Sunday, 30 March 2014

होलिकोत्सव मनाने के सम्बन्थ में प्रचलित मत

बसन्तपञ्चमी के आते ही प्रकृति में एक नवीन परिवर्तन आने लगता है । दिन छोटे हो जाते हैं । जाड़ा कम होने लगता है। उधर पतझड़ शुरू हो जाता है । माघ की पूर्णिमा पर होली का डंडा रोप दिया जाता है [कुछ लोग होलाष्टक प्रारम्भ होने पर शाखा रोपते हैं]। होली के पर्व के स्वागत हेतु आम्रमञ्जरियों पर भ्रमरावलियां मँडराने लगती हैं ।

भविष्यपुराण के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन सब लोगों को अभयदान देना चाहिये, जिससे सम्पूर्ण प्रजा उल्लासपूर्वक हँसे । बालक गाँव के बाहर से लकडी-कंडे लाकर ढेर लगायें। उसमें होलिका का पूर्ण सामग्री सहित विधिवत् पूजन करें। फिर उसमें होलिका-दहन करें । पूजा के समय यह मंत्र पढ़ा जाता है-

असृक्याभयसंत्रस्तै: कृता त्वं होलि बालिशै: ।
अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव ॥

मान्यता है कि ऐसा करने से सारे अनिष्ट दूर हो जाते हैं ।

इस पर्व को नवान्नेष्टि यज्ञपर्व भी कहा जाता है । खेत से नवीन अन्न को यज्ञ में हवन करके प्रसाद लेने की परंपरा भी है। उस अन्न को होला कहते हैं। इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा। होलिकोत्सव मनाने के सम्बन्थ में अनेक मत प्रचलित हैं। यहाँ कुछ प्रमुख मतों का उल्लेख किया गया है-

( १ ) ऐसी मान्यता है कि इस पर्व का सम्बन्ध 'काम-दहन' से है। हमारे हिन्दू धर्म की मान्यता है कि इसी दिन भगवान शंकर ने अपनी क्रोधाग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था । तभी से इस त्यौहार का प्रचलन हुआ ।

( २ ) फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा पर्यन्त आठ दिन होलाष्टक मनाया जाता है। भारत के कई प्रदेशों में होलाष्टक शुरू होने पर पेड़ की शाखा काटकर उसमें रंग-बिरंगे कपड़ों के टुकड़े बांधते हैं। इस शाखा को जमीन पर गाड़ देते हैं। सभी लोग इसके नीचे होलिकोत्सव मनाते हैं।

( ३ ) यह त्यौहार हिरण्यकशिपु की बहन की स्मृति में भी मनाया जाता है। कहा जाता है कि हिरण्यकशिपु की होलिका नामक बहन वरदान के प्रभाव से नित्यप्रति अग्नि-स्नान करती और जलती नहीं थी। हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन से प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि-स्नान करने को कहा। उसने समझा कि ऐसा करने से प्रह्लाद तो जल जाएगा पर होलिका बच निकलेगी। हिरण्यकशिपु की बहन ने प्रह्लाद को लेकर अग्निस्नान किया जिसमें होलिका तो जल गयी किन्तु प्रह्लाद श्रीहरि की कृपा से जीवित बच गये। तभी से इस त्यौहार को मनाने की प्रथा चल पड़ी।

( ४ ) इस दिन आम्रमञ्जरी व चन्दन को मिलाकर खाने का भी बड़ा माहात्म्य है। कहते हैं जो लोग फाल्गुन पूर्णिमा के दिन एकाग्र चित्त से हिंडोले में झूलते हुए श्रीगोविन्द पुरुषोत्तम के दर्शन करते हैं, वे निश्चय ही वैकुण्ठलोक में वास करते हैं।

( ५ ) भविष्योत्तर पुराण में इस उत्सव के सम्बन्ध में एक कथा दी गई है-

महाराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि फाल्गुन-पूर्णिमा को प्रत्येक गांव एवं नगर में उत्सव क्यों होता है? प्रत्येक घर में बच्चे क्यों क्रीड़ा-मय हो जाते हैं और 'होलाका' जलाते हैं ? 'होलाका' में किस देवता की पूजा होती है? किसने इस उत्सव का प्रचार किया? इसमें क्या-क्या कर्मानुष्ठान होते हैं?

भगवान् श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से राजा रघु की एक कथा कही । राजा रघु के पास जाकर लोग यह कहने लगे कि 'ढुण्ढा' नामक एक राक्षसी बच्चों को दिन - रात डराया करती है और बच्चे उसके उत्पीड़न से सूख जाते हैं। राजा द्वारा पूछने पर उनके पुरोहित ने बताया कि वह मालिन की पुत्री एक राक्षसी है। इसे भगवान शिव ने वरदान दिया है कि उसे देव, मानव आदि मार नहीं सकते और न ही वह अस्त्र-शस्त्र या जाड़ा, गर्मी या वर्षा से मर सकती है । केवल क्रीड़ा-युक्त बच्चों से वह भयभीत हो सकती है । पुरोहित ने यह भी बताया कि "फाल्गुन की पूर्णिमा' को शीतऋतु समाप्त होती है और ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है, तब लोग समुदायों में एकत्रित होकर हँसें एवं आनन्द मनाएँ। बच्चे लकडियों के टुकडे, घास आदि एकत्रित करें तथा बड़े लोग रक्षोघ्न-मन्त्रों के उच्चारण सहित उसमें आग लगाएं । प्रज्वलित अग्नि-देव का सभी लोग तालियाँ बजाकर स्वागत करे, प्रदक्षिणा करें, हँसें और अपनी-अपनी भाषा में सर्वथा मुक्त होकर उच्च-स्वर से गायन, अट्टहास, कीडा करें । इस प्रकार के 'होलिका' अर्थात् 'सर्व दुष्टापह होम' से वह 'ढुन्ढा' राक्षसी भयभीत होकर मर जाएगी ।

जब चक्रवर्ती राजा ने 'सर्व दुष्टापह होम' का विधिवत अनुष्ठान किया तो "ढुण्ढा" राक्षसी मर गई और वह दिन "होलाका ज्वलन" या होलिका दहन नाम से प्रसिद्ध हो गया । दूसरे दिन चैत्र की प्रतिपदा पर लोगों को होलिका - भस्म को प्रणाम करना चाहिए। इस होम से सम्पूर्ण समुदाय रोगमुक्त होकर आनन्द से रहता है।

पुराणों में 'ढुण्ढा' राक्षसी के अन्य नाम भी मिलते है । यथा- शीतोष्णा, असृक्या, सन्धिजा, अरुकूण्ठा, होलाका आदि । इन नामों के अर्थों का विवेचन करने पर तथा पौराणिक कथानकों के मन्तव्यों पर ध्यान देने से 'ढुण्ढा' राक्षसी के तात्विक स्वरूप का बोध होता है । 'ढुण्ढा' शब्द, ठुण्ठ या 'ठूँठ' शब्द का अपभ्रंश है । जिस प्रकार कोई वृक्ष मधु-रसात्मक प्राण-रस से वंचित होकर शुष्क हो केवल 'ठूँठ' जैसा ही रह जाता है, ठीक उसी प्रकार 'ढुण्ढा' राक्षसी के प्रकोप से बालकों का शरीर सूख कर केवल 'ठूंठ' जैसा रह जाता है । दूसरे शब्दों में शिशिर और वसन्त की सन्धि - रूपा ऋतु एक ओर स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से सौम्य बालकों के लिए पीड़ादायक होती है, तो दूसरी ओर सम्वत्सराग्नि के क्षीण होने के कारण सम्पूर्ण समुदाय को काम-मोह-अज्ञान रूपी जड़ता से आबद्ध कर देती है ।

इससे बचने के लिए ही हमारे ऋषियों ने रंग-वर्षण और राग-रागिनी-मय होली गायन के पावन उत्सव के रूप में सर्व-दुष्टापह अग्नि प्रज्ज्वलन का विधान हमें दिया है । आवश्यकता है कि आज हम उक्त मन्तव्यों को पुन: समझकर पूर्णतः निरोग बनते हुए नवीन संवत्सराग्नि को धारण करें ।
होली आनन्दोल्लासका पर्व है । लेकिन इसमें जहाँ एक ओर उत्साह-उमङ्ग की लहरें हैं, तो वहीं दूसरी ओर कुछ बुराइयाँ भी आ गयी हैं । कुछ लोग इस अवसरपर अबीर, गुलाल के स्थान पर कीचड़, मिट्टी, कष्ट से छूटने वाले-त्वचा पर दुष्प्रभाव छोड़ने वाले रसायन-काँच मिले हुए रंग प्रयोग कर देते हैं; शराब आदि पीकर फूहड़पना कर अपशब्द बोलते हैं। जिससे मित्रता के स्थान पर शत्रुता का जन्म होता है। अश्लील व गंदे हँसी-मजाक सबके हृदय को चोट पहुंचाते हैं। अतः इन सबका त्याग करना चाहिए। होली सम्मिलन, मित्रता एवं एकता का पर्व है। इस दिन द्वेषभाव भूलकर सबसे प्रेम और भाईचारे से मिलना चाहिये । एकता, सद्भावना एवं सोल्लास का परिचय देना चाहिये। यही इस पर्व का मूल उदेश्य एवं संदेश है।  

Photo: बसन्तपञ्चमी के आते ही प्रकृति में एक नवीन परिवर्तन आने लगता है । दिन छोटे हो जाते हैं । जाड़ा कम होने लगता है। उधर पतझड़ शुरू हो जाता है । माघ की पूर्णिमा पर होली का डंडा रोप दिया जाता है [कुछ लोग होलाष्टक प्रारम्भ होने पर शाखा रोपते हैं]। होली के पर्व के स्वागत हेतु आम्रमञ्जरियों पर भ्रमरावलियां मँडराने लगती हैं ।

     भविष्यपुराण के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन सब लोगों को अभयदान देना चाहिये, जिससे सम्पूर्ण प्रजा उल्लासपूर्वक हँसे । बालक गाँव के बाहर से लकडी-कंडे लाकर ढेर लगायें। उसमें होलिका का पूर्ण सामग्री सहित विधिवत् पूजन करें। फिर उसमें होलिका-दहन करें । पूजा के समय यह मंत्र पढ़ा जाता है-

असृक्याभयसंत्रस्तै: कृता त्वं होलि बालिशै: ।
अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव ॥

मान्यता है कि ऐसा करने से सारे अनिष्ट दूर हो जाते हैं ।

     इस पर्व को नवान्नेष्टि यज्ञपर्व भी कहा जाता है । खेत से नवीन अन्न को यज्ञ में हवन करके प्रसाद लेने की परंपरा भी है। उस अन्न को होला कहते हैं। इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा। होलिकोत्सव मनाने के सम्बन्थ में अनेक मत प्रचलित हैं। यहाँ कुछ प्रमुख मतों का उल्लेख किया गया है-

( १ ) ऐसी मान्यता है कि इस पर्व का सम्बन्ध 'काम-दहन' से है। हमारे हिन्दू धर्म की मान्यता है कि इसी दिन भगवान शंकर ने अपनी क्रोधाग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था । तभी से इस त्यौहार का प्रचलन हुआ ।

( २ ) फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा पर्यन्त आठ दिन होलाष्टक मनाया जाता है। भारत के कई प्रदेशों में होलाष्टक शुरू होने पर पेड़ की शाखा काटकर उसमें रंग-बिरंगे कपड़ों के टुकड़े बांधते हैं। इस शाखा को जमीन पर गाड़ देते हैं। सभी लोग इसके नीचे होलिकोत्सव मनाते हैं।

( ३ ) यह त्यौहार हिरण्यकशिपु की बहन की स्मृति में भी मनाया जाता है। कहा जाता है कि हिरण्यकशिपु की होलिका नामक बहन वरदान के प्रभाव से नित्यप्रति अग्नि-स्नान करती और जलती नहीं थी। हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन से प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि-स्नान करने को कहा। उसने समझा कि ऐसा करने से प्रह्लाद तो जल जाएगा पर होलिका बच निकलेगी। हिरण्यकशिपु की बहन ने प्रह्लाद को लेकर अग्निस्नान किया जिसमें होलिका तो जल गयी किन्तु प्रह्लाद श्रीहरि की कृपा से जीवित बच गये। तभी से इस त्यौहार को मनाने की प्रथा चल पड़ी।

( ४ ) इस दिन आम्रमञ्जरी व चन्दन को मिलाकर खाने का भी बड़ा माहात्म्य है। कहते हैं जो लोग फाल्गुन पूर्णिमा के दिन एकाग्र चित्त से हिंडोले में झूलते हुए श्रीगोविन्द पुरुषोत्तम के दर्शन करते हैं, वे निश्चय ही वैकुण्ठलोक में वास करते हैं।

( ५ ) भविष्योत्तर पुराण में इस उत्सव के सम्बन्ध में एक कथा दी गई है-

     महाराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि फाल्गुन-पूर्णिमा को प्रत्येक गांव एवं नगर में उत्सव क्यों होता है? प्रत्येक घर में बच्चे क्यों क्रीड़ा-मय हो जाते हैं और 'होलाका' जलाते हैं ? 'होलाका' में किस देवता की पूजा होती है? किसने इस उत्सव का प्रचार किया? इसमें क्या-क्या कर्मानुष्ठान होते हैं?

     भगवान् श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से राजा रघु की एक कथा कही । राजा रघु के पास जाकर लोग यह कहने लगे कि 'ढुण्ढा' नामक एक राक्षसी बच्चों को दिन - रात डराया करती है और बच्चे उसके उत्पीड़न से सूख जाते हैं। राजा द्वारा पूछने पर उनके पुरोहित ने बताया कि वह मालिन की पुत्री एक राक्षसी है। इसे भगवान शिव ने वरदान दिया है कि उसे देव, मानव आदि मार नहीं सकते और न ही वह अस्त्र-शस्त्र या जाड़ा, गर्मी या वर्षा से मर सकती है । केवल क्रीड़ा-युक्त बच्चों से वह भयभीत हो सकती है । पुरोहित ने यह भी बताया कि "फाल्गुन की पूर्णिमा' को शीतऋतु समाप्त होती है और ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है, तब लोग समुदायों में एकत्रित होकर हँसें एवं आनन्द मनाएँ। बच्चे लकडियों के टुकडे, घास आदि एकत्रित करें तथा बड़े लोग  रक्षोघ्न-मन्त्रों के उच्चारण सहित उसमें आग लगाएं । प्रज्वलित अग्नि-देव का सभी लोग तालियाँ बजाकर स्वागत करे, प्रदक्षिणा करें, हँसें और अपनी-अपनी भाषा में सर्वथा मुक्त होकर उच्च-स्वर से गायन, अट्टहास, कीडा करें । इस प्रकार के 'होलिका' अर्थात्  'सर्व दुष्टापह होम' से वह 'ढुन्ढा' राक्षसी भयभीत होकर मर जाएगी ।

     जब चक्रवर्ती राजा ने 'सर्व दुष्टापह होम' का विधिवत अनुष्ठान किया तो "ढुण्ढा" राक्षसी मर गई और वह दिन "होलाका ज्वलन" या होलिका दहन नाम से प्रसिद्ध हो गया । दूसरे दिन चैत्र की प्रतिपदा पर लोगों को होलिका - भस्म को प्रणाम करना चाहिए। इस होम से सम्पूर्ण समुदाय रोगमुक्त होकर आनन्द से रहता है।

     पुराणों में 'ढुण्ढा' राक्षसी के अन्य नाम भी मिलते है । यथा- शीतोष्णा, असृक्या, सन्धिजा, अरुकूण्ठा, होलाका आदि । इन नामों के अर्थों का विवेचन करने पर तथा पौराणिक कथानकों के मन्तव्यों पर ध्यान देने से 'ढुण्ढा' राक्षसी के तात्विक स्वरूप का बोध होता है । 'ढुण्ढा' शब्द, ठुण्ठ या 'ठूँठ' शब्द का अपभ्रंश है । जिस प्रकार कोई वृक्ष मधु-रसात्मक प्राण-रस से वंचित होकर शुष्क हो केवल 'ठूँठ' जैसा ही रह जाता है, ठीक उसी प्रकार 'ढुण्ढा' राक्षसी के प्रकोप से बालकों का शरीर सूख कर केवल 'ठूंठ' जैसा रह जाता है । दूसरे शब्दों में शिशिर और वसन्त की सन्धि - रूपा ऋतु एक ओर स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से सौम्य बालकों के लिए पीड़ादायक होती है, तो दूसरी ओर सम्वत्सराग्नि के क्षीण होने के कारण सम्पूर्ण समुदाय को काम-मोह-अज्ञान रूपी जड़ता से आबद्ध कर देती है ।

     इससे बचने के लिए ही हमारे ऋषियों ने रंग-वर्षण और राग-रागिनी-मय होली गायन के पावन उत्सव के रूप में सर्व-दुष्टापह अग्नि प्रज्ज्वलन का विधान हमें दिया है । आवश्यकता है कि आज हम उक्त  मन्तव्यों को पुन: समझकर पूर्णतः निरोग बनते हुए नवीन संवत्सराग्नि को धारण करें । 
     होली आनन्दोल्लासका पर्व है । लेकिन इसमें जहाँ एक ओर उत्साह-उमङ्ग की लहरें हैं, तो वहीं दूसरी ओर कुछ बुराइयाँ भी आ गयी हैं । कुछ लोग इस अवसरपर अबीर, गुलाल के स्थान पर कीचड़, मिट्टी, कष्ट से छूटने वाले-त्वचा पर दुष्प्रभाव छोड़ने वाले रसायन-काँच मिले हुए रंग प्रयोग कर देते हैं; शराब आदि पीकर फूहड़पना कर अपशब्द बोलते हैं। जिससे मित्रता के स्थान पर शत्रुता का जन्म होता है। अश्लील व गंदे हँसी-मजाक सबके हृदय को चोट पहुंचाते हैं। अतः इन सबका त्याग करना चाहिए। होली सम्मिलन, मित्रता एवं एकता का पर्व है। इस दिन द्वेषभाव भूलकर सबसे प्रेम और भाईचारे से मिलना चाहिये । एकता, सद्भावना एवं सोल्लास का परिचय देना चाहिये। यही इस पर्व का मूल उदेश्य एवं संदेश है। आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनायें....

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