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Monday, 29 July 2013

शहीद भगत सिंह केआखिरी साढ़े तीन घंटे.......................81313



शहीद भगत सिंह केआखिरी साढ़े तीन घंटे
23 मार्च का दिन उन आम दिनों की तरह
ही शुरू
हुआ
जब सुबह के समय राजनीतिक
बंदियों को उनके
बैरक
से बाहर निकाला जाता था। आम तौर
पर वे दिन
भर बाहर रहते थे और सूरज ढलने के बाद
वापस
अपने
बैरकों मेंचले जाते थे। लेकिन आज वार्डन
चरत
सिंह
शाम करीब चार बजे
ही सभी कैदियों को अंदर
जाने
को कह रहा था। सभी हैरान थे, आज
इतनी जल्दी क्यों। पहले तो वार्डन
की डांट के
बावजूद सूर्यास्त के काफी देर बाद तक वे
बाहर
रहते
थे। लेकिन आज वह आवाज काफी कठोर और
दृढ़
थी।
उन्होंने यह नहीं बताया किक्यों? बस
इतना कहा,
ऊपर से ऑर्डर है।
चरत सिंह द्वारा क्रांतिकारियों के
प्रति नरमी और
माता-पिता की तरह देखभाल उन्हें दिल
तक छू
गई
थी। वे सभी उसकी इज्जत करते थे।
इसलिए
बिना किसी बहस के सभी आम दिनों से
चार घंटे
पहले
ही अपने-अपने बैरकों में चले गए। लेकिन
सभी कौतूहल
से सलाखों के पीछे से झांक रहे थे।
तभी उन्होंने
देखा बरकत नाई एक के बाद कोठरियों में
जा रहा था और बता रहा था कि आज
भगत सिंह,
राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर
चढ़ा दिया जाएगा।
हमेशा की तरह मुस्कुराने वाला बरकत आज
काफी उदास था। सभी कैदी खामोश थे,
कोई
कुछ
भी बात नहीं कर पा रहा था।
सभी अपनी कोठरियों के
बाहर से जाते रास्ते की ओर देख रहे थे। वे
उम्मीद
कर रहे थे कि शायद इसी रास्ते से भगत
सिंह
और
उनके साथी गुजरेंगे।
फांसी के दो घंटे पहले भगत सिंह के वकील
मेहता को उनसे मिलने की इजाजत मिल
गई।
उन्होंने
अपने मुवक्किल की आखिरी इच्छा जानने
की दरखास्त
की थी और उसे मान लिया गया।भगत
सिंह
अपनी कोठरी में ऐसे आगे-पीछे घूम रहे थे
जैसे
कि पिंजरे में कोई शेर घूम रहा हो।
उन्होंने
मेहता का मुस्कुराहट के साथ स्वागत
किया और
उनसे
पूछा कि क्या वे उनके लिए
'दि रेवोल्यूशनरी लेनिन'
नाम की किताब लाए हैं। भगत सिंह ने
मेहता से
इस
किताब को लाने का अनुरोध किया था।
जब
मेहता ने
उन्हें किताब दी, वे बहुत खुश हुए और तुरंत
पढ़ना शुरूकर दिया, जैसे कि उन्हें मालूम
था कि उनके
पास वक्त ज्यादा नहीं है। मेहता ने उनसे
पूछा कि क्या वे देश को कोईसंदेश
देना चाहेंगे,
अपनी निगाहें किताब से बिना हटाए
भगत सिंह ने
कहा,
मेरे दो नारे उन तक पहुंचाएं..इंकलाब
जिंदाबाद,
साम्राज्यवाद मुर्दाबाद। मेहता ने भगत
सिंह से
पूछा आज तुम कैसे हो? उन्होंने कहा,
हमेशा की तरह
खुश हूं। मेहता ने फिर पूछा, तुम्हें
किसी चीज
की इच्छा है? भगत सिंह ने कहा, हां मैं
दुबारा इस
देश
में पैदा होना चाहता हूं
ताकि इसकी सेवा कर
सकूं।
भगत ने कहा, पंडित नेहरू औरसुभाष चंद्र
बोस
ने
जो रुचि उनके मुकदमे में दिखाई उसके लिए
दोनों का धन्यवाद करें।
मेहता के जाने के तुरंत बाद
अधिकारियों ने भगत
सिंह
और उनके साथियों को बताया कि उन्हें
फांसी का समय 11 घंटाघटाकरकल सुबह
छह
बजे
की बजाए आज साम सात बजे कर
दिया गया है।
भगत सिंह ने मुश्किलसे किताब के कुछ पन्ने
ही पढ़े
थे। उन्होंने कहा, क्याआप मुझे एक अध्याय
पढ़ने
का भी वक्त नहीं देंगे? बदले में
अधिकारी ने उनसे
फांसी के तख्ते की तरफ चलने को कहा।
एक-एक
करके
तीनों का वजन किया गया। फिर वे
नहाए और
कपड़े
पहने। वार्डन चतर सिंह ने भगत सिंह के
कान में
कहा,
वाहे गुरु से प्रार्थनाकर ले। वे हंसे और
कहा,
मैंनेपूरी जिंदगी में भगवान को कभी याद
नहीं किया,
बल्कि दुखों और गरीबों की वजह से
कोसा जरूर
हूं।
अगर अब मैं उनसे माफी मांगूगा तो वे कहेंगे
कि यह
डरपोक है जो माफी चाहता है
क्योंकि इसका अंत
करीब आ गया है।
तीनों के हाथ बंधे थे और वेसंतरियों के
पीछे
एक-
दूसरे से ठिठोली करते हुए सूली की तरफ
बढ़ रहे
थे।
उन्होंने फिर गाना शुरू कर
दिया-'कभी वो दिन
भी आएगा कि जब आजाद हमहोंगे, ये
अपनी ही जमीं होगी ये
अपना आसमां होगा।
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन
पर
मिटने वालों का बाकी यही नाम-ओ-
निशां होगा।'
जेल की घड़ी में साढ़े छह बजरहे थे।
कैदियों ने
थोड़ी दूरी पर, भारी जूतों की आवाज और
जाने-
पहचाने
गीत, 'सरफरोशी की तमन्ना अब
हमारेदिल में है'
की आवाज सुनी। उन्होंने एकऔर गीत
गाना शुरू
कर
दिया, 'माई रंग दे मेरा बसंती चोला' और
इसके
बाद
वहां 'इंकलाब जिंदाबाद' और 'हिंदुस्तान
आजाद
हो' के
नारे लगने लगे। सभी कैदी भी जोर-जोर से
नारे
लगाने
लगे।
तीनों को फांसी के तख्ते तक ले
जाया गया। भगत
सिंह बीच में थे। तीनों से
आखिरी इच्छा पूछी गई
तो भगत सिंह ने कहा वे आखिरी बार
दोनों साथियों से
गले लगना चाहते हैं और ऐसा ही हुआ। फिर
तीनों ने
रस्सी को चूमा और अपने गले में खुद पहन
लिए।
फिर
उनके हाथ-पैर बांध दिए गए। जल्लाद ने
ठीक
शाम
7:33 बजे रस्सी खींच दी और उनके पैरों के
नीचे से
तख्ती हटा दी गई। उनके दुर्बल शरीर
काफी देर
तक
सूली पर लटकते रहे फिर उन्हें नीचे
उतारा और
जांच के
बाद डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर
दिया।
सब कुछ शांत हो चुका था। फांसी के बाद
चरत
सिंह
वार्डकी तरफ आया और फूट-फूट कर रोने
लगा।
उसने
अपनी तीस सालकी नौकरी में बहुत
सी फांसियां देखी थीं, लेकिन
किसी को भी हंसते-
मुस्करातेसूली पर चढ़ते नहीं देखा था,
जैसा कि उन
तीनों ने किया था।

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