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Monday, 5 August 2013

शिव अभिषेक में बिल्व पत्र का महत्व................... 85213

शिव अभिषेक में बिल्व पत्र का महत्व



पुराणों में श्रावण मास में भगवान आशुतोष की अर्चना को शुभ फलदायी बताया गया है। शिव अभिषेक में नैवेद्य के रूप में बिल्व पत्रों का विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि शिवप्रिय बिल्व साक्षात् महादेव स्वरूप है तथा बिल्व पत्र में तीनों लोक के तीर्थ स्थापित हैं। इस प्रकार बिल्व के दर्शन मात्र से ही उपासक को समस्त तीर्थों के दर्शन का फल प्राप्त हो जाता है तथा शिव अभिषेक में प्रयोग करने से शिवलोक की प्राप्ति होती है। बिल्व की महत्ता का वर्णन करते हुए शिवपुराण में वर्णित है कि बिल्व की जड़ों के समीप शिवलिंग स्थापित करने से उपासक के महापातक भी कट जाते हैं तथा दानादि कर्म से निर्धनता दूर होती है व नियमित रूप से बिल्व पत्रों से भगवान शिव का अभिषेक करने वाला उपासक अंततोगत्वा शिवलोक को प्राप्त होकर शिवमय हो जाता है। लिंगपुराण में वर्णित है कि यदि उपासक को शिव अभिषेक हेतु नूतन बिल्व पत्र की प्राप्ति न हो तो वह अर्पित किये हुए बिल्व पत्र को धोकर शिव अर्चना में प्रयोग करे। इसी में उपासक का कल्याण हो जाता है। इस प्रकार शिवपूजन में बिल्व पत्र की महत्ता स्वयं सिद्ध हो जाती है।
शास्त्रों में बिल्व को अनेक नामों से परिभाषित किया गया है जिनमें शांडिल्य, शिव, शिवप्रिय, पापहन, जय, विजय, विष्णु, त्रिनपत, श्राद्धदेवक आदि मुख्य हैं। तत्वज्ञान की प्राप्ति के लिए उपासक के लिए बिल्व वृक्ष की जड़ के पास दीपक प्रज्वलित करना शुभ बताया गया है। ऐसा माना गया है कि जो व्यक्ति बिल्व वृक्ष का रोपण करता है, उसके कुल में कई पीढिय़ों तक लक्ष्मी निवास करती है। शिव अभिषेक हेतु तीन, पांच, अथवा सात के समूह वाले बिल्व पत्र का प्रयोग कल्याणकारी है। इनमें पांच अथवा सात पत्रों के समूह की विशिष्टता है। उपासक को निम्र मंत्र के साथ बिल्व पत्र तोड़कर भगवान शिव को अर्पित करने चाहिए-

‘अमृतोद्धव श्रीवृक्ष महादेवप्रिय: सदा।
गृहमि तव पत्राणि शिवपूजार्थमादरात्।’

उपासक को चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या, संक्रांति के अलावा सोमवार के दिवस बिल्व पत्रों को नहीं तोडऩा चाहिए। बिल्व न केवल धार्मिक बल्कि औषधीय गुणों से संपन्न होता है। हमारे शास्त्रों में सृष्टि के प्रारंभ से ही पर्यावरण को विशेष महत्व प्रदान किया गया है तथा पीपल, नीम, अशोक, आम, शमी, रुद्राक्ष आदि के पूजन के साथ ही मामूली-सी दुर्वा घास की तुलना भी भगवान राम के वर्ण से करना व इसे मंगलकारी पदार्थों की श्रेणी में रखना यही सिद्ध करता है कि वे लोग न केवल पर्यावरण के प्रति जागरूक थे बल्कि अपने धार्मिक व नैतिक कर्तव्यों को भली -भांति समझते थे। उपासक हेतु शिव अभिषेक में बिल्व पत्र अर्पित करते समय निम्र मंत्र का उच्चारण मंगलमयी व मोक्षकारी है—

‘त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्र च त्रिधायुतम्।त्रिजन्मपापसंहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्।

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