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Friday, 4 October 2013

क्या इच्छा शक्ति से मन को वश में नहीं ला सकते ? ......................103213

राजा परीक्षित ने एक बार वेदव्यास से प्रश्न किया कि क्या मेरे पूर्वज इतने कमज़ोर थे कि मन को वश में नहीं कर सके | वेदव्यास बोले कि राजा ! मन बड़ा ज़बरदस्त है | राजा परीक्षित ने कहा कि क्या इच्छा शक्ति से मन को वश में नहीं ला सकते ? वेदव्यास ने कहा कि कदापि नहीं | परीक्षित को इस पर विश्वास नहीं हुआ | यह देख कर वेदव्यास ने कहा, " अच्छा मैं तुझे पहले से ही बता देता हूँ कि आज से तीन महीने बाद तेरे पास एक सौदागर घोडा लेकर आएगा, उसको न खरीदना | अगर खरीद भी लो तो उस पर सवारी न करना | अगर सवार हो भी जाओ तो पूर्व दिशा की और मत जाना | अगर पूर्व दिशा की ओर चले भी गए तो तो तुझे एक औरत मिलेगी; उस औरत से बात मत करना; अगर बात कर भी लो तो उसे घर मत लाना; अगर घर ले भी आये तो उससे शादी मत करना | अगर शादी भी कर लो तो उसका कहना मत मानना | अच्छा जा ! अब तू इसका इलाज कर ले |"

 

तीन महीने बाद एक सौदागर घोडा लाया | ऐसा अच्छा घोडा किसी ने भी नहीं देखा था | मंत्रियों ने तारीफ की और सलाह दी कि महाराज घोडा खरीद लो, सवारी न करना | बाहर के राजा आकर देखेंगे और इससे राज्य की शान बढती है | ऐसे घोड़े तबेले का श्रृंगार होते हैं | राज ने खरीद लिया | कुछ दिन बाद साईस ने तारीफ की कि महाराज ये घोडा तो हीरा है, कोई ऐब नहीं है, आपकी सवारी के लायक है | राजा ने मन में कहा, "चलो सवार हो जाते हैं, पूर्व दिशा में नहीं जायेंगे | जब सवार होकर निकला तो घोडा मुहँ जोर होकर पूर्व दिशा की और जंगल में निकल पडा | आगे जंगल में एक बड़ी सुंदर औरत बैठी रो रही थी | राजा ने घोड़े से नीचे उतर कर उससे रोने का कारन पूछा तो कहने लगी, "मेरे रिश्तेदार मुझ से बिछड़ गए हैं | जंगल में अकेली हूँ | मुझे अपने साथ ले चलो |" राजा ने उसे ले जाने से मना कर दिया | बोली, "यहाँ जंगल में मुझे जंगली जानवर खा जायेंगे, आपको पाप लगेगा |" अब राजा ने सोचा के अच्छा घर ले चलते हैं, इसके साथ शादी नहीं करेंगे | जब घर ले आया तो कुछ दिनों के बाद लोगों ने बड़ी तारीफ की कि बड़ी नेक है, सुशील है , आपके लायक है | राजा ने शादी कर ली | अब राजा इसके मायाजाल में फँसता चला गया | कहने लगी कि अगर एक भंगी भी शादी करता है तो अपनी बिरादरी को खाना खिलाता है | राज ने पूछा, तू क्या चाहती है ? बोली, "ऋषियों, संतो, मुनियों, नेक पुरुषों को बुला कर खाना खिलाओ |" राजा ने मान लिया और मन ही मन उसकी सोच-समझ पर बड़ा प्रसन्न हुआ |

 

जब सब ऋषि, मुनि और संतजन बैठ गए तो स्त्री ने राजा से कहा, "मैं आपकी अर्धांगिनी हूँ | मैं भी आपके साथ इनकी सेवा करूंगी |" अब ऋषि, मुनि जंगल के रहने वाले थे और कौतुहलवश रानी को देख रहे थे | स्त्री रोटी परोसते-परोसते कहने लगी, यह सारे बदमाश आदमी हैं; और मेरी तरफ गलत नज़र से देख रहे हैं | राजा को क्रोध आ गया, तलवार लेकर उनका क़त्ल करने को दौड़ा | उसी वक़्त वहाँ वेदव्यास जी प्रकट हो गए और बोले, "बता राजा ! तू तो कहता था कि मन को रोका जा सकता है | और अभी मन के वश एक घोर पाप करने जा रहा था |" राजा ने लज्जित होकर अपना सर झुका लिया |
 

मन ने बड़े-बड़े ऋषियों, मुनियों और योगियों की मिटटी पलीत की है | पाराशर, विश्वामित्र, दुर्वासा, श्रृंगी ऋषि और अन्य महात्मा मन के काबू में आकर गिर गये | सिर्फ संत जी मन को काबू में कर पाये हैं | संत कहते हैं कि जो ताकत मन को वश में करती है वह तुम्हारे अन्दर है | जब शरीर के नौ दरवाजों को छोड़कर सच्चे अमृतसर (मानसरोवर) में जाकर अमृत पियोगे तो मन वश में आ जायेगा |
 

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