Monday, 25 November 2013

मोहन कुमार नागर की कविताएँ..........................116413

जन्म : 1 अगस्‍त 1972। पेशे से चिकित्सक (निश्चेतना विशेषज्ञ)। पहली कविता 1994 में आकाशवाणी और समाचार पत्र में प्रसारित-प्रकाशि‍त | आकाशवाणी, दूरदर्शन से 100 से ज्यादा कविताएँ प्रसारित। महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित। सदस्य- द फि‍ल्‍म रायटर्स एसोसि‍एशन। टेलीफिल्म, सीरियल, नाटकों का लेखन एवं निर्माण। मोहन कुमार नागर की कुछ कवि‍ताएँ-

राग लोरी

ना साधे स्वर ना प्रतिपद
ना बांधा गंडा ना गुरु की दीक्षा
ना सम की समझ ना बंदिश का भान
ना आरोह ना अवरोह
साजिंद भी नतमस्तक
कि ना ताल ना ठेका
ना काली एक ना काली दो
ना ही बोध कि कब गाया जाता है भैरव
क्या बला है मालकोस
कौन मियाँ ? किसकी तोड़ी ?
माँ को तो बस आती है लोरी !
जहाँ हवाओं की मुरकियों पर
थप्प थप्प का ठेका
यदि हुई
तो बच्चे की संगत
वरना फूट फूट पड़ती है
ऊँ ऽऽऽ की रिदम पर
माँ की लोरी की बोलतान
कभी भी
कहीं भी
किसी भी वक्त
जब-जब उसका लाल रोता है ।

माँ

जरा सा कुनमुनाते ही
जाने अनजाने पहुँच जाता है हा-
बच्चे की छाती तक
और गूँजने लगती है थपकियाँ
थप्प थप्‍प
बच्चा माँ से चि‍पटे
फिर सो जाता है ।
बच्चे के रोने से पहले ही माँ
बच्चे को चुप कर देती है !
माँ रोज जागती है
गौरैया की नींद !
पि‍ता
अक्सर घोड़े बेचकर सोते हैं ।

रोटी, रोटी, रोटी

महज तीन शब्द उछले..
जात पर बात ??
और सेंकड़ों पत्थर उछल पड़े !
महज तीन शब्द फुसफुसाये
धर्म का अपमान ??
त्रिशूल नेज़े निकल पड़े !
कब से चीख रहे हैं-
बिलखते बच्चे
बेबस पिता
भूखी माँएं
‘रोटी.. रोटी.. रोटी.. ’
लो आज मैं भी चीखता हूँ-
तीन नहीं
तीस बार-
रोटी.. रोटी.. रोटी.. !
क्या हुआ ?
इतना सन्नाटा क्यूँ है भाई ?
क्योँ नहीं निकलते अब-
मंदिरों से
मस्जिदों से
अपने-अपने दड़बों से
लेकर हाथ में… रोटी !

ओसक

एक नन्हा सा ओसकण हूँ
सकुचाया सा
अपने छुटपन पर !
पर इतना तो बखूबी जानता हूँ
जिस दिन भी अपनी मिठास लिये
मिलूँगा सागर से
वो यकीनन ही
अपने खारेपन पर शर्मा रहा होगा ।

महीने के आखिरी दिन 

कल रात
फिर चीख मारकर उठ बैठा बेटा
‘माँ मुझे दिखी रोटी’
सोया नहीं फिर देर रात !
अक्सर यूँ ही उठ बैठता है चीख मारकर
थपकते रहते हैं फिर उसे गोद में लेकर घंटों
कभी.. सारी रात !
ये महीने के आखिरी दिन हैं !
पहली तारीख दूर है अभी
कटनी हैं अभी
फाकों पर कुछ और रात ।

लेखन

फूल लिखा-
मुरझा गया !
काँटा लिखा-
चुभ गया !
अब पत्थर लिख रहा हूँ इन दिनों !
थमाया जा सके जो
किसी मजलूम के हाथ !
जा .. तराश ले इसे
बना ले हथियार !
कभी तो गुजरेगा हुक्मराँ-
तेरी बस्ती से ।

पितरभोज

जब छोटा था
काशी के एक पंडे ने
दुत्कार दिया था !
‘गौदान नहीं ?
11 पंडों को भोजन भी नहीं करा सकता ?
पिता को श्‍वान बनायेगा क्या ?’
तब से नजर बेसाख्ता
कुत्तों पर चली जाती थी !
अब मैं बड़ा हो चला
फिर भी नजर कुत्तों पर
बेसाख्ता चली ही जाती है !
मुझे वो पंडा
आज भी नजर आता है ..
पूँछ हिलाये
जीभ लपलपाये
हाँडी में भरी
हड्डि‍यों पर नजर गड़ाये ।

No comments:

Post a Comment