Wednesday, 6 November 2013

देश को , काट काट कर खाएं , बड़े कमीने बैठे हैं.......................112013



  1. देश को , काट काट कर खाएं , बड़े कमीने बैठे हैं -सतीश सक्सेना

    कुछ तो पंहुच गए कुर्सी तक कुछ लाइन में बैठे हैं !
    देश को , काट काट कर खाएं , बड़े कमीने बैठे हैं !

    बुरा मास्टरों का हो,इनको बाहर किया पढ़ाई से !
    राजनीति में मिली नौकरी , धन्ना बन के बैठे हैं !

    बड़ा पोस्टर चौराहे पर , आदमकद लगवाएंगे !
    जनता को मुजरा दिखलायें, मंच पे जाके बैठे हैं !

    दल्लागिरी, चौथ बसूली, गुंडे सभी सलाम करें ,
    जनता साली, क्या कर पाए, मंत्री बन के बैठे हैं !

    जमीन बेचें, जंगल बेंचें, ट्रेन , हवाई अड्डे, बेचें !
    भारत माँ को हँस हंस बेचें, नोट कमाने बैठे हैं !

    जितने काले धंधे चलते ,इनकी कृपा जरूरी है !
    कबर में डाले पांव मगर , ये गड्डी गिनने बैठे हैं !

    जनसेवा लक्ष्मी सेवा में , ढेर लगाया लक्ष्मी का
    लक्ष्मी के संग नाच रहे , ता थैया करने बैठे हैं !

No comments:

Post a Comment