Wednesday, 5 March 2014

About Doctors strike...............बेगुनाह कौन है इस शहर में कातिल के सिवा ?"....From Facebook........

"तेग मुंसिफ हो जहां दारो रसन हो शाहिद,
बेगुनाह कौन है इस शहर में कातिल के सिवा ?"

( यानी जहां तलवार जज हो और फांसी का फंदा गवाह हो, उस शहर में कातिल के अलावा बेगुनाह कौन है )..
दोस्तों,

उत्तर प्रदेश के कानपूर में पिछले दो दिन से दबंगई, गुंडई और अराजकता का नंगा नाच खेला जा रहा है और इस बार मुलायम कुनबे के “ सच्चे और माननीय समाजवादियो” के निशाने पर आये हैं कानपूर के गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कालेज के डाक्टर....

जी हाँ, सपा के “माननीय समर्थकों” ने कानपूर की “संवेदनशील” पुलिस बल के साथ मिलकर इस मेडिकल कालेज के जूनियर रेजिडेंट , सीनियर रेजिडेंट, प्रोफेसर स्तर के डाक्टरों को जिस बेरहमी, बेदर्दी और अमानवीयता से मारा-पीटा है उसे देखकर एक बार को मानवता भी और दंग और सन्न रह गयी होगी.....

गुंडों के साथ मिलकर पुलिस जिस बेदर्दी से डाक्टरों को जलील करने के साथ-साथ इस बर्बरता से मार रही थी कि जैसे इन डाक्टरों से बड़े अपराधी इस राज्य और मुल्क के इतिहास में ना कभी देखे गए थे और ना सुने गए थे...

इस मेडिकल कालेज के कुछ जूनियर रेजिडेंट डाक्टरों और सपा विधायक इरफान सोलंकी एक बहुत ही छोटी सी बहस से शुरू हुई ये वारदात बढ़ते-बढ़ते दोनों पक्षों में मार-पीट तक पहुँच गयी....इसके बाद सपा विधायक के समर्थकों ने मेडिकल कालेज के अस्पताल, हॉस्टल में जो तांडव मचाया वो अद्वितीय है...हॉस्टल में जो डाक्टर दिखा उसे ही बुरी तरह मारा गया, सारा सामान तोडा गया, हॉस्टल में मौजूद स्कूटर और मोटरसाइकिलों को तोड़ डाला गया, कमरों में जा-जाकर डाक्टरों और मेडिकल छात्रों को घसीटा गया और डंडो से बेरहमी से पीटा गया, पीठ पर लाठियां बरसा बरसा कर चमड़ी उधेड़कर पीठ पर निशान तक डाल दिए...

इतनी बेरहमी से मारा गया कि कई डाक्टर लहू-लुहान हो गए...कई डाक्टरों की हड्डियाँ तक तोड़ दी गयी.. यहाँ तक की हॉस्टल की छतों से उन्हें नीचे फैंका गया या कूदने पर मजबूर किया गया....कुछ मेडिकल छात्र और डाक्टर इतने ज्यादा घायल हैं कि जिन्दगी देने वाले आज खुद जिन्दगी की जद्दोजहद में अस्पताल में पड़े मौत से लड़ रहे हैं..और इन सबके बाद में बहुत से छात्रों को भेड़-बकरिओं की तरह खदेड़कर थाने ले जाया गया...

यहाँ तक की पत्रकारों को भी नहीं बख्शा गया इन गुंडों के द्वारा.....उनसे भी बदसलूकी की गयी..

क्या यही इज्ज़त ये सपा के नेता और उत्तर प्रदेश की पुलिस वहां के डाक्टरों को देती है ? क्या ये तरीका है समाज के संभ्रांत और शिक्षित माने जाने वाले तबके के साथ व्यवहार करने का ?

एक बार को मान भी लिया जाये कि सारी की सारी गलती कुछ जूनियर डाक्टरों की थी तब भी उस नेता और उसके समर्थकों और पुलिस वालों को ये किसने अधिकार दिया कि वो कानून अपने हाथों में लेकर वहीँ इन्साफ करें ? क्यों नहीं कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए उन पर मुकदमा दर्ज करके उन्हें वारंट लेकर गिरफ्तार किया गया और न्यायाधीश के सामने पेश किया गया...ऐसा नहीं करके कानपूर की पुलिस ने जो किया और कानून अपने हाथ में लिया उससे अदालतों के वजूद पर ही प्रश्न चिन्ह ही लग जाता है...

“जंगल राज” का मतलब क्या है ? यही ना कि वहां कोई कानून नहीं होता और लोग अपने हिसाब से ही अपने लिए इन्साफ करते हैं....जहाँ किसी भी नियम-कायदे की कोई जगह नहीं होती और “जिसकी लाठी, उसकी भैंस” के सिद्धांत पर ही व्यवस्था चलती है..और ठीक यही इस वक़्त उत्तर प्रदेश में हो रहा है....इस सिद्धांत के हिसाब से तो फिर अब जब भी दो पक्षों के बीच में लड़ाई हो तो वो दोनों पक्ष उसे वहीँ बीच सड़क पर ही लड़-मर कर उसका फैसला कर लें...

फिर तो मुलायम सिंह और उनके सपाई कुनबे को अब इस देश की जनता को ये बता देना चाहिए उत्तर प्रदेश की जनता को कि न्याय पाने के लिए कौन सा रास्ता अपनाना चाहिए ? तो क्या अब जनता को भी यही “जंगल राज वाले प्राकृतिक न्याय” का रास्ता अपनाना चाहिए उन जन प्रतिनिधिओं के खिलाफ जब ये चुने हुए “माननीय” अपनी हदों को पार करते हुए जनता का पैसा लूट लेते हैं और सरकारी धन का दुरूपयोग करते हैं ?

इस पूरे प्रकरण में पुलिस की भूमिका बेहद ही आपतिजनक और असंवेधानिक है---- प्रश्न उठना लाजिमी है कि ये पुलिस वाले अपनी वर्दी और इस मुल्क के संविधान के वफादार हैं या चंद ताक़तवर सफेदपोशों के बंधुआ नौकर ?? क्या ये खाकी वर्दी वाले अधिकारी कानून का राज स्थापित करने वाले जनता के पहरेदार हैं या सफ़ेद खद्दर के कुरते-पायजामे की जेब में पड़े हुए खुले सिक्के हैं ? इस प्रश्न का उत्तर पुलिस को देना ही होगा कि वो जनता की रक्षक है या जनता की अधिकारों की भक्षक ?

चिकित्सकों को जिस तरह से जघन्य अपराधिओं की तरह मार-पीट कर अपमानित किया गया और जिस तरीके उत्तर प्रदेश पुलिस ने उन्हें “ट्रीटमेंट” दिया है वो अत्यंत निदंनीय, घृणित और अमानवीय और गैर-क़ानूनी है....अगर इसी तरह से नेता और उनके गुंडे लोकल पुलिस के साथ मिलकर सड़कों और अस्पतालों में यूँ “जंगल-राज” वाले त्वरित न्याय को मूर्त-रूप देने लगे तो वो दिन दूर नहीं जब अस्पतालों में मरीजों का इलाज़ करने में डाक्टर हिचकिचाएंगे और तब शायद ही कोई डाक्टर सरकारी नौकरी करने की सोचेगा भी..

और ऐसी हालत में बेकसूर मरीजों की अकाल मृत्यु के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जायेगा ये बुद्धिजीविओं के लिए एक बहस का मुद्दा बन सकता है और इसके लिउए अभी से उत्तर तलाश लिए जायें तो बेहतर होगा......

कानपूर के लगभग 1500 सरकारी, प्राइवेट और अन्य डाक्टरों ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए सपा नेता इरफ़ान सोलंकी और कानपूर के SSP यशस्वी यादव को तुरंत निलंबित करने की मांग की है..उधर कानपूर के Indian Medical Association (IMA) के साथ–साथ उत्तर-प्रदेश के IMA ने भी इस घटना की कड़ी भर्त्सना करते हुए गुंडों और दबंगों पर कठोर से कठोर कार्यवाही की बात कही है...पूरे उत्तर प्रदेश के बाकि सभी सरकारी मेडिकल कालेजों के जूनियर रेजिडेंट डाक्टर कार्य-बहिष्कार का ऐलान कर चुके हैं पर इंसानियत के तकाजे के लिए इमरजेंसी को बंद नहीं किया गया है..

अब उत्तर प्रदेश की जनता को सोचना है कि वो आज की दुनिया और आज के हिन्दुस्तान में कहाँ खड़े हैं और उनकी दशा और दिशा क्या है... जिस तरीके से उत्तर-प्रदेश के लोगों ने गुंडों और बलवायियों को आश्रय देने वालों दलों को चुनकर राज करने का अधिकार बार-बार दिया है उसी का नतीजा है कि आज उत्तर प्रदेश की पहचान इस मुल्क और पूरे विश्व में कैसी हो गयी है ये बताने की जरूरत नहीं है...

ये सोचने वाली बात है विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र और गणतंत्र में एक अदना से विधायक की इतनी हिम्मत और जुर्रत कैसे हो गयी कि वो पुलिस को लेकर हिंसा और आगज़नी का नंगा नाच और तांडव करे और पूरा शासन-प्रशासन ऐसे बर्ताव करे कि जैसे कुछ हुआ ही ना हो...

इस घटना के बाद मशहूर शायर बशीर बद्र साहब का एक शेर याद आता है –

"तेग मुंसिफ हो जहां दारो रसन हो शाहिद,
बेगुनाह कौन है इस शहर में कातिल के सिवा ?"

( यानी जहां तलवार जज हो और फांसी का फंदा गवाह हो, उस शहर में कातिल के अलावा बेगुनाह कौन है )..

जब मुजफ्फरनगर में दंगे हो रहे थे तब यही सरकार मौन थी...जब आम आदमी वहां मर रहा था और उसे लूटा जा रहा था तब इसी सरकार ने इस तरह से तो पुलिस बल भेजा नहीं था जैसे अब डाक्टरों को तोड़ने के लिए भेजा गया था...तब क्या इस सरकार के सिपहसालारों को सांप सूंघ गया था...

क्या उत्तर प्रदेश के पुलिस वाले अपनी मर्दानगी सिर्फ मासूम और आम आदमी पर ही दिखाते हैं ? तब उनकी मर्दानगी कहाँ चली जाती है जब किसी ताक़तवर नेता की भैसें खो जाने पर उन्हें लाइन-हाज़िर कर निलंबित कर कर दिया जाता है.... कहाँ चली जाती है उनकी मर्दानगी जब सपा के गुंडे नेता टोल बूथ पर उनकी आँखों के सामने गुंडा-गर्दी करते है और क्यों नहीं उनकी मर्दानगी दिखती जब किसी दबंग नेता के खिलाफ आम आदमी आकर उनके थानों में उनसे गुहार लगाता है ?

अरे इतनी ही हिम्मत जरा ये पुलिस इन दबंग नेताओं के खिलाफ करती तो उत्तर प्रदेश में कब का “राम राज्य” आ चूका होता...

अब फैसले का वक़्त आ गया है उत्तर प्रदेश की आम जनता के लिए--

कि अब आपको क्या चाहिए— “जंगल राज” या “आम आदमी का राज” ?

और हाँ उत्तर प्रदेश के भाइयों और बहनों, अब चुप होकर बैठने का समय खत्म हो गया है...अगर अब भी आपने अपने हक-हकूकों , अधिकारों, न्याय और इज्ज़त के लिए आवाज़ नहीं उठाई तो याद रखियेगा एक शायर के ये अल्फाज़—

“मेरी बर्बादियों पर खुश होना छोड़ दे ऐ दोस्त,
कि मेरी आँधियों के रास्ते में तेरा घर भी आएगा”

हम मांग करते हैं कि दोषिओं पर कड़ी से कड़ी धाराओं में केस दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया जाये, उन्हें विधानसभा की सदस्यता से निलंबित किया जाये और इसमें शामिल सभी पुलिस अधिकारिओं को तुरंत निलंबित कर उन्हें गिरफ्तार किया जाये और उनपर विभागीय और अदालती कार्यवाही की जाये...

http://timesofindia.indiatimes.com/city/kanpur/7-patients-die-in-Kanpur-as-junior-doctors-go-on-strike/articleshow/31237530.cms



http://timesofindia.indiatimes.com/city/kanpur/SP-MLA-beaten-up-by-junior-doctors/articleshow/31186170.cms



जय हिन्द !! वन्दे मातरम !!

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