Saturday, 2 November 2013

ये दीप कहाँ रखूं ?............हर दिन जीवन में है दिवाली...................110913

कैसी अधूरी यह दीवाली
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जो बसते परदेसों में हैं
घर उनके आज हैं खाली
धनतेरस, दिवाली पर,
सबकी रातें बस हैं काली

घर आँगन तुम्हे बुलाता है
दिल मिलने को कर जाता है
माँ जाये अपनों की चिंता में
दिल माँ का रो-रो भर आता है

दिल को कितना समझती है
पर चिंता से मुक्ति ना पाती है
वो अपने आँचल के पंखे से
नयनो के आंसू सुखाती है

तू भी कितना खुदगर्ज़ हुआ
पैसों की खातिर खर्च हुआ
अपनों का दिल दुखाने का
तुझको ये कैसा मर्ज़ हुआ

दिल तो तेरा भी करता है
वापस जाने को मरता है
क्यों व्यर्थ तू चिंता करता है
मजबूरी की आहें भरता है

अब दिवाली के धमाको में
एक सन्नाटा सा परस्ता है
कैसे कहे दिल उसका भी
मिलने को बिलखता है

आँखें नम हैं यह सुबह से
हाथ भी दोनों हैं खाली
घर से दूर इस जीवन की
कैसी अधूरी यह दिवाली

माँ, मेरा आँगन भी सूना है
आँखों में मेरे भी है लाली
बस हाथ तेरा सर पर है तो
हर दिन जीवन में है दिवाली

---तुषार राज रस्तोगी---
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एक पतंगा
जो एक दीपक
के चारों ओर
मंडराता है रात भर
और अंत में
मर जाता है
उसी में, जल कर
पर नहीं लौटता है
वापस अँधेरे की ओर
चुप-चाप
दे जाता है
एक संदेश
बिन मचाए शोर
मौत का भी
डर नहीं है
सत्य, ज्ञान की खोज में
जीवित होकर भी
मुर्दा हैं, जो
हैं अज्ञान के बोझ में
तम से ज्योत की यात्रा
सचमुच ही निराली है
ज्ञान-रूपी प्रकाश को
वरण करने का
नाम ही तो
दिवाली है।
..................संजय पाण्डेय
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ये दीप कहाँ रखूं ?
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आज छोटी दिवाली हैं
कल दिवाली हैं
जगमग हैं घर,गली, कुंचा और मेरा गाँव
भर आई हैं दीपों की थाली
हर रंग और रूप से सजे हैं दीप
कुछ मेरी भावना से
कुछ मेरी कामना से
कुछ मेरी माँ के स्नेह से जले
उन्हें रख लिया मैने आस्था के द्वार पर
कुछ पिता के आशीष से सने
उन्हें रख लिया मैंने विश्वास के द्वार पर
कुछ मेरी संतान के सम्मान से जमे हुए
जिन्हें मैंने रख दिया आत्मविश्वास के द्वार पर
कुछ एक भार्या के प्रेम से भरे-भरे
जिन्हें रख लिया मैंने ह्रदय के द्वार पर
कुछ दीप अभी शेष हैं मेरे संबंधो के
स्वयं के स्वयं से ----
स्वयं के जगत के ----
उनके और अपने----
जिन्हें मैं घर की देहरी पर रखना चाहता हूँ
फिर आप ही बताओं
कि ये दीप मैं कहाँ रखूं ?.............

रामकिशोर उपाध्याय
 

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