Tuesday, 26 November 2013

Hindi Hasya ..............अफसर मेहरबान तो कीडे़ पहलवान..........................116713



वीरेन्‍द्र नारायण झा
चर्चित लेखक वीरेन्‍द्र नारायण झा का व्‍यंग्‍य-
बेगूसराय में गरीबी का दाना बना कीड़ों का निवाला। यह समाचार भले ही विपक्षियों के लिये घर बैठे मुद्दा बन गया हो लेकिन इसमें सरकारी अफसर की उदारता साफ झलकती है। आज तक जितनी भी सरकारें बनीं सभी गरीबों की भलाई के लिये प्रतिबद्ध रहीं। गरीबी ना हो तो मानो सरकार के पास हटाने के लिये कुछ बचता ही नहीं। चाहे राज्य सरकार हो या केन्द्र सरकार। गरीबी दूर करने के लिये लोक लुभावन योजनायें चलायी जा रही हैं। इनके नाम भी लुभाते हैं, काम तो खैर सुहाते ही हैं। लेकिन कोई सरकार ऐसी नहीं कि गरीब-लाचार कीड़े-मकोडे़, पशु-पक्षी, साँप-बिच्छू की खातिर सोचे। योजनाओं में अगर पशु-पक्षी शामिल भी हैं तो कीड़े-मकोडे़ के लि‍ये अलग से न कोई योजना है और न ही सपना।
हाँ, यह बात दीगर है कि पहले के साधु-सन्‍त उनके लिए भी दया का भाव रखते थे जैसे मानव प्राणी के लिये। उनके कष्ट से वे दुखी होते थे। इसलिये खुद कष्ट उठाकर उन्हें किसी प्रकार दुख नहीं देते थे। यह उनकी उदारता थी और सभी जीव-जन्‍तुओं के प्रति अगाध प्रेम। बिलकुल वही सहृदयता दिखाई है बिहार राज्य खाद्य निगम के गोदाम वालों ने।  बेगूसराय से सटे तिलरथ में एससीआई के गोदाम में गरीबो के लिये रखा गया 25 क्विटंल गेहूँ सड़ गया। सडा़ इसलिये कि गोदाम पिछले आठ महीने से खोला नहीं गया। खोला इसलिये नहीं गया कि उस पर ताला लटक रहा था और उसे खोला नहीं गया। ताला नहीं खुला क्योंकि गोदाम में तक़रीबन 50 हज़ार बोरे गेहूँ को सड़ना था। सड़ना इसलिये था कि उसे सड़ना था। सो हुआ। अब कितना सडा़ और कितना नहीं, यह जाँच के बाद पता चलेगा। सरकारी जाँच कि अपनी प्रक्रिया होती है। अपनी रफ़्तार होती है। तब तक सड़ने कि प्रक्रिया जारी रहेगी और कीड़े अंत्योदय, अन्नपूर्णा, बीपीएल व एपील सहित अन्य योजनाओं के लाभुको के हिस्से चट करने का सुअवसर प्राप्त करते रहेंगे। योजनाकारों के लिये यह आँखें खोलने वाली बात तो नहीं, वाक्या जरूर है। सरकारी भाषा में इसे सबक भी कहा जा सकता है। उम्मीद की जानी चाहिये कि योजनाकार अब सिर्फ गरीब-गुरबों के कल्याणार्थ योजनाओं पर ही विचार नहीं करेंगे, अपितु कीड़ों को भी सुध लेंगे।
सौ टके का सवाल यह है कि देश के कीड़ों के लिये कौन सोचेगा? कीडे़ की जिन्‍दगी जीनेवालों, जूठे पतल चाटकर भूख मिटानेवालों, कचरा बिन कर गुजर-बसर करने वालों के लिये अगर यह राज्य/देश सोच सकता है तो सही में कीट योनि मे जन्मे-पले-बढे़ कीड़ों के लिये कौन अपना वक्त बर्बाद करेगा?
लेकिन समय बडा़ बलवान होता है। जिसका कोई नहीं उसका खुदा होता है। खुदा दिखता नहीं, लेकिन माध्यम बनकर आता है। आज वह एफसीआई के हाकिमों के हवाले कीड़ों पर मेहरबान हुआ है। और ऊपरवाला मेहरबान तो कीडे़ भी पहलवान। एक-दो क्विंटल कौन कहे, हजारों क्विंटल अनाज से मालोमाल कर देता है। खाते रहो बदें सुशासन की शुक्रिया अदा करते रहो। जितना जी चाहे उतना खाओ। कौन रोकेगा, सारा गोदाम ही दे दिया। वो भी बंद गोदाम। कोई देखने वाला नहीं। कोई खोलने वाला नहीं। तनख्वाह मिलती रहे, तुम्हें भोजन नसीब होता रहे। भला हो अन्य उपजाने वालों का, भण्डारा करने वालों का और ताला जड़ने वालों का।
मगर सब दिन रहत ना एक समाना। आठ महीने के भोजन से कीड़ों की सारी जिन्दगी नहीं कटने वाली। उन्हें भी खाद्य सुरक्षा की गारण्टी चाहिये। लेकिन मजदूरों के पेट के कीडे़ जब भूख से बिलखिलाने लगे तो गोदाम मे बंद कीड़ों पर आफत आन पडी़। उन्हें अपने मुँह के निवाले छिनने के आसार नजर आने लगे जैसे गरीबों के हिस्से आने के पहले छिन जाते हैं। या छिन्‍न-भिन्‍न हो जाते हैं। और भूख के मारे ये कीडे़ न तो भ्रष्टाचार जानते हैं, न मंहगाई और न कालाधन। ये तो सिर्फ मुट्ठी भर अनाज जानते हैं। सो भी अब उनसे दूर होने वाला है।
जाँच के दौरान मजदूरों ने खुलासा किया कि उन्हें अपनी मजदूरी में से गोदाम के अधिकारियों को कमीशन देना पड़ता था। कमीशन देने से अगर मजदूरी मिलती रहे तो क्या बुरा है भाई। कमीशन देकर तो बडे़-बडे़ ठेके मिलते है़, लाइसेंस मिलते हैं, सदन में जगह मिलती है, रोजगार मिलते हैं। क्या नहीं मिलता है। मजदूरी के लिये अगर कमीशन देनी पडी़ तो कौन सा भ्रष्टाचार का पहाड टूट गया। हर कमीशन लेने वाला कई मकानों का मालिक तो नहीं होता कि उसके मकान में सरकारी स्कूल या गोदाम खोल दिया जाये और गोदाम मे बंद पडे़ कीडे़ तो कमीशन देने से रहे। तो ऐसे में मजदूरों को ही कमीशन देना पडे़गा न। लेकिन मजदूरों में जब दूसरा खुलासा किया तो बडे़-बडे़ के दिमाग के कीडे़ उ-लाला उ-लाला गाने लगे। रोज शाम को गोदाम बंद करते समय बोरों पर पानी का छिड़काव किया जाता था ताकि सुबह उठाव के वक्त वजन बढ़ जाये। इसे कहते हैं लल्लन टॉप तरीका। हींग लगे न फिटकिरी रंग चोखा।
इस पर पटना बिहारी का कहना था कि बोरों पर पानी फेंकना इसलिये भी जरूरी हो गया कि कीड़ों को भोजन के पश्चात जल की आवश्यकता थी। आखिर अन्न और जल दोनों चाहिये न। बिना पानी का भोजन थोडे़ न सम्पन्न होता है।
इस रहस्य को अफसर के सिवा भला और कौन जान सकता है?
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3oo jokes............ 

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