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Thursday, 15 August 2013

स्वतंत्रता की राह पर :: 1850 में ही काशी ने अंग्रेजों को दहलाया !.............89313

स्वतंत्रता की राह पर :: 1850 में ही काशी ने अंग्रेजों को दहलाया !
- आजादी के दीवानों ने बारूद भरे पीपे में किया था विस्फोट
- पंडित लोकनाथ चतुर्वेदी ने बाकायदा लिख डाली पीपा बावनी

प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत भले ही संगठित तौर पर 1857 में हुई लेकिन इससे पहले देश में आजादी के दीवानों ने अलग-अलग बिगुल फूंकने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सही मायने में देखा जाए तो स्वातंत्र्य समर की पृष्ठभूमि काशी में तैयार हुई थी। काशी के महाराज ईश्वरीनारायण सिंह के शासनकाल (1835-1889 ई) में पीपा विस्फोट हुआ जिससे अंग्रेजों को काफी क्षति पहुंची। ब्रितानी हुकूमत इस विस्फोट से हिल गई थी। वाकया संवत 1907 वैशाख कृष्ण पांच बुधवार (1850) रात डेढ़ बजे का है। नाव पर लदे बारूद के पीपे अचानक फट गए। उन दिनों अंग्रेजी फौज की छावनी राजघाट के समीप थी। गंगा के उस पार से यातायात के लिए नावों का ही इस्तेमाल होता था। बारूद कंपनी सरकार की थी। भीषण विस्फोट से काशी के हजारों मकान भी दहल गए थे। सही मायने में बनारस में अंग्रेजों का विरोध प्रथम स्वाधीनता आंदोलन के भी पहले शुरू हो चुका था। अंग्रेजों द्वारा कैदियों को ईसाई बनाए जाने और अंग्रेजी रोटी जबरदस्ती खिलाए जाने के विरोध में भोसला घाट पर नगर के लोगों की सभा हुई थी। इसी के बाद काशी की प्रसिद्ध ‘गौरय्याशाही क्रांति’ हुई जब नाटी इमली में अंग्रेज गाबिंस और उसके साथ के लोगों को गौरय्यों (तंबाकू पीने वाली मिट्टी की चिलम) से मार-मारकर जनता ने भगाया था। 1850 का पीपा विस्फोट उस दौर की सबसे बड़ घटना थी। काशी में पीपा फटने की आवाज चकिया तक सुनाई पड़ी थी। कई सैनिक मरे थे और मकान ढहने से मलबे में दब गए थे। उस समय की भयानक स्थिति का वर्णन पंडित लोकनाथ चतुर्वेदी ने 52 पदों में किया था जो रचना ‘पीपा बावनी’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस रचना के दुर्लभ पदों में से कुछ इस प्रकार है..
‘संवत उन्नसी सत सात में की बात यह, अधिक वैशाख पारव अति अंधियारे में।
बुध पंचमी को जब बीति डेढ़ जाय राता, महा उतपात भयो काशीपुर सारे में।
नावन में कंपनी की मेगनीज पीन भरी, लागी है विचार राजघाट के किनारे में।
कहैं नाथ एक साथ दैव जोग जागि आगि, पीपा उड्यौ वहां एक भभकारे में।।’

~ राकेश पाण्डेय (बीएचयू हिंदी विभाग द्वारा प्रकाशित ‘काशिका’ शोध पत्रिका के अंक छह से साभार)
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