Tuesday, 6 August 2013

ऊदा देवी: साधारण महिला का असाधारण बलिदान.....................85413

ऊदा देवी: साधारण महिला का असाधारण बलिदान
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ऊदा देवी एक दलित महिला थीं जिन्होने १८५७ के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारतीय सिपाहियों की ओर से युद्ध में भाग लिया था। ये अवध के छठे नवाब वाजिद अली शाह के महिला दस्ते की सदस्या थीं। इस दौरान ही लखनऊ की घेराबंदी के समय लगभग २००० भारतीय सिपाहियों के शरणस्थल सिकन्दर बाग़ पर ब्रिटिश फौजों द्वारा चढ़ाई की गयी थी और १६ नवंबर १८५७ को बाग़ में शरण लिये इन २००० भारतीय सिपाहियों का ब्रिटिश फौजों द्वारा जनसंहार कर दिया गया था।

इस लड़ाई के दौरान ऊदा देवी ने पुरुषों के वस्त्र धारण कर स्वयं को एक पुरुष के रूप में तैयार किया था। लड़ाई के समय वो अपने साथ एक बंदूक और कुछ गोला बारूद लेकर एक ऊँचे पेड़ पर चढ़ गयी थीं। उन्होने हमलावर ब्रिटिश सैनिकों को सिकंदर बाग़ में तब तक प्रवेश नहीं करने दिया था जब तक कि उनका गोला बारूद खत्म नहीं हो गया। उन्होंने पेड़ से फायरिंग करते हुए अंग्रेजी सेना को भारी क्षति पहुंचाई।

ऊदा देवी, १६ नवंबर १८५७ को ३२ अंग्रेज़ सैनिकों को मौत के घाट उतारकर वीरगति को प्राप्त हुई थीं। ब्रिटिश सैनिकों ने उन्हें जब वो पेड़ से उतर रही थीं तब गोली मार दी थी। उसके बाद जब ब्रिटिश लोगों ने जब बाग़ में प्रवेश किया, तो उन्होने ऊदा देवी का पूरा शरीर गोलियों से छलनी कर दिया। इस लड़ाई का स्मरण कराती ऊदा देवी की एक मूर्ति सिकन्दर बाग़ परिसर में कुछ ही वर्ष पूर्व स्थापित की गयी है।

ऊदा देवी को इसकी प्रेरणा अपने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पति मक्का पासी से प्राप्त हुई थी। जो १० जून १८५७ को लखनऊ के चिनहट कस्बे के निकट इस्माईलगंज में हेनरी लॉरेंस के नेतृत्व में ईस्ट इंडिया कम्पनी की फौज के खिलाफ विद्रोही सेना की ऐतिहासिक लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हुए थे। इसके प्रतिशोध स्वरूप उन्होंने कानपुर से आयी काल्विन कैम्बेल सेना के ३२ सिपाहियों को मृत्युलोक पहुँचाया। इस लड़ाई में वे खुद भी वीरगति को प्राप्त हुईं। कहा जाता है इस स्तब्ध कर देने वाली वीरता से अभिभूत होकर काल्विन कैम्बेल ने हैट उतारकर शहीद ऊदा देवी को श्रद्धांजलि दी थी।

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