Thursday, 13 February 2014

दशावतार की कथाएँ



बचपन से ही आप दशावतार के बारे में अपने बड़े-बूढ़ों से सुनते आए होंगे; पर पता नहीं आप इनके जन्म की कथाओं से पूर्णरूप से परिचित हैं या नहीं। आज हम आपको इन दशावतारों के जन्म तथा उन परिस्थितियों जिनके परिणामस्वरूप इन्हें इस धरती पर अवतरित होना पड़ा, से सम्बन्धित कथाओं से आपको अवगत कराने जा रहे हैं। आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि इन दशावतारों का जन्म एक क्रम-विशेष से हुआ। आपने विज्ञान में पढ़ा होगा कि जीवन का प्रारम्भ जल अर्थात जलीय जीव-जन्तुओं से हुआ; उसी तरह अवतारों के क्रम में सर्वप्रथम ‘मत्स्य अवतारहुआ। इसी प्रकार जिस क्रम में जीवन का विकास हुआ, ठीक उसी क्रम में इन दशावतारों का पृथ्वी पर आगमन हुआ। ये विकास-क्रम आपको इन अवतारों के क्रम को याद रखने में मददगार साबित होगा। तो जल के बाद उस अवतार का अवतरण हुआ, जो जल और थल दोनों पर समान रूप से रह सकता था; यानि ‘कूर्म अवतार। कूर्म को हम कच्छप या कछुआ भी कहते हैं। इसके बाद बारी आती है, पूर्ण रूप से थलीय जन्तु के रूप में ईश्वरीय अवतार की, जो वराह यानि जंगली सुअर के रूप में हमारे सामने आया। अब अगर हम ये कहें कि अगला अवतार आधा पशु और आधा नर था, तो आप जरूर मन ही मन मुस्कुरा दिए होंगे और हमारे बताने से पहले ही ‘नृसिंहका नाम आपके मानस पटल पर अंकित हो गया होगा। जी हाँ ! बिल्कुल सही समझा आपने............... :))
अब अगला अवतार नर ही होगा, ये आप इस क्रम-विशेष से समझ ही चुके होंगे, पर ये पूर्ण नर न होकर बौने थे। जिस प्रकार आप जानते हैं कि मानव-विकास के क्रम में हमारे आदिम पूर्वज़ बौने थे, उसी प्रकार अवतार के रूप में नर का बौना रूप हमारे सामने पहले आया। वैसे आप बिल्कुल ठीक जगह पहुँच रहे हैं, हम ‘वामन अवतारकी ही बात कर रहे हैं। इसके बाद पूर्ण नर अवतार के रूप में ‘परशुरामका जन्म हुआ। पूर्ण नर अवतार के बाद अवतारों में ईश्वरीय अंश का समावेश हुआ, जो क्रमश: ‘श्री रामऔर ‘श्री कृष्णके रूप में हमारे समक्ष प्रकट हुए। आप तो जानते ही हैं कि श्री राम १२ और श्री कृष्ण १६ कलाओं के स्वामी थे। अब बात करते हैं नवें अवतार की, जो ‘महात्मा बुद्धको माना जाता है, जिन्होंने मनुष्यत्व से ईश्वरत्व की यात्रा का मार्ग हमें दिखाया। दसवें अवतार के रूप में ‘कल्कि अवतारकी बात कही जाती है, देखते हैं ये किस रूप में हमारे समक्ष प्रकट होते हैं। अभी मैंने संक्षेप में आपको इन अवतारों से परिचित कराया; अब आप विस्तृत रूप में क्रम से इन अवतारों की कथा पढ़िए :-

(१)     मत्स्य अवतार :-  प्राचीन काल में सत्यव्रत नाम के एक राजा हुए थे। एक बार तर्पण करते समय उनकी अंजुली में एक मछली आ गई। उस मछली ने उनके मन को इस कदर मोह लिया कि वो उसे अपने राजमहल ले आए और एक बर्तन में रख दिया। शाम तक उस मछली का आकार उस बर्तन के बराबर हो गया; फ़लस्वरूप उसे एक बहुत बड़े आकार के बर्तन में रख दिया गया। अगली सुबह का नज़ारा राजा को आश्चर्यचकित करने वाला था, अब उस मछली का आकार उस बड़े बर्तन में भी नहीं समा पा रहा था; फ़लत: राजा ने बेमन से उस मछली को नदी में वापस छोड़ आने का निश्चय किया। परन्तु तब राजा के आश्चर्य की कोई सीमा ना रही, जब नदी में छोड़ते ही मछली का आकार यकायक बढ़ने लगा। राजा ने हाथ जोड़कर उससे अपने वास्तविक स्वरूप से परिचित कराने को कहा। तब मछली ने अपने ईश्वरीय अवतार होने की बात कही; साथ ही ये भी बताया कि कुछ समय में महाप्रलय होने वाली है, जिसमें ये सारी पृथ्वी नष्ट हो जाएगी। उसने राजा को एक दिव्य नौका प्रदान की और कहा कि प्रलय आने पर सप्त-ऋषियों को साथ लेकर, समस्त जीव-जन्तुओं के जोड़े और सभी प्रकार के फ़ल-फ़ूल और वनस्पति लेकर इस पर सवार हो जाना; मैं तुम्हारी प्रलय से रक्षा करूँगी। इस प्रकार मत्स्य अवतारने प्रलय के पश्चात पुन: सृष्टि को स्थापित करने में अपना योगदान दिया।

(२)     कच्छप अवतार (कूर्मावतार) :-  आपने अमृत की प्राप्ति के लिए समुद्र-मंथन के विषय में तो सुना ही होगा। ये राक्षसों और देवताओं के बीच हुआ था; जिसमें राक्षसों का नेतृत्व राजा बलि और देवताओं का नेतृत्व राजा इन्द्र कर रहे थे। मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया था। परन्तु जैसे ही समुद्र-मंथन प्रारम्भ हुआ, मंदराचल पर्वत आधारविहीन होकर समुद्र की अतल गहराइयों में डूबने लगा। फ़लत: राक्षसों और देवताओं को इस संकट से उबारने के लिए भगवन स्वयं ‘कच्छप अवतारके रूप में प्रकट हुए और मंदराचल के भार को अपनी पीठ पर सम्भाल लिया।
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()     वराह अवतार :-  हिरण्यकश्यप के विषय में तो आप सभी जानते हैं, उनके बड़े भाई हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को चुरा कर अनन्त सागर की गहराइयों में छुपा दिया। तब भगवान स्वयंवराहके रूप में अवतरित हुए और उन्होंने हिरण्याक्ष का वध करके पृथ्वी का उद्धार किया।


()     नृसिंह अवतार :-  आपने प्रहलाद के विषय में तो सुना ही होगा, जिनके पिता हिरण्यकश्यप को ये वरदान प्राप्त था कि उनकी मृत्यु तो मनुष्य से होगी, पशु से और ही उसका गर्भ से जन्म हुआ होगा; तो दिन में मृत्यु होगी, ही रात में और ही किसी अस्त्र-शस्त्र से उसका वध होगा; तो घर के अन्दर मृत्यु होगी बाहर और ही धरती, आकाश या पाताल पर उसे मारा जा सकेगा। यूँ तो हिरण्यकश्यप ने इस वरदान को पाने में अपना पूरा दिमाग लगाया था और अपने को अमर मान लिया था; पर भगवान तो भगवान ठहरे, हर बात की काट है उनके पास। भगवान भी जन्म लेकर खम्भे से प्रकट हुए उसे मारने को और रूप भी ऐसा सलोना कि मुख तो सिंह का और शरीर मनुष्य का अर्थात तो नर ही पशु। समय भी संध्या को चुना, ताकि दिन हो रात और घर की देहरी पे बैठ गए, जो तो घर के अन्दर होती है बाहर तथा हिरण्यकश्यप को पकड़कर गोद में लिटा लिया, ताकि पृथ्वी, आकाश और पाताल वाली बात भी रहे। मारा भी उसे अपने बड़े- नाखूनों से, क्योंकि अस्त्र-शस्त्रों से उसे मरना ही नहीं था।

इस अवतार से एक बात ये भी समझ में आती है कि दुनियां को आप कितना भी झाँसा दे लो, भगवान से कैसे बचोगे? अच्छा तो यही है कि नेक राह पे चलते रहो, खुश रहोगे..... :)

() वामन अवतार :-  एक बार दैत्यराज बलि ने दैत्यगुरू शुक्राचार्य की मदद से इन्द्र को हराकर स्वर्ग पर आधिपत्य कर लिया। तब इन्द्र की माता अदिति की प्रार्थना पर भगवान ने वामन के रूप में उनके गर्भ से जन्म लिया। राजा बलि की दानवीरता के विषय में तो आपने सुना ही होगा, जब वामन के रूप में भगवान ने उनसे तीन पग भूमि माँगी, तो उन्होंने सहर्ष अनुमति दे दी। भगवान ने एक कदम से पूरी पृथ्वी और दूसरे कदम से पूरा आकाश माप लिया; अपने तीसरे कदम से वे पूरा पाताल नापने ही वाले थे कि बलि ने उनके पैर पकड़ लिए कि यदि ये भी आप ले लेंगे, तो हम कहाँ जाएँगे। भगवान ने उस पैर को बलि के सिर पर रखकर उसे भव-बाधा से मुक्त कर दिया।

यहाँ पर मैं आपको एक मजेदार प्रसंग से भी अवगत कराना चाहूँग। जब राजा बलि तीन पग भूमि दान करने के लिए अपने कमण्डल से जल निकाल रहे थे, तो शुक्राचार्य उस कमण्डल की नली में घुस गए, क्योंकि उन्हें वामन अवतार की सच्चाई पता थी। जब जल नहीं निकला, तो भगवान भी माजरा समझ गए और उन्होंने एक तिनका उठाकर उस नली में डाल दिया, जिससे शुक्राचार्य की आँख फ़ूट गई और वो घबराकर बाहर निकल आए।

() परशुराम अवतार :-  एक समय जब जनता अत्याचारी और क्रूर राजाओं से त्रस्त हो गई, तो गौ, ब्राह्मणों और साधुओं की रक्षा हेतु भगवान ने परशुराम के रूप में अवतरण लिया

() श्री रामावतार :-  अत्याचारी रावण को मारकर धर्म की स्थापना हेतु श्री राम का अवतरण हुआ। इनकी कथा तो रामानंद सागर ने ही घर- पहुँचा दी है। .. :)

() श्री कृष्णावतार :-  सिर्फ़ अपने मामा कंस के अत्याचार से लोगों को मुक्त कराने के लिए ही कृष्ण का जन्म नहीं हुआ था, बल्कि वे कुरूक्षेत्र में भ्रमित अर्जुन के बहाने लोगों को एक नई जीवन-दृष्टि से अवगत कराने हेतु अवतरित हुए, जो आज भी जन- का पथ-प्रदर्शन करती है और जिसे हमभगवत गीताके नाम से जानते हैं।

() बुद्धावतार :-  अन्य अवतार तो आम-जन को किसी किसी अत्याचारी शासक / राजा से मुक्त कराने के लिए ही इस पृथ्वी पर आए थे; परन्तु बुद्ध के रूप में भगवान मनुष्य को स्वयं मनुष्य द्वारा रचित बन्धनों से मुक्त कराने हेतु अवतरित हुए। उन्होंने उपदेश दिया किस्वयं को पहचानो, यही तुम्हें इस जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त कराएगा।
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(१०) कल्कि अवतार :-  कल्कि अवतार तो समय के गर्भ में छुपा हुआ है, जिसके विषय में आने वाला समय ही बताएगा; पर कहते हैं कि उसके बाद सतयुग आएगा। हम इस सुखद भविष्य की आशा से ही खुश हो सकते हैं, क्योंकि इस कलयुग में हर व्यक्ति किसी किसी वजह से प्रताड़ित और दु:खी है।
 

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