Saturday, 20 July 2013

कविवार नागार्जुन ने सन् १९५० में ही देश की वर्तमान दुर्दशा का सटीक चित्रण कर दिया था........77213

ये पंक्तियाँ बहुत कुछ कहती हैं..

कविवार नागार्जुन ने सन् १९५० में ही देश की वर्तमान दुर्दशा का सटीक चित्रण कर दिया था..

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पाँच पूत भारतमाता के, दुश्मन था खूँखार..
गोली खाकर एक मर गया, बाक़ी रह गए चार..

चार पूत भारतमाता के, चारों चतुर-प्रवीन..
देश-निकाला मिला एक को, बाक़ी रह गए तीन..

तीन पूत भारतमाता के, लड़ने लग गए वो..
अलग हो गया उधर एक, अब बाक़ी बच गए दो..

दो बेटे भारतमाता के, छोड़ पुरानी टेक..
चिपक गया है एक गद्दी से, बाक़ी बच गया एक..

एक पूत भारतमाता का, कन्धे पर है झण्डा..
पुलिस पकड कर जेल ले गई, बाकी बच गया अण्डा..

--- नागार्जुन (रचनाकाल : 1950)
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मैं इन पंक्तियों के आदर में कुछ कहना चाहता हूँ..

बस अंडे की जगह मैं "डिंब" को प्रतीक स्वरूप प्रयोग कर रहा हूँ..

उस डिंब से निकलेगा..
फिर एक नया जीवन..

अंगड़ाई लेगी फिर एक जिंदगी..
शुरू होगा नया जीवन..

देश-प्रेम का ज़ज़्बा लेकर गुजरेगा बचपन..
खौल उठेगा खून.. जब आएगा यौवन..

फिर गूंजेगी रण-भेरी..
रक्त-रंजित होगा रण..

जीत होगी फिर भारत सपूत की..
परास्त होगा दुश्मन..

जय हो.. बम बम..
Sandeep Sharma

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