Wednesday, 16 October 2013

ईद उल ज़ुहा (बकरीद)...........................106313

ईद उल ज़ुहा (बकरीद)

ईद उल ज़ुहा अथवा ईद-उल-अज़हा इस्लामी कैलेण्डर (हिजरी) के आख़िरी महीने अर्थात ज़िलहिज्ज की 10 तारीख़ को मनाई जाती है। ईद उल ज़ुहा को 'बकरीद' भी कहा जाता है। ईद-उल-फ़ितर की तरह ही इस दिन भी मुसलमान ईदग़ाह जाकर ईद की नमाज़ अदा करते हैं और सब लोगों से गले मिलते हैं। इसके बाद किसी हलाल जानवर ऊँट, भेड़, बकरा आदि की क़ुर्बानी देते हैं। इसी अवसर पर पवित्र शहर मक्का में हज़रत इब्राहीम, हज़रत इस्माईल और हज़रत इब्राहीम की पत्नी व हज़रत इस्माईल की मां हज़रत हाज़रा की सुन्नतों को अदा करते हैं। हज़ का मुख्य कार्यक्रम ज़िलहिज्ज की 8 तारीख़ से शुरू होकर पाँच दिन अर्थात 12 ज़िलहिज्ज तक चलता है, जिसमें 10 ज़िलहिज्ज को क़ुर्बानी भी शामिल है।
आदिकाल से ही जब ईश्वर ने इस सृष्टि की रचना की तो इन्सान को सही जीवन जीने के लिए अपने पसंदीदा बंदों या नबियों के द्वारा ऐसा संविधान और जीवन दर्शन भी भेजा, जो मानव समाज को क़ुर्बानी अर्थात बलिदान का महत्त्व समझा सके और उसमें यह भावना भी पैदा कर सके। इस संविधान के आदम से लेकर तमाम नबी अपने साथ लाये। इस संविधान या जीवन दर्शन में अन्य बातों के अलावा इन्सान को अपने अहंकार व अपनी प्रिय वस्तुओं को अल्लाह की राह में और उसकी इच्छा के लिए क़ुर्बान करने की भी शिक्षा दी गई।

मान्यता

ईद-अल-अज़हा या ईदे क़ुर्बां एक बड़ी क़ुर्बानी की यादगार के रूप में मनाई जाती है। हज़रत इब्राहीम एक पैग़म्बर थे। उन्हें अल्लाह का आदेश हुआ कि अपने प्रिय पुत्र इस्माईल को हमारी राह में क़ुर्बान कर दो। इब्राहीम ने अपने बेटे इस्माईल को इस बारे में बताया तो उन्होंने भी ख़ुदा की बन्दग़ी के सामने सर झुकाते हुए पिता इब्राहीम को इस पर सहमति दे दी। हज़रत इब्राहीम इस्माईल को मीना के मैदान में ले गये। बेटे को ज़मीन पर लिटाया, अपनी आँखों पर पट्टी बाँधी, ताकि प्रिय बेटे के क़ुर्बान होने का मंज़र न देख सके और बेटे की गर्दन पर छुरी फेर दी। इस बात का उल्लेख क़ुरआन ने इन शब्दों में किया है कि इब्राहीम ने इस्माईल के होशियार होने के बाद उन्हें राहे ख़ुदा में क़ुर्बान करने के लिए उनके गले पर छुरी फेर दी। लेकिन अल्लाह को इब्राहीम के बन्दग़ी की यह अदा इतनी पंसद आई कि इस्माईल को उस जगह से हटाकर स्वर्ग से एक दुम्बा (भेड़) को उसके स्थान पर भेज दिया गया और इस्माईल को बचा लिया गया। केवल यही नहीं इब्राहीम की इस क़ुर्बानी को महत्त्व दिया गया कि हर साल इस दिन किसी जानवर की क़ुर्बानी को तमाम लोगों पर फ़र्ज़ ठहरा कर इसे एक इबादत का दर्जा दे दिया गया। यही नहीं बल्कि जिस जगह अर्थात् मीना के मैदान में यह क़ुर्बानी दी गई, उस मैदान को भी इस तरह यादगार बना दिया गया कि हर वर्ष हज के अवसर पर हाज़ी वहाँ पर उपस्थित होकर क़ुर्बानी व हज़रत इब्राहीम के द्वारा क़ुर्बानी के दौरान अपनाये गये कुछ अमल (मानसिक) को अदा करते हैं।

क़ुर्बानी का महत्त्व

क़ुर्बानी का महत्त्व यह है कि इन्सान ईश्वर या अल्लाह से असीम लगाव व प्रेम का इज़हार करे और उसके प्रेम को दुनिया की वस्तु या इन्सान से ऊपर रखे। इसके लिए वह अपनी प्रिय से प्रिय वस्तु को क़ुर्बान करने की भावना रखे। क़ुर्बानी के समय मन में यह भावना होनी चाहिए कि हम पूरी विनम्रता और आज्ञाकारिता से इस बात को स्वीकार करते हैं कि अल्लाह के लिए ही सब कुछ है।
वही आसमान और ज़मीन का पैदा करने वाला, वही सबसे बड़ा हाक़िम और पालनहार है, उसी के क़ब्ज़े में सब कुछ है, हम उसी के आदेशों व आज्ञा का पालन करते हैं और हमारा मरना व जीना सब कुछ अल्लाह के लिए ही है।
इसीलिए इस सम्बन्ध में क़ुरआन में कहा गया है कि- 'न उनके (अर्थात् क़ुर्बानी के लिए जानवरों के) ग़ोश्त अल्लाह को पहुँचते हैं, न ख़ून, मगर (अल्लाह के पास) तुम्हारा तक़बा (मानसिक पवित्रता) पहुँचता है। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि अल्लाह के पास केवल इन्सान के दिल की कैफ़ियत पहुँचती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि जब इन्सान का हृदय पवित्र हो जाएगा और अल्लाह के लिए उसका पूर्ण समर्पण होगा तो इसका प्रभाव उसके पूरे जीवन और समाज पर भी पड़ेगा। वह हर बुरे काम से और मानवता के विरुद्ध कोई भी काम करने से बचेगा। अल्लाह को ख़ुश रखने के लिए लोगों के साथ में भलाई करेगा। दयावान बनेगा, और इस तरह एक सभ्य और आध्यात्मिकता से पूर्ण समाज के निर्माण में सहायक सिद्ध होगा।

क़ुर्बानी का उद्देश्य

ईदे क़ुर्बां अर्थात् ईद-उल-अज़हा पर क़ुर्बानी का एक उद्देश्य ग़रीबों को भी अपनी ख़ुशियों में भागीदार बनाना है। इसीलिए कहा गया है कि क़ुर्बानी के ग़ोश्त को तीन हिस्सों में बाँटों। एक हिस्सा अपने लिए, दूसरा अपने पड़ोसियों के लिए और तीसरा ग़रीबों व यतीमों के लिए रखो। यह भी कहा गया है कि ग़रीबों तक उनका हिस्सा स्वयं ही पहुँचाओ। अर्थात उन्हें मांगने के लिए तुम्हारे दरवाज़े तक न आना पड़े। वास्तव में इस हुक़्म या निर्देश का उद्देश्य समाज में समानता की भावना स्थापित करना और पड़ोसियों व ग़रीबों को भी अपनी ख़ुशियों में शामिल करना है। दयालुता और ग़रीबों के लिए चिंता या उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखना भी इसका एक उद्देश्य है। यह बात स्पष्ट है कि किसी अच्छे समाज के निर्माण में बलिदान और समर्पण की भावना का विशेष योगदान होता है। इससे समाज में एकता व भाईचारे का प्रचार-प्रसार होता है और वह समाज प्रगति करता है।
ईदे क़ुर्बां में किसी जानवर की क़ुर्बानी वास्तव में इस समर्पण और बलिदान की भावना का ही प्रतीक है। यह किसी बड़े सामूहिक और सामाजिक हित के लिए निजी स्तर के छोटे हितों को छोड़ देने, क़ुर्बान कर देने और सब कुछ उस अल्लाह या ईश्वर की इच्छा पर न्यौछावर कर देने का संदेश है, जो पूरे समाज का पालनहार है और जो छोटे हितों के सामने पूरे समाज और मानवता के हितों को ही सर्वोपरी देखना चाहता है। ईदे क़ुर्बां का उद्देश्य इन्सान को मांसाहारी बनाना नहीं, बल्कि उसे समाज के बड़े हितों के लिए छोटे हितों को क़ुर्बानी कर देने की भावना देना है।
आज का पर्व :: ईद उल ज़ुहा (बकरीद)

ईद उल ज़ुहा अथवा ईद-उल-अज़हा इस्लामी कैलेण्डर (हिजरी) के आख़िरी महीने अर्थात ज़िलहिज्ज की 10 तारीख़ को मनाई जाती है। ईद उल ज़ुहा को 'बकरीद' भी कहा जाता है। ईद-उल-फ़ितर की तरह ही इस दिन भी मुसलमान ईदग़ाह जाकर ईद की नमाज़ अदा करते हैं और सब लोगों से गले मिलते हैं। इसके बाद किसी हलाल जानवर ऊँट, भेड़, बकरा आदि की क़ुर्बानी देते हैं। इसी अवसर पर पवित्र शहर मक्का में हज़रत इब्राहीम, हज़रत इस्माईल और हज़रत इब्राहीम की पत्नी व हज़रत इस्माईल की मां हज़रत हाज़रा की सुन्नतों को अदा करते हैं। हज़ का मुख्य कार्यक्रम ज़िलहिज्ज की 8 तारीख़ से शुरू होकर पाँच दिन अर्थात 12 ज़िलहिज्ज तक चलता है, जिसमें 10 ज़िलहिज्ज को क़ुर्बानी भी शामिल है।
आदिकाल से ही जब ईश्वर ने इस सृष्टि की रचना की तो इन्सान को सही जीवन जीने के लिए अपने पसंदीदा बंदों या नबियों के द्वारा ऐसा संविधान और जीवन दर्शन भी भेजा, जो मानव समाज को क़ुर्बानी अर्थात बलिदान का महत्त्व समझा सके और उसमें यह भावना भी पैदा कर सके। इस संविधान के आदम से लेकर तमाम नबी अपने साथ लाये। इस संविधान या जीवन दर्शन में अन्य बातों के अलावा इन्सान को अपने अहंकार व अपनी प्रिय वस्तुओं को अल्लाह की राह में और उसकी इच्छा के लिए क़ुर्बान करने की भी शिक्षा दी गई।

मान्यता

ईद-अल-अज़हा या ईदे क़ुर्बां एक बड़ी क़ुर्बानी की यादगार के रूप में मनाई जाती है। हज़रत इब्राहीम एक पैग़म्बर थे। उन्हें अल्लाह का आदेश हुआ कि अपने प्रिय पुत्र इस्माईल को हमारी राह में क़ुर्बान कर दो। इब्राहीम ने अपने बेटे इस्माईल को इस बारे में बताया तो उन्होंने भी ख़ुदा की बन्दग़ी के सामने सर झुकाते हुए पिता इब्राहीम को इस पर सहमति दे दी। हज़रत इब्राहीम इस्माईल को मीना के मैदान में ले गये। बेटे को ज़मीन पर लिटाया, अपनी आँखों पर पट्टी बाँधी, ताकि प्रिय बेटे के क़ुर्बान होने का मंज़र न देख सके और बेटे की गर्दन पर छुरी फेर दी। इस बात का उल्लेख क़ुरआन ने इन शब्दों में किया है कि इब्राहीम ने इस्माईल के होशियार होने के बाद उन्हें राहे ख़ुदा में क़ुर्बान करने के लिए उनके गले पर छुरी फेर दी। लेकिन अल्लाह को इब्राहीम के बन्दग़ी की यह अदा इतनी पंसद आई कि इस्माईल को उस जगह से हटाकर स्वर्ग से एक दुम्बा (भेड़) को उसके स्थान पर भेज दिया गया और इस्माईल को बचा लिया गया। केवल यही नहीं इब्राहीम की इस क़ुर्बानी को महत्त्व दिया गया कि हर साल इस दिन किसी जानवर की क़ुर्बानी को तमाम लोगों पर फ़र्ज़ ठहरा कर इसे एक इबादत का दर्जा दे दिया गया। यही नहीं बल्कि जिस जगह अर्थात् मीना के मैदान में यह क़ुर्बानी दी गई, उस मैदान को भी इस तरह यादगार बना दिया गया कि हर वर्ष हज के अवसर पर हाज़ी वहाँ पर उपस्थित होकर क़ुर्बानी व हज़रत इब्राहीम के द्वारा क़ुर्बानी के दौरान अपनाये गये कुछ अमल (मानसिक) को अदा करते हैं।

क़ुर्बानी का महत्त्व

क़ुर्बानी का महत्त्व यह है कि इन्सान ईश्वर या अल्लाह से असीम लगाव व प्रेम का इज़हार करे और उसके प्रेम को दुनिया की वस्तु या इन्सान से ऊपर रखे। इसके लिए वह अपनी प्रिय से प्रिय वस्तु को क़ुर्बान करने की भावना रखे। क़ुर्बानी के समय मन में यह भावना होनी चाहिए कि हम पूरी विनम्रता और आज्ञाकारिता से इस बात को स्वीकार करते हैं कि अल्लाह के लिए ही सब कुछ है।
वही आसमान और ज़मीन का पैदा करने वाला, वही सबसे बड़ा हाक़िम और पालनहार है, उसी के क़ब्ज़े में सब कुछ है, हम उसी के आदेशों व आज्ञा का पालन करते हैं और हमारा मरना व जीना सब कुछ अल्लाह के लिए ही है।
इसीलिए इस सम्बन्ध में क़ुरआन में कहा गया है कि- 'न उनके (अर्थात् क़ुर्बानी के लिए जानवरों के) ग़ोश्त अल्लाह को पहुँचते हैं, न ख़ून, मगर (अल्लाह के पास) तुम्हारा तक़बा (मानसिक पवित्रता) पहुँचता है। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि अल्लाह के पास केवल इन्सान के दिल की कैफ़ियत पहुँचती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि जब इन्सान का हृदय पवित्र हो जाएगा और अल्लाह के लिए उसका पूर्ण समर्पण होगा तो इसका प्रभाव उसके पूरे जीवन और समाज पर भी पड़ेगा। वह हर बुरे काम से और मानवता के विरुद्ध कोई भी काम करने से बचेगा। अल्लाह को ख़ुश रखने के लिए लोगों के साथ में भलाई करेगा। दयावान बनेगा, और इस तरह एक सभ्य और आध्यात्मिकता से पूर्ण समाज के निर्माण में सहायक सिद्ध होगा।

क़ुर्बानी का उद्देश्य

ईदे क़ुर्बां अर्थात् ईद-उल-अज़हा पर क़ुर्बानी का एक उद्देश्य ग़रीबों को भी अपनी ख़ुशियों में भागीदार बनाना है। इसीलिए कहा गया है कि क़ुर्बानी के ग़ोश्त को तीन हिस्सों में बाँटों। एक हिस्सा अपने लिए, दूसरा अपने पड़ोसियों के लिए और तीसरा ग़रीबों व यतीमों के लिए रखो। यह भी कहा गया है कि ग़रीबों तक उनका हिस्सा स्वयं ही पहुँचाओ। अर्थात उन्हें मांगने के लिए तुम्हारे दरवाज़े तक न आना पड़े। वास्तव में इस हुक़्म या निर्देश का उद्देश्य समाज में समानता की भावना स्थापित करना और पड़ोसियों व ग़रीबों को भी अपनी ख़ुशियों में शामिल करना है। दयालुता और ग़रीबों के लिए चिंता या उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखना भी इसका एक उद्देश्य है। यह बात स्पष्ट है कि किसी अच्छे समाज के निर्माण में बलिदान और समर्पण की भावना का विशेष योगदान होता है। इससे समाज में एकता व भाईचारे का प्रचार-प्रसार होता है और वह समाज प्रगति करता है।
ईदे क़ुर्बां में किसी जानवर की क़ुर्बानी वास्तव में इस समर्पण और बलिदान की भावना का ही प्रतीक है। यह किसी बड़े सामूहिक और सामाजिक हित के लिए निजी स्तर के छोटे हितों को छोड़ देने, क़ुर्बान कर देने और सब कुछ उस अल्लाह या ईश्वर की इच्छा पर न्यौछावर कर देने का संदेश है, जो पूरे समाज का पालनहार है और जो छोटे हितों के सामने पूरे समाज और मानवता के हितों को ही सर्वोपरी देखना चाहता है। ईदे क़ुर्बां का उद्देश्य इन्सान को मांसाहारी बनाना नहीं, बल्कि उसे समाज के बड़े हितों के लिए छोटे हितों को क़ुर्बानी कर देने की भावना देना है।

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