंद के वक्त इतना मीडिया होता, टीवी युग होता, तो यह अनदेखी मुमकिन थी? क्या था ध्यानचंद का जादू और उनका करियर? क्यों हिटलर उन्हें अपनी सेना में कर्नल बनाना चाहता था? ब्रिटेन उनसे हारने के बाद अपनी टीम को ओलंपिक में ही नहीं भेजता था और क्यों पचास की उम्र के बाद भी ध्यानचंद को न चाहते हुए भी खेलना पड़ा और आखिर में कैसे वह एम्स में कमोबेश गुमनामी की हालत में मरे... ये सब हुआ 1926 से 1947 के दौर में. 21 बरस. जी सचिन के 24 तो ध्यानचंद के 21 बरस. सचिन के कुल जमा 15921 रन तो ध्यानचंद के 1076 गोल.


ध्यानचंद ने किया कर्नल से वादा, आगे किसी से नहीं हारेंगे


पहली बार 1928 में भारतीय हॉकी टीम ओलंपिक में हिस्सा लेने ब्रिटेन पहुंचती है और 10 मार्च 1928 को एमस्‍टर्डम में फोल्कस्टोन फेस्टिवल. ओलंपिक से ठीक पहले फोल्कस्टोन फेस्टिवल में जिस ब्रिटिश साम्राज्य में सूरज डूबता नहीं था उस देश की राष्ट्रीय टीम के खिलाफ भारत की हॉकी टीम मैदान में उतरती है. और भारत ब्रिटेन की राष्ट्रीय हॉकी टीम को इस तरह पराजित करता है कि अपने ही गुलाम देश से हार की कसमसाहट ऐसी होती है कि ओलंपिक में ब्रिटेन खेलने से इनकार कर देता है. हर किसी का ध्यान ध्यानचंद पर जाता है, जो महज 16 बरस में सेना में शामिल होने के बाद रेजिमेंट और फिर भारतीय सेना की हॉकी टीम में चुना जाता है और सिर्फ 21 बरस की उम्र में यानी 1926 में न्यूजीलैड जाने वाली टीम में शरीक होता है, और जब हॉकी टीम न्यूजीलैड से लौटती है तो ब्रिटिश सैनिक अधिकारी ध्यानचंद का ओहदा बढ़ाते हुये उसे लांस-नायक बना देते हैं क्योंकि न्यूजीलैंड में ध्यानचंद की स्टिक कुछ ऐसी चलती है कि भारत 21 में से 18 मैच जीतता है. 2 मैच ड्रा होते हैं और एक में हार मिलती है. हॉकी टीम के भारत लौटने पर जब कर्नल जॉर्ज ध्यानचंद से पूछते हैं कि भारत की टीम एक मैच क्यों हार गयी तो ध्यानचंद का जबाब होता है कि उन्हें लगा कि उनके पीछे बाकी 10 खिलाड़ी भी हैं. अगला सवाल, तो आगे क्या होगा. जवाब आता है कि किसी से हारेंगे नहीं. इस प्रदर्शन और जवाब के बाद ध्यानचंद लांस नायक बना दिए गए.


हिटलर के सामने क्या करेगा भारत का ध्यानचंद


तो बर्लिन ओलंपिक एक ऐसे जादूगर का इंतजार कर रहा है, जिसने सिर्फ 21 बरस में दिये गये वादे को ना सिर्फ निभाया बल्कि मैदान में जब भी उतरा अपनी टीम को हारने नहीं दिया. चाहे एमस्टर्डम में 1928 का ओलंपिक हो या सैन फ्रांसिस्को में 1932 का ओलंपिक. और अब 1936 में क्या होगा जब हिटलर के सामने भारत खेलेगा. क्या जर्मनी की टीम के सामने हिटलर की मौजूदगी में ध्यानचंद की जादूगरी चलेगी? जैसे-जैसे बर्लिन ओलंपिक की तारीख करीब आ रही है वैसे-वैसे जर्मनी के अखबारो में ध्यानचंद के किस्से किसी सितारे की तरह यह कहकर चमकने लगे हैं कि ‘चांद’ का खेल देखने के लिए पूरा जर्मनी बेताब है क्योंकि हर किसी को याद आ रहा है 1928 का ओलंपिक. ऑस्ट्रिया को 6-0, बेल्जियम को 9-0, डेनमार्क को 5-0, स्वीटजरलैंड को 6-0 और नीदरलैंड को 3-0 से हराकर भारत ने गोल्ड मेडल जीता तो समूची ब्रिटिश मीडिया ने लिखा कि यह हॉकी का खेल नहीं जादू था और ध्यानचंद यकीनन हॉकी के जादूगर हैं. लेकिन बर्लिन ओलंपिक का इंतजार कर रहे हिटलर की नज़र 1928 के ओलंपिक से पहले प्रि ओलपिंक में डच, बेल्जियम के साथ जर्मनी की हार पर थी. और जर्मनी के अखबार 1936 में लगातार यह छाप रहे थे जिस ध्यानचंद ने कभी भी जर्मनी टीम को मैदान पर बख्शा नहीं चाहे वह 1928 का ओलंपिक हो या 1932 का तो फिर 1936 में क्या होगा. क्योंकि हिटलर तो जीतने का नाम है. तो क्या बर्लिन ओलंपिक पहली बार हिटलर की मौजूदगी में जर्मनी की हार का तमगा ठोकेगा? और इधर मुंबई में बर्लिन जाने के लिये तैयार हुई भारतीय टीम में भी हिटलर को लेकर किस्से चल पड़े थे. पत्रकार टीम के मैनेजर पंकज गुप्ता और कप्तान ध्यानचंद से लेकर लगातार सवाल कर रहे थे इस खास मुकाबले के बारे में.


ध्यानचंद के स्वागत को 24 घंटे के लिए रोक दिया गया जहाजों का ट्रैफिक


1928 में जब ओलपिंक में गोल्ड लेकर भारतीय हॉकी टीम बंबई हारबर पहुंची थी तो पेशावर से लेकर केरल तक से लोग विजेता टीम के एक दर्शन करने और ध्यानचंद को देखने भर के लिये पहुंचे थे. उस दिन बंबई के डाकयार्ड पर मालवाहक जहाजों को समुद्र में ही रोक दिया गया था. जहाजों की आवाजाही भी 24 घंटे नहीं हो पायी थी क्योंकि ध्यानचंद की एक झलक के लिये हजारों हजार लोग बंबई हारबर में जुटे और ओलंपिक खेल लौटे ध्यानचंद का तबादला 1928 में नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस वजीरिस्तान [फिलहाल पाकिस्तान] में कर दिया गया, जहां हाकी खेलना मुश्किल था. पहाड़ी इलाका था. मैदान था नहीं. लेकिन ओलंपिक में सबसे ज्यादा गोल [5 मैच में 14 गोल] करने वाले ध्यानचंद का नाम 1932 में सबसे पहले ओलंपिक टीम के खिलाडियों में यह कहकर लिखा गया कि सेंट फ्रांसिस्को ओलंपिक से पहले प्रैक्टिस मैच के लिये टीम को सिलोन यानी मौजूदा वक्त में श्रीलंका भेज दिया जाए. दो प्रैक्टिस मैच में भारत की ओलंपिक टीम ने सिलोन को 20-0 और 10-0 से हराया. ध्यानचंद ने अकेले डेढ दर्जन गोल ठोंके और उसके बाद 30 जुलाई 1932 में शुरू होने वाले लॉस एंजेलिस ओलंपिक के लिये भारत की टीम 30 मई को मुंबई से रवाना हुई.


फाइनल में अमेरिका के खिलाफ दो दर्जन गोल हुए 


लगातार 17 दिन के सफर के बाद 4 अगस्त 1932 को अपने पहले मैच में भारत की टीम ने जापान को 11-1 से हराया. ध्यानचंद ने 3 गोल किए. फाइनल में मेजबान देश अमेरिका से भारत का सामना था और माना जा रहा था कि मेजबान देश को मैच में अपने दर्शकों का लाभ मिलेगा. लेकिन फाइनल में भारत ने अमेरिकी टीम के खिलाफ दो दर्जन गोल ठोंके. जी हां, भारत ने अमेरिका को 24-1 से हराया. इस मैच में ध्यानचंद ने 8 गोल किए. लेकिन पहली बार ध्यानचंद को गोल ठोंकने में अपने भाई रूप सिंह से यहां मात मिली क्योंकि रूप ने 10 गोल ठोंके. लेकिन 1936 में तो बर्लिन ओलंपिक को लेकर जर्मनी के अखबारों में यही सवाल बड़ा था कि जर्मनी मेजबानी करते हुए भारत से हार जाएगा या फिर बुरी तरह हारेगा और ध्यानचंद का जादू चल गया तो क्या होगा. क्योंकि 1932 के ओलंपिक में भारत ने कुल 35 गोल ठोंके थे और खाए महज 2 गोल थे. और तो और ध्यान चंद और उनके भाई रूपचंद ने 35 में से 25 गोल ठोंके थे. तो बर्लिन ओलंपिक का वक्त जैसे जैसे नजदीक आ रहा था, वैसे वैसे जर्मनी में ध्यानचंद को लेकर जितने सवाल लगातार अखबारों की सुर्खियों में चल रहे थे उसमें पहली बार लग कुछ ऐसा रहा था जैसे हिटलर के खिलाफ भारत को खेलना है और जर्मनी हार देखने को तैयार नहीं है. लेकिन ध्यानचंद के हॉकी को जादू के तौर पर लगातार देखा जा रहा था और 1932 के ओलंपिक के बाद और 1936 के बर्लिन ओलंपिक से पहले यानी इन चार बरस के दौरान भारत ने 37 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले जिसमें 34 भारत ने जीते, 2 ड्रा हुये और 2 रद्द हो गये. यानी भारत एक मैच भी नहीं हारा. इस दौर में भारत ने 338 गोल किये जिसमें अकेले ध्यानचंद ने 133 गोल किए. बर्लिन ओलंपिक से पहले ध्यानचंद के हॉकी के सफर का लेखा-जोखा कुछ इस तरह जर्मनी में छाने लगा कि हिटलर की तानाशाही भी ध्यानचंद की जादूगरी में छुप गई.


पहले ही प्रैक्टिस मैच में दी जर्मनी को पटखनी


बर्लिन ओलंपिक की शान ही यही थी कि किसी मेले की तरह ओलंपिक की तैयारी जर्मनी ने की थी. ओलंपिक ग्राउंड में ही मनोरंजन के साधन भी थे और दर्शकों की आवाजाही भी जबरदस्त थी. ओलपिंक शुरू होने से 13 दिन पहले 17 जुलाई 1936 को जर्मनी के साथ प्रैक्टिस मैच भारत को खेलना था. 17 दिन के सफर के बाद पहुंची टीम थकी हुई थी. बावजूद इसके भारत ने जर्मनी को 4-1 से हराया और उसके बाद ओलंपिक में बिना गोल खाए हर देश को बिलकुल रौंदते हुए भारत आगे बढ़ रहा था और जर्मनी के अखबारों में छप रहा था कि हॉकी नहीं जादू देखने पहुंचें. क्योंकि हॉकी का जादूगर ध्यानचंद पूरी तरह एक्टिव है. भारत ने पहले मैच में हंगरी को 4-0, फिर अमेरिका को 7-0, जापान को 9-0, सेमीफाइनल में फ्रांस को 10-0 से हराया और बिना गोल खाए हर किसी को हराकर फाइनल में पहुंचा. यहां सामने थी हिटलर की टीम यानी जर्मनी की टीम. फाइनल का दिन था 15 अगस्त 1936.


भारतीय टीम ने खाई तिरंगे की कसम, नहीं डरेंगे हिटलर से


भारतीय टीम में खलबली थी कि फाइनल देखने एडोल्फ हिटलर भी आ रहे थे और मैदान में हिटलर की मौजूदगी से ही भारतीय टीम सहमी हुई थी. ड्रेसिंग रूम में सहमी टीम के सामने टीम के मैनेजर पंकज गुप्ता ने गुलाम भारत में आजादी का संघर्ष करते कांग्रेस के तिरंगे को अपने बैग से निकाला और ध्यानचंद समेत हर खिलाड़ी को उस वक्त तिंरगे की कसम खिलाई कि हिटलर की मौजूदगी में घबराना नहीं है. यह कल्पना के परे था. लेकिन सच था कि आजादी से पहले जिस भारत को अंग्रेजों से मु्क्ति के बाद राष्ट्रीय ध्वज तो दूर संघर्ष के किसी प्रतीक की जानकरी पूरी दुनिया को नहीं थी और संघर्ष देश के बाहर गया नहीं था, उस वक्त भारतीय हॉकी टीम ने तिरंगे को दिल में लहराया और जर्मनी की टीम के खिलाफ मैदान में उतरी. हिटलर स्टेडियम में ही मौजूद था.


हाफ टाइम के बाद ध्यानचंद ने उतारे जूते


टीम ने खेलना शुरू किया और गोलों का सिलसिला भी फौरन शुरू हो गया. हाफ टाइम तक भारत 2 गोल ठोंक चुका था. 14 अगस्त को बारिश हुई थी तो मैदान गीला था और बिना स्पाइक वाले रबड़ के जूते लगातार फिसल रहे थे. ध्यानचंद ने हाफ टाइम के बाद जूते उतार कर नंगे पांव ही खेलना शुरू किया. जर्मनी को हारता देख हिटलर मैदान छोड़ जा चुका था. उधर नंगे पांव खेलते ध्यानचंद ने हाफ टाइम के बाद गोल दागने की रफ्तार बढ़ा दी थी. इस मैच में भारत ने 8-1 से जर्मनी को हराया.


रात भर सो नहीं पाए ध्यानचंद हिटलर को मिलने के ख्याल से 


फाइनल के अगले दिन यानी 16 अगस्त को ऐलान हुआ कि विजेता भारतीय टीम को मेडल पहनाएंगे हिटलर. इस खबर को सुनकर ध्यानचंद रात भर नहीं सो पाए. भारत में जैसे ही ये खबर पहुंची यहां के अखबार हिटलर के अजीबोगरीब फैसलों के बारे में छाप कर आशंका का इंतजार करने लगे. बहरहाल, अगले दिन हिटलर आए और उन्होंने ध्यानचंद की पीठ ठोंकी. उनकी नजर ध्यानचंद के अंगूठे के पास फटे जूतों पर टिक गई. ध्यानचंद से सवाल जवाब शुरू हुआ. जब हिटलर को पता चला कि ध्यानचंद ब्रिटिश इंडियन आर्मी की पंजाब रेजिमेंट में लांस नायक जैसे छोटे ओहदे पर है, तो उसने ऑफर किया कि जर्मनी में रुक जाओ, सेना में कर्नल बना दूंगा. ध्यानचंद ने कहा, नहीं पंजाब रेजिमेंट पर मुझे गर्व है और भारत ही मेरा देश है. हिटलर ध्यानचंद को मेडल पहनाकर स्टेडियम से चले गए. ध्यानचंद की सांस में सांस आई.


देश के दबाव में खेलते रहे पचास के पार तक


बर्लिन से जब हाकी टीम लौटी तो ध्यानचंद को देखने और छूने के लिये पूरे देश में जुनून सा था. रेजिमेंट में भी ध्यानचंद जीवित किस्सा बन गए. उन्हें 1937 में लेफ्टिनेंट का दर्जा दिया गया. सेना में वह लगातार काम करते रहे और जब 1945 में दूसरा विश्व युद्ध खत्म हुआ, तो ध्यानचंद की उम्र हो चुकी थी 40 साल. उन्होंने कहा कि अब नए लड़कों को आगे आना चाहिए और मुझे रिटायरमेंट लेना चाहिए. मगर देश का उन पर ऐसा न करने का दबाव था. और 1926 में अपने कर्नल से कभी न हारने का जो वादा उन्होंने किया था, उसे 1947 तक बेधड़क निभाते रहे.
51 बरस की उम्र में 1956 में आखिरकार ध्यानचंद रिटायर हुये तो सरकार ने पद्मविभूषण से उन्हें सम्मानित किया और रिटायरमेंट के महज 23 बरस बाद ही यह देश ध्यानचंद को भूल गया. इलाज की तंगी से जूझते ध्यानचंद की मौत 3 दिसबंर 1979 को दिल्ली के एम्स में हुई. उनकी मौत पर देश या सरकार नहीं बल्कि पंजाब रेजिमेंट के जवान निकल कर आए, जिसमें काम करते हुये ध्यानचंद ने उम्र गुजार दी थी और उस वक्त हिटलर के सामने पंजाब रेजिमेंट पर गर्व किया था जब हिटलर के सामने समूचा विश्व कुछ बोलने की ताकत नहीं रखता था. पंजाब रेजिमेंट ने सेना के सम्मान के साथ ध्यानचंद को आखिरी विदाई थी.
मौका मिले तो झांसी में ध्यानचंद की उस आखिरी जमीन पर जरूर जाइएगा, जहां टीवी युग में मीडिया नहीं पहुंचा है. वहां अब भी दूर से ही हॉकी स्टिक के साथ ध्यानचंद दिख जाएंगे. और जैसे ही ध्यानचंद की वह मूर्ति दिखायी दे तो सोचिएगा कि अगर ध्यानचंद के वक्त टीवी युग होता और हमने ध्यानचंद को खेलते हुये देखा होता तो ध्यानचंद आज कहां होते. लेकिन हमने तो ध्यानचंद को खेलते हुए देखा ही नहीं.
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सादगी पसंद थे दद्दा


1 comment:

  1. Major Dhyan Chand was the first sportsperson of Bharat to take oath on the Tricolour under British Raj.
    Bharat is celebrating national Sports Day today to commemorate the birth of its first sporting genius, Major Dhyan Chand (Born 29 August 1905). Known as ‘Wizard of Hockey,’ Dhyan Chand scored a whopping 1000 goals in a career spanning two decades. In international games, his tally stands at a staggering 400 goals. He helped Bharat win three Olympic GOLD medals including the first in 1928.
    His sublime skills with hockey stick earned him a ridiculously large number of fans across the globe; and the list included the likes of Bradman and Adolf Hitler.
    The now-famous meeting between Dhyan Chand and Hitler took place after the Olympic final of Berlin Olympics in 1936, where Bharat, led by Dhyan Chand, demolished hosts Germany 8-1, in the process winning their third successive GOLD at the Olympics.
    Born on August 29, 1905, Major Dhayn Chand is regarded as the greatest player of hockey the world has seen till date.He died on 3 december 1979

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