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Friday, 12 July 2013

फिल्म समीक्षा :: नायक को उसका हक दिलाती है 'भाग मिल्‍खा भाग' ............................74313

फिल्म समीक्षा :: नायक को उसका हक दिलाती है 'भाग मिल्‍खा भाग'
रेटिंग :: **** चार स्टार

मिल्खा सिंह ने अपनी जिंदगी की सबसे अहम रेस में एक पल को पीछे मुड़ कर देखा और इतिहास रचने से रह गए। 1960 के रोम ओलंपिक की 400 मीटर दौड़ के फाइनल में जब पिस्तौल से गोली छूटी तो भारतीय एथलेटिक्स इतिहास का यह सबसे बेहतरीन धावक प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ता हुआ फर्राटे से ट्रेक पर निकल पड़ा।
आधी दूरी तक वह सबसे आगे था और अचानक कुछ हुआ कि उसने मुड़ कर पीछे देखा। इस छोटी सी चूक ने दूसरों को उससे आगे निकलने का मौका दे दिया और विश्व रिकॉर्ड से बेहतर समय निकालने के बावजूद मिल्खा चौथे नंबर पर आया। मिल्खा ने पीछे मुड़ कर क्यों देखा...?
निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म 'भाग मिल्खा भाग' इसी सवाल का जवाब परत-दर-परत खोलती है और हमारे सामने मिल्खा की जिंदगी की तस्वीर आती है। ऐसा क्या खास है इसमें...? यह एक साधारण व्यक्ति का जीवन है, जिसने देश विभाजन की विभीषिका को अपने जिस्म-ओ-जां पर सहा।

नन्हें मिल्‍खा से धावक बनने तक का सफर

उसने जिंदगी की कालकोठरी में अपनी बिखरी सांसों को पिरोया और चमका। उसने जीवन के हवन कुंड में खुद को झोंक दिया और अग्निपुत्र की तरह जन्मा। नन्हें मिल्खा का परिवार पाकिस्तान में मारा गया और वह जैसे-तैसे जान बचा कर हिंदुस्तान पहुंचा था। बचपन कठिनाइयों में बीता।
युवावस्था में जब वह फौज में भर्ती हुआ तो उसके बेजोड़ धावक होने की प्रतिभा सामने आई। खुद मिल्खा ने जब अपने पैरों में पंखों का एहसास किया तो उसमें आसमान को छूने की ललक पैदा हुई। अपनी मेहनत और लगन से उसने इतिहास में नए अध्याय जोड़े।
निर्देशक ने मिल्खा की कहानी को थोड़ा-सा फिल्मी टच देकर बेहद खूबसूरती से पर्दे पर उतारा है। फिल्म आपको इतिहास में ले जाती है। इतिहास के भी यहां दो हिस्से हैं, एक जब मिल्खा से पाकिस्तान में होने वाले मैत्री खेलों में भाग लेने को कहा जाता है और वह इंकार कर देता है। दूसरा, जब मिल्खा के इंकार के पीछे पाकिस्तान में उसके साथ हुई त्रासदी क्रमशः सामने आती है।

डायलॉग के साथ गीत भी अच्छे

यहां कौशल लेखन के स्तर पर हुआ है और इसका पूरा श्रेय प्रसून जोशी को जाता है। जिन्होंने फिल्म की स्क्रिप्ट, डायलॉग और गीत लिखे हैं। तीनों काम एक ही व्यक्ति द्वारा संपन्न होने से गीत कहानी के सहज प्रवाह में आते हैं। हवन कुंड मस्तों का झुंड और जिंदा है तो प्याला पूरा भर दे... शानदार गीत हैं।
मेलबर्न ओलंपिक (1956) में मिल्खा की नाकामी और पाकिस्तान से उनकी नाराजगी के प्रसंग फिल्म को गति प्रदान करते हैं। मिल्खा की नाराजगी पाकिस्तानियों द्वारा विभाजन के दौरान दिखाई गई दरिंदगी के खिलाफ आम हिंदुस्तानी के गुस्से का भी इजहार है। प्रसून ने इस गुस्से को रचते हुए अमन की आशा की लौ को भी जलाए रखा है। पाकिस्तान पहुंचे मिल्खा से उनके बचपन का यार कहता हैः इंसान बुरा नहीं होता। हालात बुरे होते हैं। वे हालात भी बुरे थे।
प्रसून ने मिल्खा के जीवन में आए प्रेम को, उनके खेल को निखारने की कहानी के साथ खूबसूरती से पिरोया है। फिल्म किसी एक ट्रेक पर नहीं रहती और मिल्खा की जिंदगी के विषयांतरों को करीने से समेटती है। मिल्खा की प्रेमिका के रूप में सोनम कपूर सुंदर और सहज लगी हैं। वह अपनी प्लास्टिक ब्यूटी की इमेज को इस फिल्म में तोड़ती हैं।

फरहान का यादगार अभिनय

राकेश और प्रसून की कोशिशें अगर कामयाब हैं तो फरहान के बेहद कड़े परिश्रम के कारण। उन्होंने मिल्खा को हिंदी सिनेमा के इतिहास का यादगार किरदार बना दिया है। मिल्खा के रूप से उनकी गजब की समानता है और अपने अद्वितीय अभिनय से वे फिल्म को नई ऊंचाइयों पर ले गए हैं।
यह एक मील का पत्थर है। रात-दिन पसीना बहाकर फरहान ने जो एथलेटिक बॉडी बनाई, वह भी इस फिल्म को देखने का एक कारण है। भाग मिल्खा भाग हर उम्र और वर्ग के दर्शकों के लिए है। हर लिहाज से बेहतर है।
जिन्हें हिंदी फिल्मों से शिकायत रहती है कि वे खलनायकों को नायक बनाती हैं, यह फिल्म उस शिकायत को कम करती है। साथ ही बताती है कि हिंदी सिनेमा सकारात्मक दिशा में भी सोच रहा है।
यह बड़ा बदलाव है। मिल्खा शुरुआत है। क्रिकेट, हॉकी, बॉक्सिंग और एथलेटिक्स जैसे खेल पर्दे पर कामयाबी के झंडे गाड़ रहे हैं, यह फिल्मों के साथ खेलों के लिए भी शुभ संकेत है।

फिल्म समीक्षा :: नायक को उसका हक दिलाती है 'भाग मिल्‍खा भाग' 
रेटिंग :: ****  चार स्टार 

मिल्खा सिंह ने अपनी जिंदगी की सबसे अहम रेस में एक पल को पीछे मुड़ कर देखा और इतिहास रचने से रह गए। 1960 के रोम ओलंपिक की 400 मीटर दौड़ के फाइनल में जब पिस्तौल से गोली छूटी तो भारतीय एथलेटिक्स इतिहास का यह सबसे बेहतरीन धावक प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ता हुआ फर्राटे से ट्रेक पर निकल पड़ा। 
आधी दूरी तक वह सबसे आगे था और अचानक कुछ हुआ कि उसने मुड़ कर पीछे देखा। इस छोटी सी चूक ने दूसरों को उससे आगे निकलने का मौका दे दिया और विश्व रिकॉर्ड से बेहतर समय निकालने के बावजूद मिल्खा चौथे नंबर पर आया। मिल्खा ने पीछे मुड़ कर क्यों देखा...?
निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म 'भाग मिल्खा भाग' इसी सवाल का जवाब परत-दर-परत खोलती है और हमारे सामने मिल्खा की जिंदगी की तस्वीर आती है। ऐसा क्या खास है इसमें...? यह एक साधारण व्यक्ति का जीवन है, जिसने देश विभाजन की विभीषिका को अपने जिस्म-ओ-जां पर सहा।

नन्हें मिल्‍खा से धावक बनने तक का सफर

उसने जिंदगी की कालकोठरी में अपनी बिखरी सांसों को पिरोया और चमका। उसने जीवन के हवन कुंड में खुद को झोंक दिया और अग्निपुत्र की तरह जन्मा। नन्हें मिल्खा का परिवार पाकिस्तान में मारा गया और वह जैसे-तैसे जान बचा कर हिंदुस्तान पहुंचा था। बचपन कठिनाइयों में बीता। 
युवावस्था में जब वह फौज में भर्ती हुआ तो उसके बेजोड़ धावक होने की प्रतिभा सामने आई। खुद मिल्खा ने जब अपने पैरों में पंखों का एहसास किया तो उसमें आसमान को छूने की ललक पैदा हुई। अपनी मेहनत और लगन से उसने इतिहास में नए अध्याय जोड़े।
निर्देशक ने मिल्खा की कहानी को थोड़ा-सा फिल्मी टच देकर बेहद खूबसूरती से पर्दे पर उतारा है। फिल्म आपको इतिहास में ले जाती है। इतिहास के भी यहां दो हिस्से हैं, एक जब मिल्खा से पाकिस्तान में होने वाले मैत्री खेलों में भाग लेने को कहा जाता है और वह इंकार कर देता है। दूसरा, जब मिल्खा के इंकार के पीछे पाकिस्तान में उसके साथ हुई त्रासदी क्रमशः सामने आती है। 

डायलॉग के साथ गीत भी अच्छे

यहां कौशल लेखन के स्तर पर हुआ है और इसका पूरा श्रेय प्रसून जोशी को जाता है। जिन्होंने फिल्म की स्क्रिप्ट, डायलॉग और गीत लिखे हैं। तीनों काम एक ही व्यक्ति द्वारा संपन्न होने से गीत कहानी के सहज प्रवाह में आते हैं। हवन कुंड मस्तों का झुंड और जिंदा है तो प्याला पूरा भर दे... शानदार गीत हैं।
मेलबर्न ओलंपिक (1956) में मिल्खा की नाकामी और पाकिस्तान से उनकी नाराजगी के प्रसंग फिल्म को गति प्रदान करते हैं। मिल्खा की नाराजगी पाकिस्तानियों द्वारा विभाजन के दौरान दिखाई गई दरिंदगी के खिलाफ आम हिंदुस्तानी के गुस्से का भी इजहार है। प्रसून ने इस गुस्से को रचते हुए अमन की आशा की लौ को भी जलाए रखा है। पाकिस्तान पहुंचे मिल्खा से उनके बचपन का यार कहता हैः इंसान बुरा नहीं होता। हालात बुरे होते हैं। वे हालात भी बुरे थे।
प्रसून ने मिल्खा के जीवन में आए प्रेम को, उनके खेल को निखारने की कहानी के साथ खूबसूरती से पिरोया है। फिल्म किसी एक ट्रेक पर नहीं रहती और मिल्खा की जिंदगी के विषयांतरों को करीने से समेटती है। मिल्खा की प्रेमिका के रूप में सोनम कपूर सुंदर और सहज लगी हैं। वह अपनी प्लास्टिक ब्यूटी की इमेज को इस फिल्म में तोड़ती हैं।

फरहान का यादगार अभिनय

राकेश और प्रसून की कोशिशें अगर कामयाब हैं तो फरहान के बेहद कड़े परिश्रम के कारण। उन्होंने मिल्खा को हिंदी सिनेमा के इतिहास का यादगार किरदार बना दिया है। मिल्खा के रूप से उनकी गजब की समानता है और अपने अद्वितीय अभिनय से वे फिल्म को नई ऊंचाइयों पर ले गए हैं।
यह एक मील का पत्थर है। रात-दिन पसीना बहाकर फरहान ने जो एथलेटिक बॉडी बनाई, वह भी इस फिल्म को देखने का एक कारण है। भाग मिल्खा भाग हर उम्र और वर्ग के दर्शकों के लिए है। हर लिहाज से बेहतर है।
जिन्हें हिंदी फिल्मों से शिकायत रहती है कि वे खलनायकों को नायक बनाती हैं, यह फिल्म उस शिकायत को कम करती है। साथ ही बताती है कि हिंदी सिनेमा सकारात्मक दिशा में भी सोच रहा है। 
यह बड़ा बदलाव है। मिल्खा शुरुआत है। क्रिकेट, हॉकी, बॉक्सिंग और एथलेटिक्स जैसे खेल पर्दे पर कामयाबी के झंडे गाड़ रहे हैं, यह फिल्मों के साथ खेलों के लिए भी शुभ संकेत है।

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