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Sunday, 18 August 2013

मदन लाल ढींगरा- भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रान्तिकारी............90513

मदन लाल ढींगरा (जन्म- 18 फ़रवरी, 1883; मृत्यु- 17 अगस्त, 1909) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रान्तिकारी थे। स्वतंत्रत भारत के निर्माण के लिए भारत-माता के कितने शूरवीरों ने हंसते-हंसते अपने प्राणों का उत्सर्ग किया था, उन्हीं महान शूरवीरों में ‘अमर शहीद मदन लाल ढींगरा’ का नाम
स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य हैं।

अमर शहीद मदनलाल ढींगरा महान देशभक्त, धर्मनिष्ठ क्रांतिकारी थे- वे भारत माँ की आज़ादी के लिए जीवनपर्यन्त प्रकार के कष्ट सहन किए परन्तु अपने मार्ग से विचलित न हुए और स्वाधीनता प्राप्ति के लिए फांसी पर झूल गए।

जो भरा नहीं है भावों से जिसमें बहती रसधार नहीं
वह हृदय नहीं है पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।

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        मदनलाल ढींगरा  (१८८३ - १७ अगस्त, १९०९) भारतीय स्वतंत्रता संग्रामके क्रांतिकारी सेनानी थे । वे इंग्लैण्डमें अध्ययन कर रहे थे । जहां उन्होने कर्जन वायली नामक एक ब्रिटिश अधिकारी की गोली मारकर हत्या कर दी । यह घटना बीसवीं शताब्दीमें भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलनकी कुछेक प्रथम घटनाओंमेंसे एक है ।

         मदललाल ढींगराका जन्म सन् १८८३ में पंजाबमें एक संपन्न हिंदु परिवारमें हुआ था । उनके पिता सिविल सर्जन थे और अंग्रेजी रंगमें पूरे रंगे हुए थे; परंतु माताजी अत्यन्त धार्मिक एवं भारतीय संस्कारोंसे परिपूर्ण महिला थीं । उनका परिवार अंग्रेजोंका विश्वासपात्र था । जब मदनलालको भारतीय स्वतंत्रता सम्बन्धी क्रान्तिके आरोपमें लाहौरके एक विद्यालयसे निकाल दिया गया, तो परिवारने मदनलालसे नाता तोड लिया । मदनलालको एक क्लर्क रूपमें, एक तांगा-चालकके रूपमें और एक कारखानेमें श्रमिकके रूपमें काम करना पडा । वहां उन्होने एक यूनियन (संघ) बनानेका प्रयास किया; परंतु वहांसे भी उन्हें निकाल दिया गया । कुछ दिन उन्होने मुम्बईमें भी काम किया । अपनी बडे भाईसे विचार विमर्शकर वे सन् १९०६ में उच्च शिक्षाके लिए इंग्लैंड गये जहां युनिवर्सिटी कालेज लंदनमें यांत्रिक प्रौद्योगिकी (Mechanical Engineering) में प्रवेश लिया । इसके लिए उन्हें उनके बडे भाई एवं इंग्लैंडके कुछ राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओंसे आर्थिक सहायता मिली ।


         लंदनमें ढींगरा भारतके प्रख्यात राष्ट्रवादी विनायक दामोदर सावरकर एवं श्यामजी कृष्णवर्माके संपर्कमें आए । वे लोग ढींगराके प्रचण्ड देशभक्तिसे बहुत प्रभावित हुए । मदनलाल उच्च शिक्षण हेतु लंडनमें रहते थे । उस समय सावरकरजी भी वहींपर थे, उस समय सावरकरजीको एक भोजन प्रसंगमें रंगभेदका अनुभव हुआ । उन्हें अंग्रेजोंद्वारा उनके साथ न बैठ अलग टेबलपर बैठनेको कहा गया । ज्वलंत देशाभिमान और अत्यंत स्वाभिमानी सावरकरजीको यह बात सहन नहीं हुई और वह वहांसे बाहर चले गए । उस समय मदनलाल और उनका एक दोस्त वहां उपस्थित था । मदनलाल जीने सावरकरजीको समझानेका प्रयत्न किया कि इस प्रकारके वर्तन की उन्हें आदत डालनी होगी । मदनलाल और सावरकर, यह इनकी प्रथम भेंट थी । 

भारतको स्वतंत्रता मिलनेके लिए देशभक्तोंने अनेक मार्ग ढूंडे । अंग्रेजोंपर दबाव बनानेके लिए क्रांतीकारी मार्गसे देशभक्तोने टक्कर देने हेतु राष्ट्ररक्षा एवं ब्रिटिशोंसे मुक्तताके लिए क्रांतिकारी संगठनोंका उदय हुआ । ऐसा विश्वास किया जाता है कि सावरकरने ही मदनलालको अभिनव भारत मंडलका सदस्य बनवाया और हथियार चलानेका प्रशिक्षण दिया । मदनलाल, इण्डिया हाउसके भी सदस्य थे, जो भारतीय विद्यार्थियोंके राजनैतिक क्रियाकलापोंका केंद्र था । 

ये लोग उस समय खुदीराम बोस, कन्नाई दत्त, सतिन्दर पाल और कांशी राम जैसे क्रान्तिकारियोंको मृत्युदण्ड दिये जानेसे बहुत क्रोधित थे । भारतीयोंके लिए मातृभूमिको देनेके लिए क्या है, तो वह स्वयंका रक्त ही है, ऐसा ढींगराजीका मानना था । 

         मदनलालजीके विचार अत्यंत स्पष्ट थे और वह उतने ही स्पष्टतासे व्यक्त किया करते थे, वे विदेशी शस्त्रास्त्रोंकी साहायतासे दास्यतामें जकडे हुआ राष्ट्रको बचानेके लिए निःशस्त्र होकर रणभूमिमें उतरकर सामना करना कठिन होनेके कारण उन्होंने घात लगाकर हमला किया । ०१ जुलाई सन् १९०९ में लंडनके नेशनल इंडियन असोसिएशनके वार्षिकोत्सवमें  कर्जन आनेवाला है, इस गोपनीय समाचारकी जानकारी मदनलालको हुई ।

         ०१ जुलाई सन् १९०९ की शामको इण्डियन नेशनल एसोशिएशनके वार्षिकोत्सवमें भाग लेनेके लिए भारी संख्यामें भारतीय और अंग्रेज एकत्रित हुए । जब कर्जन वायली (भारत मामलोंके सेक्रेटरी आफ स्टेटके राजनीतिक सलाहकार) अपनी पत्नीके साथ सभाग्रहमें घुसे, ढींगराने उनके चेहरेपर पांच गोलियां दागी; इसमेंसे चार सही निशानेपर लगीं ।

         ढींगराने अपने पिस्तौलसे अपनी हत्या करनी चाही; परंतु उन्हें पकड लिया गया ।

         २३ जुलाईको ढींगराके प्रकरण की सुनवाई पुराने बेली कोर्टमें हुई । उनको मृत्युदण्ड दिया गया और १७ अगस्त सन् १९०९ को फांसी दे दी गयी ।
          इस महान क्रांतिकारीके रक्तसे राष्ट्रभक्तिके बीज उत्पन्न हों यही अत्यंत महत्त्वपूर्ण है ।







 

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