Tuesday, 23 July 2013

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक.....भावभीनी श्रद्धांजलि....................78813


बाल गंगाधर तिलक 


 
उग्र राष्ट्रवाद के जन्मदाता एवं भारत में राष्ट्रीय आन्दोलन को एक नई दिशा देने वाले महान् नेता थे-बालगंगाधर तिलक, जिन्हें श्रद्धा से लोकमान्य कहकर पुकारा जाता है। उन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन को, जो मात्र उदारवादियों तक सीमित था, जनता तक पहुँचा दिया। डॉ. आर.सी. मजूमदार ने लिखा है कि, अपने परिश्रम तथा अथक् प्रयत्नों के परिणामस्वरूप बालगंगाधार तिलक लोकमान्य कहलाए जाने लगे और उनकी एक देवता के समान पूजा होने लगी। वह जहाँ कहीं भी जाते थे, उनका राजकीय स्वागत और सम्मान किया जाता था। उनके द्वारा अभूतपूर्व बलिदानों ने उन्हें पहले महाराष्ट्र का और बाद में सम्पूर्ण भारत का छत्र रहित सम्राट बना दिया था।
संक्षिप्त जीवन परिचय -बालगंगधार तिलक का जन्म 23 जुलाई, 1856 ई. को महाराष्ट्र के रत्नगिरि में एक चितवाहन ब्राह्मण परिवार में हुआ था, जो पेशवाओं से सम्बन्धित था। उनके पिता गंगाधर पन्त आरम्भ में एक अध्यापक थे, किन्तु उन्नति करते-करते सहायक निरीक्षक के पद तक पहुँच गए थे। उनकी माता पार्वती बाई एक धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी। इनके बचपन का नाम बलवन्तराय था, किन्तु इनके माता-पिता स्नेह से इन्हें बाल कहकर पुकारते थे एवं इसी नाम से आगे चलकर वे प्रसिद्ध हुए। जब वे 10 वर्ष के थे, तभी उनकी माता की मृत्यु हो गई।
तिलक एक प्रतिभावान विद्यार्थी थे, जिन्होंने कई बार अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। एक बार अध्यापक ने उनसे किसी प्रश्न का उत्तर पूछा, तो तिलक ने कहा कि इसका उत्तर मेरे मस्तिष्क में है। वस्तुतः बुद्धिमत्ता एवं विलक्षणता में उन्हें नेपोलियन के समकक्ष मानना ही उचित होगा। उन्होंने पूना में एक विद्यालय में प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की। इनके रूढ़िवादी पिता ने 1871 ई. में 15 वर्ष की आयु में इनका विवाह तापीबाई नामक कन्या से करवा दिया। शिक्षा से तिलक का प्रेम इस हद तक था कि उन्होंने दहेज में भी पुस्तकें ही लीं। एक वर्ष बाद उनके पिता की मृत्यु हो गई। 1876 ई. में प्रथम श्रेणी में उन्होंने बी.ए. पास की। कानून की डिग्री के सम्बन्ध में पूछे जाने पर उन्हों कहा कि, मैं अपना जीवन देश के जन-जागरण में लगाना चाहता हूँ और मेरा विचार है कि इस काम के लिए साहित्य अथवा विज्ञान की किसी उपाधि की अपेक्षा कानून का ज्ञान अधिक उपयोगी होगा। मैं एक ऐसे जीवन की कल्पना नहीं कर सकता, जिसमें मुझे ब्रिटिश शासकों से संघर्ष न करना पड़े।
शिक्षा समाप्त होने के बाद तिलक ने एक शिक्षक के रूप में अपने सार्वजनिक जीवन की शुरूआत की। उन्होंने 1 जनवरी, 1880 ई. को अपने मित्र विष्णु शास्त्री की मदद से एक प्राइवेट स्कूल की स्थापना की, जिसका नाम न्यू इंग्लिश स्कूल रखा गया। वे एक महान् पत्रकार भी थे। उन्होंने अपने मित्र चिपलूणकर आगरकर एवं नाम जोशी की मदद से मराठी भाषा में केसरी तथा अंग्रेजी भाषा में मराठा नामक समाचार-पत्रों का प्रकाशन प्रारम्भ किया। इन समाचार-पत्रों में विविध लेखों से सरकार की नीतियों की कटु आलाचना की जाती थी एवं जनतमा में चेतना उत्पन्न करने का प्रयास किया जता था।
महाराष्ट्र में शिक्षा के विकास के उद्देश्य से तिलक ने 1884 ई. में पूना में एक सार्वजनिक सम्मेलन आयोजित किया। उन्होंने शिक्षा की प्राप्ति हेतु दक्षिणी शिक्षा समाज नामक संस्था की स्थापना की। इस संस्था के प्रयत्नों से 2 जनवरी, 1885 ई. को एक कॉलेज की नींव रखी गई, जो फरग्यूसन कॉलेज के नाम से विख्यात हुआ। इससे शिक्षा का बहुत विकास हुआ।
तिलक 1889 ई. में सर्वप्रथम एक जन-प्रतिनिधि के रूप में कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लिया। वे कांग्रेस के काम करने के उदार तथा नम्र तरीकों से सहमत नहीं हुए तथा उन्होंने इसमें परिवर्तन की माँग की। उन्होंने 1893 ई. में गणपति उत्सव तथा 1895 ई. में शिवाजी उत्सव मनाना शुरू किया, ताकि जनता में राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न की जा सके। उन्होंने 1897 ई. में अकाल के समय तथा प्लेग के समय जनता की बहुत सेवा की। उनके द्वार सरकार नीतियों की कड़ी आलनोचा करने के कारण सरकार ने उन पर राजद्रोह का आरोप लगाते हुए 1897 ई. में 18 माह का कारवास दिया।
तिलक ने 1905 में किए गए बंगाल विभाजन का जमकर विरोध किया। वे 1906 ई. के कांग्रेस के अधिवेशन में सम्मिलित हुए तथा उन्होंने अपनी स्वराज्य की मांग को रखा। उन्होंने उदारवाद का विरोध किया, जिसके फलस्वरूप कांग्रेस नरम तथा गरम इन दो दलों में विभक्त हो गई। 1908 ई. में एक लेख में उन्होंने सरकार की नीतियों की कटु आलोचना की, अतः एक बार पुनः ब्रिटिश सरकार ने उन पर राजद्रोह का आरोप लगाते हुए 6 वर्ष कारावास दिया। उन्हें मांडले की जेल में रखा गया। जेल में उन्हें मांडले की जेल में रखा गया। जेल मे उन्होंने दो पुस्तकें लिखीं-(1) आर्किटक होम इन द वेदाज, एवं (2) गीता रहस्य।
1916 ई. में तिलक तथा श्रीमती एनीबेसेण्ट ने मिलकर होमरूप आन्दोलन चलाया, जिसका लक्ष्य भारत के लिए स्वराज्य प्राप्त करना था। वे 1920 ई. तक इस आन्दोलन का नेतृत्व करते रहे। 20 जुलाई, 1920 ई. में बम्बई में उनका देहान्त हो गया था। निश्चित रूप से यह भारतीय राष्ट्रीयता की घातक एवं अपूरणीय क्षति थी।
तिलक के सामाजिक विचार तथा सुधार-
तिलक एक महान् सामाजिक सुधारक भी थे तथा समाज में धीरे-धीरे सुधार लाने के समर्थक थे। उनका मानाना था कि समाज में सुधार कानून के माध्यम से नहीं आ सकते, बल्कि जनता कि इच्छा से ही आ सकते हैं एव जनता में यह इच्छा तभी उत्पन्न हो सकती है, जबकि उसमें इस सम्बन्ध में चेतना उत्पन्न की जाए। जनता की इच्छा से लाए गए ये सुधार स्थायी होंगे, जबकि कानून द्वारा लाए गए सुधार अस्थायी। अतः सरकार द्वारा कानून बनाकर समाज में सुधार करने के प्रयासों का तिलक ने सदैव डटकर विरोध किया। सरकार ने 1891 ई. में विवाह सहमति वय विधेयक पारित किया, जिसके अनुसार ऐसी लड़की, जिसका बचपन में विवाह कर दिया गया हो, वयस्क होने पर इस विवाह को अपनी इच्छा से तोड़ सकती थी। तिलक ने इसे हिन्दुओं के सामाजिक जीवन में सरकार का अनुचित हस्तक्षेप बताते हुए डटकर विरोध किया।
तिलक का मानना था कि नेताओं अथवा समाज सुधारकों द्वारा केवल मात्र उपदेश देने से ही समाज का उद्धार नहीं हो सकता है, बल्कि समाज में सुधार तभी सम्भव है, जबकि पहले वे इन उपदेशों को अपने व्यावहारिक जीवन में लागू करे। तिलक ने जो भी कहा, उसे अपने व्यावहारिक जीवन में भी लागू किया। जैसे उन्होंने अपनी दोनों पुत्रियों के विवाह उनके 16 वर्ष की हो जाने के बाद ही किए। सामाजिक सुधार के लिए तिलक ने निम्नलिखित सुझाव दिए-
1. लड़के का विवाह 20 वर्ष तथा लड़कियों का विवाह 16 वर्ष की आयु के पहले नहीं किया जाना चाहिए।
2. 40 वर्ष के बाद व्यक्ति को विवाह नहीं करना चाहिए। इस आयु के बाद यदि व्यक्ति विवाह करना ही हो, तो केवल विधवा से ही करे।
3. विधावों के मुण्डन की प्रथा को समाप्त कर दिया जाना चाहिए।
4. तिलक ने दहेज प्रथा को भी समाप्त करने पर बल दिया।
5. उन्होंने समाज सुधारकों को अपनी आय का 1/10 भाग समाज सुधार के लिए व्यय करने का परामर्श दिया।
तिलक ने छुआ-छूत एवं भेदभाव का विरोध किया। उनकी धारणा भी थी कि मनुष्य जन्म से नहीं, बल्कि कर्म से महान होता है। 25 मार्च, 1918 ई. को बम्बई में दलित जाति के सम्मेलन में तिलक ने कहा था कि, यदि ईश्वर की अस्पृश्यता को सहन करे, तो मैं उसे भी ईश्वर के रूप में सहन नहीं करूँगा। विभिन्न अवसरों पर निम्न जाति के लोगों के साथ शामिल होकर एवं उनके साथ भाजो करके उन्होंने अपनी इस धारणा को सिद्ध भी कर दिया।
तिलक ने नशाबन्दी के लिए भी सरकार पर दबाव डाला। सरकार की मद्य नीति का विरोध करते हुए तिलक ने कहा था कि, सरकार से ऐसी आशा करना मूर्खता है कि वह मद्यपान को बन्द कर देगी। युवकों को चाहिए कि वे मद्यपान के विरूद्ध अपना विचार प्रकट कर दें। उन्होंने अपने लेखों एवं भाषणों के द्वारा सरकार की इस नीति के विरूद्ध जनता को उकसाया एवं शराब की कई दुकानों पर धरना देकर उन्हें बन्द करवा दिया। इस पर सरकार ने उन्हें बन्दी बना लिया, किन्तु तिकल का संघर्ष जारी रहा।
तिलक ने बाल विवाह, अनमेल विवाह आदि बुराइयों की निन्दा की तथा विधवा विवाह पर बल दिया। उनका मानना था कि समाज सुधारों में महत्त्वपूर्ण देश की राजनीतिक स्वतन्त्रता है एवं देश के स्वतन्त्र होने पर समाज में स्वतः ही सुधार होने लगेंगे।
शिक्षा के क्षेत्र में विचार-
तिलक एक महान् शिक्षक थे तथा शिक्षा के सम्बन्ध में उनके विचार भी बड़े उत्तम थे। वे एक महान् विद्वान थे। तिलक ने तकनीकि तथा प्राविधिक शिक्षा पर जोर दिया। भारत में प्रचलित तत्कालीन शिक्षा प्रणाली की निन्दा करते हुए तिलक ने कहा था कि, यह मात्र छोटे-छोटे कर्मचारियों को पैदा करती है। शिक्षा के सम्बन्ध में उन्होंने कहा था कि पढ़ना-लिखना सीख लेना ही शिक्षा नहीं। शिक्षा वही है, जो हमे जीविकोपार्जय योग्य बनाए। देश का सच्चा नागरिक बनाए, हमे हमारे पूर्वजों का ज्ञान और अनुभव दे।

तिलक ने देश में एकता की भावना उत्पन्न करने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा की आवश्यकता पर बल दिया। इसके लिए उन्होंने महाराष्ट्र में न्यू इंग्लिश स्कूल, दक्षिण शिक्षा समाज, फर्ग्यूसन कॉलेज आदि संस्थाएँ स्थापित की। 1907 ई. महाराष्ट्र में विद्या प्रसारक मण्डल की स्थापना में तिलक का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान रहा था। विद्यार्थियों को धार्मिक शिक्षा दिए जाने की आवश्यकता पर बल देते हुए तिलक ने कहा था कि, किसी को अपने धर्म पर अभिमान कैसे हो सकता है, यदि वह इससे अनभिज्ञ हो। धार्मिक शिक्षा का अभाव ही इस बात का एकमात्र कारण है कि देशभर में मिशनरियों ईसाई पादरियों का प्रभाव बढ़ गया है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण हेतु भी धार्मिक शिक्षा आवश्यक है।
मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने की आवश्यकता पर बल देते हुए तिलक ने कहा था कि, आज जो व्यक्ति अच्छी-अच्छी अंग्रेजी लिख-बोल लेता है, वही शिक्षित माना जाता है, किन्तु किसी भाषा का ज्ञान हो जाना ही सच्ची शिक्षा नहीं है। मातृभाषा के माध्यम से जो शिक्षा 7-8 वर्ष में प्राप्त की जा सकती है, उसमें अब 20-25 वर्ष लग जाते हैं। अंग्रेजी तो हमें सीखना है, पर उसकी शिक्षा अनिवार्य किए जाने का कोई कारण नहीं है।
राष्ट्रीय भाषा के सम्बन्ध में तिलक ने 1905 ई. की नागरी प्रचारिणी सभा के सम्मेलन में कहा था कि, एक लिपि राष्ट्रीय आन्दोलन का अंग है। हमे समस्त भारत के लिए एक ही भाषा बनानी चाहिए। यदि राष्ट्र को संगठित करना है, तो उसके लिए राष्ट्र भाषा से बड़ी शक्ति कोई नहीं हो सकती। उन्होंने हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने पर बल दिया।
साहित्यिक देन -
तिलक एक महान लेखक भी थे। उन्होंने तीन ग्रंथ लिखे- 1. ओरियन,
2. आर्कटिक होम इन द वेदाज, एवं
3. गीता रहस्य।
(1) ओरियन-
इस ग्रन्थ में तिलक ने आर्य सभ्यता का वर्णन करते हुए ज्योतिष सम्बन्धी उद्धरणों तथा वैदिक साहित्य के नक्षत्रों के आधार पर उसका काल 6000 से 4000 ई. पू. तक माना है। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण काल 4000-2500 ई. पू. माना है।
(2) आर्कटिक होम इन वेदाज-
तिलक ने अपनी इस पुस्तक में वेदों, ईरानी ग्रन्थ जिन्द अवेस्ता एवं अन्य विविध प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि आर्य उत्तरी ध्रुव के निवासी थे। उनका यह मत पूर्णतः सत्य न होते हुए भी सम्माननीय है। बोस्ट विश्वविद्यालय के एफ.डब्ल्यू. वारेन ने तिलक के सम्बन्ध में लिखा था कि, एक लेख में तिलक के तर्कों का संक्षिप्त विवरण देना असम्भव है। इतना ही कहना काफी होगा कि मेरे विचार में जितने तर्क और प्रमाण इस पुस्तक में मौजूद है, उतने किसी भी भारतीय एवं ईरानी विद्वान के आज तक अपने निष्कर्यों की पुष्टि में नहीं दिए। पूरी पुस्तक में ऐतिहासिक व वैधानिक अनुसंधान के सिद्धांतों व खोज प्रणालियों का पूरा पालन किया गया है।
(3) गीता रहस्य-
इस ग्रंथ में तिलक ने प्रवृत्तिवाद की व्याख्या की है। इससे पहले हिन्दू समाज में यह धारणा थी कि मानव जीवन का सर्वप्रथम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है एवं मोक्ष प्राप्ति सन्यासी बनने पर ही सम्भव है। अतः लोगों का सांसारिक रूचियों से ध्यान हट रहा था। अतः उन्हें तिलक ने श्रीमद्भागवद्गीता के प्रवृत्तिवाद की नए अर्थों में व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवद्गीता में निवृत्ति (सन्यास) के स्थान पर प्रवृत्ति कर्म पर बल दिया गया है। उन्होंने निष्काम कर्म पर बल देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को सांसारिक जीवन में कर्त्तव्यों का पालन करते हुए धर्मानुसार मोक्ष प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए।
शंकराचार्य तथा ज्ञानेश्वर महात्मा ने श्रीमद्भागवद्गीता पर अपनी जो टीकाएँ लिखीं थीं, उनमें उन्होंने कहा था कि श्रीमद्भागवद्गीता सन्यास पर अधिक बल देती है, किन्तु तिलक ने इस धारणा का खण्ड करते हुए प्रवृत्तिवाद को एक नए अर्थ में जनता के सामने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि अर्जुन युद्ध से विमुख हो चुका था, किन्तु भगवान विष्णु ने उसे कर्त्तव्य का मार्ग दिखलाया, जिसके कारण वह पुनः युद्ध करने को तैयार हो गया। रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है, श्रीमद्भागवद्गीता एक बार तो भगवान श्रीकृष्ण के मुख से कही गई तथा दूसरी बार उसका सच्चा आख्यान लोकमान्य तिलक ने किया है। इन दोनों के बीच की अन्य सारी टीकाएँ तथा व्याख्याएँ श्रीमद्भागवद्गीता के सत्य पर केवल बादल बनकर छाती रही हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता के निष्कर्ष के सम्बन्ध में तिलक ने कहा था कि, श्रीमद्भागवद्गीता का उपदेश है कि ज्ञान तथा भक्ति द्वारा ईश्वर के साथ एकाकार हुए व्यक्ति के लिए भी जगत् में कर्म करते रहना अनिवार्य है। कर्म का सम्पादन ईश्वर द्वारा निर्दिष्ट विकास के पथ पर जगत् को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक है। यह कर्म बिना फल की इच्छा किए तथा ईश्वर के उद्देश्य में सहायक होने की दृष्टि से किया जाना चाहिए। ऐसा करने पर कर्ता कर्मफल के बन्धन से मुक्त रहता है। श्रीमद्भागवद्गीता की यही शिक्षा है। गीता में ज्ञान योग है, भक्ति योग है, किन्तु वे दोनों गौण हैं और कर्मयोग की प्रधानता है। वस्तुतः श्रीमद्भागवद्गीता में ज्ञान योग, कर्म योग एवं भक्ति योग इन तीनों ही योगों का समन्वय है।
तिलक का मानना था कि यद्यपि श्रीमद्भागवद्गीता के अनुसार व्यक्ति ज्ञान व भक्ति योग से भी ईश्वर को प्राप्त कर सकता है, किन्तु फिर भी कर्म की प्रधानता है। श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवद्गीता में कहा है कि, मुझे तीनों लोगों में से कुछ नहीं चाहिए। फिर भी मैं कर्म करता हूँ, क्योंकि यदि में कर्म नहीं करूँगा, तो जगत् नष्ट हो जाएगा। इसके आधार पर तिलक ने कहा कि, यदि मनुष्य ईश्वर को प्राप्त करना चाहता है, तो उसे जगत् के हित को ध्यान में रखते हुए निरन्तर कर्म करते रहना चाहिए। इस प्रकार तिलक ने जनता के समाने कर्म का महत्त्व रखा, ताकि वह देश की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष कर सकें। उनका मानना था कि भारत की स्वतन्त्रता प्राप्ति तथा आधुनिक भारत का निर्माण कर्म के आधार पर ही सम्भव है। निश्चितः यह तिलक की महान् देन थी। रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है कि, हिन्दू जाति लोकमान्य की चिरऋणी रहेगी कि निवृत्ति का आलस छुड़ाकर उन्होंने उसे प्रवृत्ति की ओर लगा दिया।
तिलक एवं राष्ट्रीय आन्दोलन-
तिलक ने अपने राजनीतिक जीवन का आरम्भ महाराष्ट्र में किया था। वे 1889 ई. में कांग्रेस के सदस्य बने तथा 1920 ई. तक देश की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करते रहे। उन्होंने अपने भाषणों एवं लेखों के माध्यम से जनता में चेतना उत्पन्न कर राष्ट्रीय आन्दोलन को जन-आन्दोलन के रूप में परिणित कर दिया तथा कांग्रेस को जन-साधरण की संस्था बना दिया।
(1) सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के जनक-
तिलक को अपनी प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति पर गर्व था। उनका विश्वास था कि भारतीयों को अपनी संस्कृति के गौरव से परिचित करवाने पर ही उनमें आत्म-गौरव एवं राष्ट्रीयता की भावना पैदा की जा सकती है। इस सम्बन्ध में उन्होंने अपने समाचार-पत्र मराठा में लिखा था कि, सच्चा राष्ट्रवाद पुरानी नींव पर हो निर्माण करना चाहता है। जो सुधार पुरतान के प्रति घोर असम्मान की भावना पर आधारित है, उसे सच्चा राष्ट्रवाद रचनात्मक कार्य नहीं समझता। हम अपनी संस्थाओं की ब्रिटिश ढाँचें में नही ढालना चाहते, सामाजिक तथा राजनीतिक सुधार के नाम पर हम उनका अराष्ट्रीयकरण नहीं करना चाहते। अतः वे भारतीय संस्कृति के गौरव के आधार पर देशवासियों में राष्ट्र प्रेम उत्पन्न करना चाहते थे। इस उद्देश्य से उन्होंने व्यायाम शालाएँ, अखाड़े, गौ-हत्या विरोधी संस्थाएँ स्थापित कीं तथा हिन्दू देवताओं एवं वीरों की पूजा पर बल दिया। इस सम्बन्ध में गणपति तथा शिवाजी उत्सव प्रमुख हैं ः

i. गणपति उत्सव- हालांकि यह उत्सव पहले भी महाराष्ट्र में प्रचलित था, किन्तु तिलक ने इसे सामुहिक रूप से मानाने पर बल देकर राष्ट्रीय उत्सव बना दिया। नगरों एवं ग्रामों में व्यायामम हेतु गणपति संस्थाएँ स्थापित की गईं। इस उत्सव में जुलूस निकाले जाते थे, संगीत का कार्यक्रम होता था तथा भाषण दिए जाते थे। इस उत्सव द्वारा तिलक जनता में राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न करना चाहते थे।
ii. शिवाजी उत्सव- सारे महाराष्ट्र में शिवाजी का नाम वीरता, एकता, देशभक्त व देश प्रेम तथा श्रद्धा का प्रतीक माना जाता था। अतः जनता को एकता के सूत्र में बाँधने हेतु तिलक ने यह उत्सव मानना शुरू किया। सर्वप्रथम यह उत्सव 1895 ई. में रायगढ़ में तीन दिन तक मनाया गया। इसके बाद सरकार द्वारा प्रतिबन्ध लगाए जाने के बावजूद यह उत्सव तिलक की अध्यक्षता में मनाया जाता रहा। तिलक ने शिवाजी का उदाहरण देते हुए कहा कि, जिस प्रकार शिवाजी ने स्वतन्त्रता हेतु आजीवन मुगलों से संघर्ष किया था, उसी प्रकार हमें भी अंग्रेजों से संघर्ष करना चाहिए।
एक सभा में उन्होंने कहा था कि, हम स्वराज्य की माँग कर हैं, और इसलिए शिवाजी उत्सव मनाना हमारे लिए सबसे अधिक उपयुक्त है। अगर शिवाजी दो सौ साल पहले स्वराज्य स्थापित कर सकते थे, तो हम भी किसी दिन इसे प्राप्त कर सकते हैं। स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। नरम दल वालों की तुलना शिवाजी के पिता शाहजी से की जा सकती है जो सदा अपने बेटे को दक्षिण के ताकतवर मुसलमान शासक के खिलाफ हथियार न उठाने की सलाह दिया करते थे। तब शिवाजी ने, जिनकी तुलना आज गरम दल वालों से की जा सकती है, घटनाचक्र की दिशा ही बदल दी। हम स्वयं अपने भाग्य के विधाता हैं और उसे तभी बना सकते हैं, जब हम उसे बनाने का पक्का इरादा कर लें। स्वराज्य हमसे बहुत दूर नहीं है। यह उसी क्षण हमारे पास आ जाएगा, जिस क्षण हम अपने पाँवों पर खड़ा होना सीख लेंगे। इन सभाओं मं उनका नारा था, स्वराज्य मेरा जन्म-सिद्ध अधिकार है, मैं इसे लेकर रहूँगा। (Swaraj is my birthright and I shall have it.)
शिवाजी का उदाहरण देते हुए एक बार तिलक ने युवाओं से कहा था कि, शिवाजी ने अच्छे उद्देश्य से, दूसरों के लाभ के लिए अफजल खाँ की हत्या की थी, उसी प्रकार अगर हमारे मकान में चोर घुस आएँ और उनको भगाने की ताकत न हो, तो हमें निःसंकोच उन्हें बन्द कर जिन्दा जला देना चाहिए। उन्होंने कहा था कि, भाट की तरह गुणगान करने से स्वतन्त्रता नहीं मिल जाएगी। स्वतन्त्रता के लिए शिवाजी की भाँति साहसी कार्य करने पड़ेगे। 1897 ई. में पूना में शिवाजी उत्सव के अवसर पर तिलक ने शिवाजी को राष्ट्र निर्माता बताया। गणपति उत्सव एवं शिवाजी उत्सव के द्वारा शिवाजी जनता में राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न करने में सफल रहे।
वेलेन्टाइन शिरोल ने तिलक को साम्प्रदायिक व्यक्ति के रूप में सिद्ध करने की चेष्टा की। उसने कहा था कि, तिलक हिन्दू राष्ट्रवादी विचारधारा के होने के कारण मुस्लिम विरोधी थे, परन्तु उसके ये आरोप सत्य से परे हैं। सच्चाई तो यह है कि तिलक के हृदय में मुसलमानों के प्रति कोई द्वेषभाव नहीं था। वे स्वतन्त्रता के सामान्य लक्ष्य के लिए मुसलमानों से भी राष्ट्रीय सहयोग की अपेक्षा करते थे। अतः तिलक पर धार्मिक सहिष्णुता का आरोप लगाना अनुचित एवं निराधार है। तिलक की राष्ट्रवादी भावनाओं की प्रशंसा स्वयं जिन्ना, डॉ अन्सारी एवं हसन इमाम ने की थी।
(2) दक्षिण भारत में अकाल एवं प्लेग निवारण में योगदान-
1896-97
ई. में दक्षिणी भारत में भयंकर दुर्भिक पड़ा। सरकार की उदासीनता से लाखों लोग मर गए। राहत कार्य के स्थान पर सरकार ने भूमि कर बढ़ा दिया। तिलक ने अपने समाचार-पत्रों में सरकार की इन नीतियों की कटु आलोचना करते हुए अकाल पीड़ितों की हर तरह से सेवा की। उन्होंने किसानों को सरकार से असहयोग करने व भूमिकर न चुकाने के लिए प्रेरित किया। अतः किसान तिलक के भक्त बन गए। श्री तहमनकर ने लिखा है कि, तिलक के इन प्रयासों से न केवल दक्षिण के किसानों के हृदय को ही जीत लिया, बल्कि उनके दृष्टिकोण को भी बदल दिया। वे कायरता को त्यागकर वीर एवं देशभक्त बन गए।
1897 ई. में महाराष्ट्र में प्लेग फैला, जिसमें लाखों लोग मारे गए। तिलक ने इस समय प्लेग के रोगियों की अभूतपूर्व सेवा की। उन्होंने अपने समाचार-पत्रों में सरकार की प्लेग नीति की तीव्र निन्दा की। उन्होंने लिखा कि सैनिक एवं अधिकारी कीटाणुओं की जाँच के बहाने भारतीयों के घरों में घुसकर उनके घरों तथा मन्दिरों को अपवित्र कर रहे हैं एवं उनकी स्त्रियों की इज्जत पर भी हमला कर रहे हैं। रामगोपाल ने लिखा है कि, रेण्ड के पीछे-पीछे पुलिस और सेना चलती थी और वे बीमारे वाले मकानों को गिरा देते थे तथा मकानों के निवासियों को जबरदस्ती कैम्पों में भेज दिया जाता था। बहुत से स्थानों पर प्लेग के किटाणुओं को नष्ट करने के लिए बिस्तर एवं कपड़े जला दिए गए। यदि इसी तरह वस्त्रहीन किए गए लोगों को किटाणु रहित कपड़े दिए जाते, तो यह सहन कर लिया जाता, किन्तु ऐसा नहीं किया गया। इसी तरह जिन्दगी की जरूरी चींजे नष्ट कर दी गईं तथा उनके स्वामियों को रोने-बिलखने के लिए बेघर छोड़ दिया गया। रेण्ड मकान के हर हिस्से में, यहाँ तक कि रसोई में और मन्दिर में भी घुस जाता था। यह देखने के लिए ताले बेधड़क तोड़ दिए जाते थे कि मकान के अन्दर प्लेग का कोई रोगी तो नहीं छिपाया गया है। शस्त्रहीन हिन्दुस्तानी पुलिस और रिवाल्वरधारी यूरोपियन सैनिक स्त्रियों के कमरे में घुस जाते थे। खुले हुए कमानों से घरेलु चीजें उठा ली जाती थीं, जो कभी लौटाई नहीं जाती थीं। झौपडों को जला दिया जाता। कुछ सैनिक दुकानदारों की तिजोरियाँ तोड़ डालते थे। कुछ सैनिक यह समझते थे कि सिलाई की मशीनें किसी बी तरह कीटाणु रहित नहीं की जा स कती, अतः उन्हें जला ही दिया जाना चाहिए। सारा काम इस ढंग का था कि जैसे दुश्मन द्वारा जीते गए किसी शहर को फूंका जा रहा हो। तिलक ने अपने समाचार-पत्र केसरी में इसकी निन्दा करते हुए लिखा था कि, सरकार द्वारा नियुक्ति किए गए इन अधिकारि ोयं की प्लेग ग्रस्त लोगों से तनिक भी सहानभूति नहीं है। वे उनकी सेवा करने के स्थान पर उनका अपमान करते हैं, जिससे लोग प्लेग की अपेक्षा इन सरकारी अधिकारियों से अधिक डरते हैं। विचारों से प्रेरित होकर दामोदर एवं बालकृष्ण चपेलकर नामक दो युवकों ने 1897 ई. में मि. रेण्ड एवं मि. आयर्स्ट इन दो प्लेग कमिश्नरों की हत्या कर दी। सराकर ने इस घटना के लिए तिलक पर राजद्रोह का अभियोग लगाते हुए उन्हें 18 माह का कठोर कारवास का दण्ड किया। इस बात की सर्वत्र निन्दा की गई। मद्रास टाइम्स ने लिखा था कि, तिलक को सजा होने की खबर एक राष्ट्रीय दुर्घटना के रूप में आई है। बहुत समय तक इसे भुलना कठिन है और यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि यह घटना इस देश के भारतीयों और एंग्लो-इण्डियन समुदायों के मौजूदा सम्बन्धों को दृढ़ करने में सहायक होगी। हिन्दू में लिखा था कि, श्री तिलक की सजा से भारतीय जनता और भारत में ही मौजूद उसके दुश्मनों के बीच बड़ी शरारत भीर निन्दनीय मुखालफत की शुरूआत होती है, क्योंकि वे दुश्मन बड़े ताकतवर हैं। वे शासकों के पास आजादी से पहुँचे सकते हैं और उन्हें इंग्लैण्ड के टोरी अखबारों की सेवाएँ प्राप्त है। वे निःसन्देह खुशियाँ मना रहे होंगे। दो महीने पहले जब मुकदमे की शुरूआत हुई थी, तह बमने इस बात पर खेद प्रकट किया था कि मुकदमा ऐसे समय शुरू किया गया है, जब अंग्रेजों की भानवा भारतीयों के इतना विरूद्ध है। हमने कहा था कि यह असम्भव है कि ऐसी भावना होते हुए अंग्रेज भारतीय अखबारों द्वारा की जाने वाली ब्रिटिश सरकार की आलोचनाओं पर निष्पक्ष या नरम फैसला करर सके। हाल ही की सजाओं में हमारे भय को उचित सिद्ध कर दिया है। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि, श्री तिलक के लिए मेरा हृदय सहानुभूति से भरा हुआ है। मेरा मन जेलखाने में उनके साथ है। सारा राष्ट्र आज आँसू बहा रहा ह। भारतीय पत्र जगत् की ओर से मैं निःसंकोच कह सकता हूँ कि हम तिलक को सर्वथा निर्दोष समझते हैं। इसके विपरित साम्प्रदायिक प्रवृत्ति के रासत् गरोफ्तर ने लिखा था कि, हमें अपने पाठकों को यह सूचित करते हुए खुशी होती है कि सबसे बड़े राजद्रोह फैलाने वाले तिलक को उचित दण्ड मिल गया अगले 18 माह के लिए उसे बन्द कर दिया गया है, पर कैद का समय थोड़ा होने पर भी यह उसके बात पर विचार करने के लिए काफी है कि शिवाजी के शब्दों की नकाब डालकर अब जबकि यह स्पष्ट हो गया है कि कानून की भुजाएँ उस नकाब को फाड़ डालने में समर्थं है, फिर भी जेल से बाहर आने पर राजद्रोह का प्रचार करना फायदेमंद होगा या नहीं। सरकार की इस दमन नीति का परिणाम बताते हुए आर.सी. दत्त ने लिखा है कि, अंग्रेज शासकों की न्यायप्रियता और समृद्धिदृष्टि में भारतीय जनता का जो विश्वास था, वह ऐसा हिल गया, जैसे कि पहेल कभी नहीं हिला था।
तिलक ने तन-मन-धन से इन प्लेग पीड़ितों की सेवा की तथा इनकी सहायता न करने वाले भारतीयों की आलोचना की। इन कारण तिलक इन प्लेग पीड़ितों में बहुत लोकप्रिय हो गए। इन अगले 18 माह के लिए उसे बन्द कर दिया गया है, पर कैद का समय थोड़ा होने पर भी यह उसके बात पर विचार करने के लिए काफी है कि शिवाजी के शब्दों की नकाब डालकर अब जबकि यह स्पष्ट हो गया है कि कानून की भुजाएँ उस नकाब को फाड़ डालने में समर्थं है, फिर भी जेल से बाहर आने पर राजद्रोह का प्रचार करना फायदेमंद होगा या नहीं। सरकार की इस दमन नीति का परिणाम बताते हुए आर.सी. दत्त ने लिखा है कि, अंग्रेज शासकों की न्यायप्रियता और समृद्धिदृष्टि में भारतीय जनता का जो विश्वास था, वह ऐसा हिल गया, जैसे कि पहेल कभी नहीं हिला था।
तिलक ने तन-मन-धन से इन प्लेग पीड़ितों की सेवा की तथा इनकी सहायता न करने वाले भारतीयों की आलोचना की। इन कारण तिलक इन प्लेग पीड़ितों में बहुत लोकप्रिय हो गए।
तिलक और कांग्रेस-
भारतीय राजनीति में उग्र राष्ट्रवादी भावना का जन्मदाता तिलक को माना जाता है। तिलक के पहले कांग्रेस का प्रभाव शिक्षित लोगों तक ही सीमित था, लेकिन उन्होंने कांग्रेस को एक जन-आन्दोलन के रूप में परिणित कर दिया। उन्हें उदारवादियों के अनुनय-विनय और भिक्षावृत्ति नीति पसन्द नहीं थी। वे अंग्रेजों की ईमानदारी एवं न्यायप्रियता में तनिक भी विश्वास नहीं करते थे। उनका मानना था कि भीख माँगने से कभी स्वतन्त्रता नहीं मिलेगी, अपितु इसे प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा और हर प्रकार का बलिदान देना पड़ेगा। 1896 ई. में तिलक ने कहा था कि, गत् 12 वर्षों से हम चिल्ला रहे हैं कि शासन हमारी बातों को सुने परन्तु सरकार हमारी आवाज को नहीं सुनती, वह बन्दूक की आवाज सुनती है। हमारे ऊपर अविश्वास किया है। अब हमें शक्तिशाली साधनों के आधार पर अपनी बात सुनानी चाहिए।

प्रसिद्ध अमेरिकन विद्वान डॉ. एलशे ने तिलक की राजनीतिक विचारधारा के बारे में लिखा है कि, जब भारत में वास्तविक राजनीतिक जाग्रति आरम्भ हुई, तो सर्वप्रथम तिलक ने ही स्वराज्य की आवश्यकता और उनके लाभों की ओर जनता का ध्यान आकृष्ट किया था। उन्होंने ही सर्वप्रथम स्वदेशी वस्तुओं के प्रति अनुराग, राष्ट्रीय ढंग की शिक्षा, जन प्रिय संयुक्त राजनीतिक मोर्चे इत्यादि की खोज की, जिनके द्वारा स्वराज्य के लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्त्वपूर्ण सहायता मिली। तिलक जी ने ही सर्वप्रथम यह नारा दिया था, स्वतन्त्रता मेरा जन्म-सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूँगा। धीरे-धीरे कांग्रेस में तिलक जी का प्रभाव बढ़ता गया और वे कांग्रेस के प्रमुख उग्रवादी नेता बन गए। बंगाल विभाजन के समय उन्होंने अपने एक लेख, संकट आ रहा है में लिखा, नरम दल की नीति अब अधिक समय के लिए उपयोगी नहीं हो सकती। सरकार की नीति चाहे कितनी ही दमनकारी क्यों न हो, हमें साहस से आगे बढ़ना चाहिए तथा तनिक भी पीछे नहीं हटना चाहिए।
तिलक ने स्वराज्य प्राप्ति के लिए संघर्ष का मार्ग दिखाया। उनकी यह प्रमुख देन थी कि उन्होंने भारतीय जनता को अवज्ञा का दर्शन सिखाया। तिलक ने स्वराज्य प्राप्ति के लिए चार सूत्री कार्यक्रम पर अमल करने पर जोर दिया-
1. स्वदेशी अर्थात् भारत में बनी हुई वस्तुओं का प्रयोग करना,
2. विदेशी माल, सरकारी नौकरियों तथा प्रतिष्ठा की उपाधियों का बहिष्कार करना,
3. राष्ट्रीय शिक्षा, एवं
4. निष्क्रिय प्रतिरोध।
तिलक ने बहिष्कार के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा था कि, आप में से बहुत-से हथियारों को पसन्द नहीं करते और न ही हमारे पास हथियार हैं। परन्तु आप आत्म-त्याग द्वारा ब्रिटिश सरकार को अपने ऊपर शासन करने में सहयोग न दें। हमारे पास बहिष्कार का राजनैतिक हथियार है। यदि हम उन्हें राजस्व जमा करने और शान्ति स्थापित करने मं सहयोग न दें, हम उन्हें भारत से बाहर, भारतीय जन-जन से लड़ने में सहायता न दे, हम उन्हें न्याय करने में सहायता न दें तो कल से ही आप स्वतन्त्र हैं। तिलक का य ही कहना था कि, हमारे पास हथियार नहीं और हमें हथियारों की जरूरत भी नहीं है। बहिष्कार ही हमारा जबर्दस्त राजनीतिक हथियार है। मुट्ठीभर अंग्रेज यह शासन हमारी सहायता से ही करते हैं।
बहिष्कार आन्दोलन की शक्ति स्वीकार करते हुए कलकत्ता एंग्लो-इण्डियन समाचार-पत्र दी इंग्लिशमैन ने लिखा था कि, यह बिल्कुल सत्य है कि कलकत्ता के गोदामों में कपड़ा इतना भरा हुआ है कि वह बेचा नहीं जा सकता।...कई बड़ी से बड़ी यूरोपियन दुकानों को या तो बन्द करना पड़ा है या उनका व्यापार बहुत बन्द गति पर आ गया है। बहिष्कार के रूप में राज के शत्रुओं ने देश में ब्रिटिश हितों पर कुठाराघात करने का एक अत्यन्त प्रभावशाली अस्त्र पा लिया है। इस आन्दोलन की शक्ति की व्याख्या करते हुए पूना के एक भाषण में तिलक ने कहा था कि, तुम्हें जनना चाहिए कि तुम उस शक्ति के एक महान् तत्त्व हो, जिससे भारत में प्रशासन चलाया जाता है। ब्रिटिश शासन रूप यह शक्तिशाली यंत्र बिना तुम्हारी सहायता से नहीं चलाया चा सकता। अपनी इस दलित तथा उपेक्षित अवस्था में भी तुम्हें अपनी शक्ति की चेतना होनी चाहिए कि यदि तुम चाहो, तो प्रशासन को असम्भव बना दो। तुम्हीं डाक और तार का प्रबन्ध करते हो, तुम्हीं भूमि का बन्दोबस्त करते हो और तुम्हीं कर वसूल करते हो। वास्तव में प्रशासन के लिए सबी काम तुम्हीं करते हो, यद्यपि अधीनता की स्थिति में तुम्हें विचार करना चाहिए कि क्या तुम इस प्रकार के कार्य की अपेक्षा अपने राष्ट्र के लिए कोई और अधिक उपयोगी कार्य नहीं कर सकते।
तिलक ने जनता से यह भी कहा था कि, हमारे उद्देश्य आत्म-निर्भरता है, भिक्षावृत्ति नहीं। हमें अपने राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा।
1906 ई. के कांग्रेस अधिवेशन में तिलक ने भाग लिया। उन्होंने कांग्रेस के समक्ष स्वराज्य की माँग को रखा तथा उसकी नम्र नीति का विरोध किया। वे गोखले के इस मत से सहमत नहीं थे कि जब अंग्रेजों को यह विश्वास हो जाएगा, तब वे स्वयं भारतीयों को सत्ता सौंपकर इंग्लैण्ड चले जाएँगे। उनका मानना था कि स्वतन्त्रता अपने आप नहीं आएगी, अपितु इसे अंग्रेजों से छीनना पड़ेगा।
तिलक के उग्रवादी विचार उदारवादियों को अच्छे नहीं लगे। 1907 के सूरत विच्छेद से पूर्व तिलक ने अपने एक भाषण में राजनीतिक उग्रता का परिचय देते हुए कहा था कि, हमारे उद्देश्य स्वशासन है और इसे यथासम्भव शीघ्र ही प्राप्त करना चाहिए। हमारा राष्ट्र आतंकवादी दमन के लिए नहीं है। आप लोग भीरू और कायर न बनें। जब आप स्वदेशी को स्वीकार करते हैं, तो आपको विदेशी का बहिष्कार करना होगा।...हमारा उद्देश्य पुर्ननिर्माण है, हमारा स्वराज्य का आदर्श विशिष्ट लक्ष्य है, जिसे जन समुदाय समझे। स्वराज्य में जनता का शासन जनता के लिए होगा। उदार पंथियों डरिए मत। बहिष्कार करना दलित राष्ट्र के लिए एक मात्र साधन है। स्वराज्य और बहिष्कार के उपरान्त हमारा तीसरा आदर्श राष्ट्रीय शिक्षा है, जिसके सम्बन्ध में पिछली कांग्रेस ने प्रस्ताव पास किया था। एक अमेरिकी विद्वान् ने कहा था कि, जब भारत में वास्तविक राजनीतिक जाग्रति आरम्भ हुई, तो सर्वप्रथम तिलक ने ही स्वराज्य की आवश्यकता और उसके लाभों की ओर जनता का ध्यान आकर्षित किया।
तिलक ने उग्र विचारों ने कांग्रेस के सदस्यों को बहुत प्रभावित किया। इसका परिणाम यह हुआ कि जब 1907 ई. में सूरत में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, तो कांग्रेस दो दलों में विभाजित हो गई (1) नरम दल और (2) गरम दल। नरम दल का नेतृत्व गोखल ने किया, जबकि लोकमान्य तिलक, लाला लाजपतराय और विपिनचन्द्र पाल आदि नेताओं ने गरम दल बनाकर उसका नेतृत्व किया। 1908 ई. में किसी क्रान्तिकारी ने बम फैंक कर मिसेज केनेडी की हत्या कर दी। तिलक ने अपने समाचार-पत्र में इस हत्या को उचित ठहराया। परिणामस्वरूप सरकार ने उन पर राजद्रोह का अपराध लगाकर मुकदमा चलाया और 6 वर्ष का कठोर कारावास का दण्ड देकर मांडले बर्मा की जेल में भेज दिया। निर्णय से पहले जज ने उन्हें एक बार बोलने का अवसर दिया, तो उन्होंने कहा कि, मैं केवल यह चाहता हूँ कि जूरी का निर्णय चाहे जो भी हो, मैं अपने आपको निश्चित रूप से निर्दोष मानता हूँ। विभिन्न वस्तुओं के भाग का संचालन करने के लिए उच्चतर शक्तियाँ हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि जिस आदर्श का मैं प्रतिनिधित्व करता हूँ, वह ईश्वर इच्छा के अनुसार मेरे स्वतन्त्र रहने की अपेक्षा मेरे कष्टों में अधिक फलीभूत होगा।
तिलक के कारावास के समाचार से देश में अव्यवस्था फैल गई। वेलेन्टाइन शिरोल ने लिखा है कि, पुलिस का अच्छा प्रबन्ध होने पर भी अभियोग के बाद कई बड़े दंगे हुए और कभी-कभी तो इन दंगो ने बड़ा उग्र रूप धारण कर लिया। दंगो की शुरूआत से इस बात का पता चलता है कि केवल उच्चवर्गीय लोगों के ऊपर ही नहीं, वरन् समाज के निम्न वर्गों पर भी तिलक का जबरदस्त प्रभाव था।
तिलक 1908 ई. से 1914 तक मांडले की जेल में रहे। उनकी अनुपस्थिति में सरकार दमन कार्य से उग्रवादी आन्दोलन का दमन करने लगी। जेल में उन्होंने गीता रहस्य व आर्कटिक होम इन द वेदाज नामक ग्रन्थ लिखे। एन.सी. केलकर ने इन सम्बन्ध में लिखा है कि, तिलक अक्सर कहा करते थे कि मेरे मन का सच्चा सम्मान प्रोफेसर बनकर ग्रन्थ लिखने का है। मैं केवल परिस्थितियों के प्रभाव से राजनीति में खेंच गया और सम्पादक बना।
जेल से रिहा होती ही उन्होंने पुनः राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेना प्रारम्भ कर दिया। श्रीमती एनीबेसेण्ट के प्रयासों से कांग्रेस के गरम दल और नरम दल में एकता स्थापित हो चुकी थी। 1916 ई में लखनऊ में कांग्रेस का अधिवेशन बुलाया गया। तिलक ने भी इस अधिवेशन में भाग लिया। इसमें कांग्रेस ने भारत के लिए स्वायत्त शासन की माँग का प्रस्ताव पारित किया था। 1916 ई. में तिलक ने श्रीमती एनीबेसेण्ट के साथ मिलकर होम रूल आन्दोलन प्रारम्भ किया, जिसका उद्देश्य भारत को स्वतन्त्रता दिलवाना था। तिलक के प्रयासों से 1916 ई. में लखनऊ में कांग्रेस और मुस्लिम लगी के बीच समझौता सम्भव हो सका। उन्होंने नारा दिया, स्वन्त्रता मेरा जन्म-सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा। स्वराज्य के सम्बन्ध में उन्होंने कहा, प्रगति स्वराज्य में ही निहित है। यदि हम स्वराज्य प्राप्त नहीं करते, तो कोई औद्योगिक प्रगति नहीं होगी। यदि हम स्वराज्य प्राप्त नहीं करते, तो किसी भी रूप में राष्ट्र के लिए उपयोगी शिक्षा व्यवस्था की कोई सम्भावना नहीं है। पर्वते ने लिखा है, तिलक के साथ जो विविध सम्भावित सम्बोधन जोड़े जाते हैं, उनमें लोकतान्त्रिक स्वराज्य के प्रतिपादक अवश्य जुड़ जाना चाहिए। सी.वाई. चिन्तामणि ने लिखा है कि, स्वतन्त्रता प्राप्ति उनके जीवन का चरम लक्ष्य था और अपने समकालीन राजनीतिज्ञों में उन्होंने इसके लिए सबसे अधिक कष्ट सहन किए।
कुछ व्यक्ति तिलक को साम्प्रदायिक मानते हैं, किन्तु लखनऊ समझौते में तिलक की भूमिका उन्हें सर्वथा असाम्प्रदायिक एवं सच्चा राष्ट्रीय नेता सिद्ध करता है। डॉ. जकारिया ने लिखा है कि, 1916 ई. का लखनऊ समझौता लोकमान्य तिलक की विवेकपूर्ण सलाह से ही सम्पन्न हुआ था और जिन्ना, डॉ. एम.ए. अन्सारी व हसन इमाने भी तिलक के राष्ट्रीय दृष्टिकोण औरसमझौते की भावना की भूरी-भूरी प्रशंसा की है। शौक्त अली और हसरत मोहानी तो उन्हें अपना राजनीतिक गुरू मानते थे।
1919 ई. में तिलक के नेतृत्व में कांग्रेस का एक शिष्ट मण्डल इंग्लैण्ड गया। तिलक ने भारत की निर्धनता व पिछड़ेपन के लिए अंग्रेजों को उत्तरदायी ठहराया। उसने प्रभावित होकर लेबर पार्टी ने खजान्ची मि. आर्थर हैंडरस ने कहा कि, हमें भारतीयों की स्वराज्य की माँग से पूर्ण सहानुभूति है। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि हमारा दल आपकी तथा भारतीय लोकतन्त्र की सहायता के लिए यथासम्भव सभी प्रयत्न करेगा। इस बारे में डी.वी. तहमनकर ने लिखा है कि, तिलक द्वारा लेबर पार्टी के साथ स्थापित किए गए मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का ही यह परिणाम था कि मि. एटली ने 1947 में भारत को पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान की।
1919 ई. में पेरिस शान्ति सम्मेलन के समय उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति विल्सन को आत्म-निर्णय के अधिकार के सम्बन्ध में एक पत्र लिखा, जिसमें लिखा था कि, एशिया और संसार की शक्ति के दृष्टिकोण से यह बात नितान्त आवश्यक है कि भारत को स्वायत्त शासन प्रदान करके पूर्व में उसे स्वतन्त्रता का गढ़ बना लिया जाए। 24 जुलाई, 1920 ई में उनकी मृत्यु हो गई। उनके शब्द थे, देश के लिए जिसने अपने जीवन का बलिदान कर दिया, मेरे हृदय मन्दिर में उसी के लिए स्थान है, जिसके हृदय में माता की सेवा का भाव जाग्रत है, वही माता का सच्चा सपूत है। इस नश्वर शरीर का अब अन्त होना ही चाहता है। हे भारतमाता के नेताओं और सपूतों में अन्त में आप लोगों से यही चाहता हूँ कि मेरे इस कार्य को उत्तरोत्तर बढ़ाना।
तिलक की मृत्यु पर सारा राष्ट्र आँसू बहा रहा था। लाला लाजपतराय ने कहा भारत में दहाड़ने वाला शेर चला गया। पं. मदनमोहन मालवीय ने कहा, उन्होने देश के लिए असीम आपत्तियाँ उठाईं, क्योंकि बारत का प्रेम ही उनके हृदय की प्रधान भावना थी। मरते दम तक स्वराज्य ही उनका ध्येय रहा। इस प्रकार तिलक ने भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन की आधार शिला रखी। उन्होंने भारतीय जनता में राजनीतिक चेतना जाग्रत की। उनके ही प्रयासों के कारण देश के राष्ट्रीय आन्दोलन ने एक जन-आन्दोलन का रूप ले लिया।
तिलक का व्यक्तित्व
तिलक एक महान् स्वतन्त्रता सेनानी थे। उन्होंने जनता में चेतना उत्पन्न की तथा राष्ट्रीय आन्दोलन का जन-आन्दोलन बना दिया। उन्होंने स्वराज्य को अपना जन्मसिद्ध अधिकार घोषित किया। सी.वाई. चिन्तामणि ने लिखा है कि, स्वराज्य प्राप्ति उनके जीवन का चरम लक्ष्य था, जब कभी वे किसी बात पर तत्पर हो जाते थे, तो फिर पीछे हटना उनके लिए सम्भव नहीं था। उन्होंने अपने विचारों तथा कार्यों के लिए समकालीन राजनीतिज्ञों में सबसे अधिक कष्ट सहन किए। बम्बई के गवर्नर ने इस सम्बन्ध में भारत मन्त्री को लिखा था कि, तिलक मुख्य षड्यन्त्रकारियों में से है और सबसे प्रमुख षड्यन्त्रकारी है। उन्होंने भारत में ब्रिटिश शासन की कमजोरियों का बड़ी सावधानी से अध्ययन किया है। उनके गणपति उत्सव, शिवाजी उत्सव, पैसा फण्ड और राष्ट्रीय स्कूल इन सबका एक ही उद्देश्य है कि ब्रिटिश शासन को उखाड़ फैंका जाए। वे राष्ट्रीयता के अग्रदूत थे। शिरोल ने लिखा है कि, यदि कोई व्यक्ति भारतीय अशान्ति का जनक होने का दावा कर सकता है, तो वह बाल गंगाधर तिलक है। भारत मन्त्री मॉण्टेग्यू ने एक बार कहा था कि, भारत में केवल एक ही अकृत्रिम उग्र राष्ट्रवादी था और वह था तिलक।
आधुनिक भारत का कौटिल्य -तिलक को आधुनिक भारत का कौटिल्य माना जाता है। उनका मानना था कि स्वतन्त्रता प्राप्ति हेतु अपनाए गए सभी साधन उचित हैं। उन्होंने कहा था कि, महापुरूष सामान्य नैतिक सिद्धान्तो से ऊपर होते हैं। श्रीमद्भागवद्गीता का उदाहरण देते हुए उन्होने कहा था कि, यदि हम स्वार्थ की भावनाओं से प्रेरित नहीं, तो अपने गुरूजनों तथा सम्बन्धियों की हत्या में भी कोई पाप नहीं होगा। उन्होंने निष्काम कार्य पर बल दिया। जनवरी, 1920 ई. यंग इण्डिया में लिखे हुए एक पत्र में उन्होंने कहा था, उनका विचार यह नहीं है कि राजनीति में सब कुठ ठीक होता है, बल्कि उनका विचार केवल यह है कि धम्मपद के प्रतिपादित घृणा पर प्रेस से विजय प्राप्त करने का बुद्धिवादी सिद्धान्त सभी परिस्थितियों में नहीं अपनाया जा सकता।
महान् राजनीतिज्ञ -तिलक बड़े दूरदर्शी थे। उन्होंने 1896 ई. में स्वराज्य की बात कही तथा 1907 ई. में हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने पर बल दिया। वे रेलवे के राष्ट्रीयकरण एव धर्म निरपेक्ष राजनीति के पक्षधर थे। अमेरिकन इतिहासकार डॉ. शेने लिखा है कि, जब भारत में वास्तविक राजनीतिक जाग्रति प्रारम्भ हुई, तो सर्वप्रथम तिलक ने ही स्वराज्य की आवश्यकता और उसके लाभों की ओर जनता का ध्यान आकर्षित किया था।
वास्तव में तिलक के विचार अपने समय से काफी आगे थे। उन्होंने स्वराज्य की प्राप्ति, राष्ट्रीय आन्दोलन को जन-आन्दोलन बनाना, स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा आदि विचारों को जन्म दिया, जो आगे चलकर महात्मा गाँधी के समय में भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रमुख आधार बने। संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि तिलक एक महान् राजनीतज्ञ और महान् राष्ट्रवादी थे। वे गाँधीजी के अग्रगामी थे। रामगोपाल ने लिखा है कि, महात्मा गाँधी ने तिलक की मृत्य के बाद जितने आन्दोलन किए, वे सब तिलक ने पहले ही कर लिए थे। लगान न देने का आन्दोलन, सरकारी नौकरियों का बहिष्कार, शराब बन्दी और स्वदेशी इन सबका तिलक ने प्रचार किया था। उनका जीवन दिव्य जीवन था तथा उनके देशवासियों ने न केवल लोकमान्य की उपाधि दी, बल्कि तिलक भगवान कहकर भी पुकारा। वे चारों ओर के अँधेरे में प्रकाश ज्योति की तरह सामने आए।
तिलक का मूल्यांकन -तिलक एक महान् राष्ट्रवादी थे, जिन्होंने चेतना उत्पन्न की तथा अवज्ञा का दर्शन प्रदान किया। स्वामी श्रद्धानन्द के अनुसार, महाराज तिलक का राजनीतिक कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं में बहुत ऊँचा स्थान है। उन्होंने सबसे पहले राजनीति एकता के सिद्धान्त का प्रचार किया। मातृभूमि की सेवा के लिए और किस वीर पुरूष ने इतने कष्ट सहे हैं, जितने इस महापुरूष ने। क्या मातृभूमि की सेवा करने वाले सैनिक इस बूढ़े सेनापति के आगे सिर नहीं झुकाएँगे। वास्तव में किसी भी भारतीय ने अपने दशे के लिए इतने कष्ट नहीं सहे, जितने की तिलक ने। 1908 में मार्निंग लीडर ने तिलक के बारे में यह लिखा था, इंग्लैण्ड में बहुत ही थोड़े आदमी होंगे, जो यह समझ सकें कि पूना के राष्ट्रीय नेता श्री बालगंगाधर तिलक की गिरफ्तारी का भारत में वास्तव मंे क्या अर्थ है। उनका निजी प्रभाव देश पर और सब राजनीतिज्ञों से बढ़कर है। वे अपने दक्षिण के सबसे प्रमुख व्यक्ति हैं और बम्बई से लेकर बंगाल की खाड़ी तक प्रत्येक गरम विचारों वाला एक तरह की धार्मिक भावना से पूजा करता है। सूरत में नेशनल कांग्रेस की फूट उनका ही काम था। उन्होंने ही इसकी योजना बनाई, उन्होंने ही इसका प्रचार किया और उन्होने ही उस असाधारण आन्दोलन को दिशा दी, जिसके खिलाफ नौकरशाही अब अपने सब साधनों को इकट्टा कर रही है। वे एक साथ, विचारक भी हैं और योद्धा भी। अरिवन्द ने लिखा है कि, श्री तिलक का नाम राष्ट्र निर्माता के रूप में आधा दर्जन महानतम् राजनीतिक पुरूषों, स्मरणीय व्यक्तियों, भारतीय इतिहास के इस संकटमय काल के राष्ट्र के प्रतिनिधी व्यक्तियों में होने के नाते सदैव अमर रहेगा और इसे लोग तब तक कृतज्ञतापूर्वक स्मरण रखेंगे, जब तक कि देश में अपने भूतकाल पर अभिमान और भविष्य के लिए आशा बनी रहेगी।
वस्तुतः तिलक एक महान् राष्ट्रीय नेता थे, जिन्होंने भारत को स्वराज्य के निकट पहुँचाया। गांधीजी ने कहा था कि, आने वाली पीढ़ियाँ उन्हें आधुनिक भारत के जन्मदाता के रूप में याद रखेंगी।
तिलक और गोखले की तुलना -गोखले उदारवाद के नेता थे, जबकि तिलक उग्रवाद के। डॉ. पट्टाभि सीतारमैया ने इन दोनों की तुलना इस प्रकार की है, गोखले और तिलक दोनों उच्च कोटि के देशभक्त थे। दोनों ने अपने जीवन में महान् त्याग किए, किन्तु दोनों का स्वभाव एक-दूसरे से नितान्त भिन्न है। गोखले उदारवादी थे और तिलक उग्रवादी। गोखले का उद्देश्य प्रचलित संविधान में सुधार करना, परन्तु तिलक इसका पुननिर्माण करना चाहते थे। गोखले के लिए नौकरशाही के साथ मिलकर काम करना आवश्यक था, जबकि तिलक की उससे मुठभेड़ होना जरुरी था। गोखले का मत था कि जहाँ तक सम्भव हो, सरकार को सहयोग दो और जहाँ तक आवश्यक हो, (उसका) विरोध करो। तिलक सरकार के कार्य में रोड़ा अटकाने की नीति के समर्थक थे। गोखले शासन प्रबन्ध तथा राष्ट्र निर्माण के कार्य को अपना प्रथम उद्देश्य मानते थे। गोखले का आदर्श था-सेवा और कष्ट झेलना। गोखले की कार्य प्रणाली का उद्देश्य विरोधियों के हृदय को जीतना था, तिकल उन्हें देश से बाहर निकलना चाहते थे। गोखले दूसरों की सहायता में विश्वास करते थे, तिलक स्वावलम्बन पर। गोखले उच्च वर्ग तथा बुद्धिवादियों की तरफ देखते थे, किन्तु तिलक सर्व-साधरण तथा करोड़ों की ओर। गोखले का अखाड़ा ता कौंसिल भवन, तो तिलक की अदारत थी गाँव की चौपाल। गोखले अंग्रेजी में लिखते थे, तिलक मराठी में। गोखले का लक्ष्य था-स्वशासन, जिसे योग्य लोग अपने को अंग्रेजों की कसौटी पर कसकर प्राप्त करें, परन्तु तिलक का लक्ष्य था-स्वराज्य, जो कि प्रत्येक भारतीय का जन्म-सिद्ध अधिकार है तथा जिसे वह विदेशियों की सहायता अथवा बाधा की परवाह न करते हुए प्राप्त कनरा चाहते थे। गोखले अपने समय के साथ थे, तिलक अपने समय से काफी आगे थे।

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