Saturday, 6 July 2013

चन्द्रसिंह गढ़वाली - एक देशभक्त जिसने आजाद भारत में भी जेल काटी.......................71813



चन्द्रसिंह गढ़वाली - एक देशभक्त जिसने आजाद भारत में भी जेल काटी
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भारतीय इतिहास में चन्द्रसिंह गढ़वाली (25 दिसम्बर 1891 - 1 अक्टूबर 1979) को पेशावर कांड के नायक के रूप में याद किया जाता है। चन्द्रसिंह 11 सितम्बर 1914 को गढ़वाल राईफल्स में सिपाही भर्ती हुये थे। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अगस्त 1915 में मित्र राष्ट्रों की ओर से अपने सैनिक साथियों के साथ यूरोप और मध्य पूर्वी क्षेत्र में प्रत्यक्ष हिस्सेदारी की। 1917 में चन्द्रसिंह ने अंग्रेजों की ओर से मेसोपोटामिया के युद्ध में भाग लिया और 1918 में बगदाद की लड़ाई में भी हिस्सा लिया।

1930 में इनकी बटालियन को पेशावर जाने का हुक्म हुआ. 23 अप्रैल, 1930 को पेशावर में किस्साखानी बाजार में 20000 के करीब निहत्थे आन्दोलनकारियों की भीड़ विदेशी शराब और विलायती कपड़ों की दुकानों पर धरना देने के लिए आये थे। अंग्रेज आजादी के इन दीवानों को तितर-बितर करना चाहते थे, जो बल प्रयोग से ही संभव था। कैप्टेन रिकेट 72 गढ़वाली सिपाहियों को लेकर जलसे वाली जगह पहुंचे और निहत्थे पठानों पर गोली चलाने का हुक्म दिया। चन्द्रसिंह भण्डारी कैप्टेन रिकेट के बगल में खड़े थे, उन्होंने तुरन्त सीज फायर का आदेश दिया और सैनिकों ने अपनी बन्दूकें नीचीं कर ली। चन्द्रसिंह ने कैप्टेन रिकेट से कहा कि "हम निहत्थों पर गोली नहीं चलाते". इसके बाद गोरे सिपाहियों से गोली चलवाई गई। चन्द्रसिंह और गढ़वाली सिपाहियों का यह मानवतावादी साहस अंग्रेजी हुकूमत की खुली अवहेलना और राजद्रोह था। उनकी पूरी पल्टन एबटाबाद(पेशावर) में नजरबंद कर दी गई, उनपर राजद्रोह का अभियोग चलाया गया।

हवलदार चन्द्रसिंह को आजीवन कारावास (14 साल) की सजा दी गई, 16 लोगों को लम्बी सजायें हुई, 39 लोगों को कोर्ट मार्शल के द्वारा नौकरी से निकाल दिया गया। 7 लोगों को बर्खास्त कर दिया गया, इन सभी का संचित वेतन जब्त कर दिया गया। चन्द्र सिंह गढ़्वाली तत्काल ऎबटाबाद जेल भेज दिये गये. जिसके बाद इन्हें अलग-अलग जेलों में स्थानान्तरित किया जाता रहा। पर इनकी सज़ा कम हो गई और 11 साल के कारावास के बाद इन्हें 26 सितम्बर 1941 को रिहा कर दिया गया।

श्री गढ़वाली एक निर्भीक देशभक्त थे, वे बेड़ियों को "मर्दों का जेवर" कहा करते थे। 1942 में वह फिर से भारत छोड़ो आन्दोलन से जुड़ गए और उन्हें फिर से गिरफ्तार कर सात साल की सजा दी गई, लेकिन 1945 में ही उन्हें जेल से छोड़ दिया गया. अंतत 22 अक्टूबर 1946 को गढ़वाल वापिस लौटे.

16 साल की नौकरी के बदले जब मात्र 30 रुपये पेंशन मिली, तो उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया. लेकिन अपने बाक़ी साथियों को सम्मानजनक पेंशन दिलवाने के लिए वे आजीवन संघर्ष करते रहे. इस अहिंसक सिपाही के पवित्र आन्दोलन को अहिंसा के पुजारी गाँधी ने बागी कहकर उनकी आलोचना करी. 1962 में जब नेहरु ने उनसे कहा की "आप पेंशन क्यूँ नहीं लेते" तो चन्द्रसिंह ने कहा मैंने जो कुछ भी किया पेंशन के लिए नहीं बल्कि देश के लिए किया. सरकारें आती जाती रहीं पर इनको और इनके साथियों को कोई न्याय नहीं मिला. लेकिन आजाद भारत में एक साल की सजा ज़रूर मिली. कम्युनिस्ट विचारधारा का होने के कारण स्वाधीनता के बाद भी भारत सरकार उनसे शंकित रहती थी। वे जिला बोर्ड के अध्यक्ष का चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस सरकार ने उन पर पेशावर कांड का सजायाफ्ता होने के आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया और एक वर्ष के लिए जेल में डाल दिया।

सामाजिक बुराईयों के उन्मूलन के लिये वे सदैव संघर्षरत रहे, 1952 में उन्होंने पौड़ी विधान सभा सीट से कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से चुनाव लडा, लेकिन वे हार गये। 1 अक्टूबर 1979 को 88 वर्ष की आयु में महान क्रांतिकारी चन्द्रसिंह गढ़वाली का स्वर्गवास अत्यंत विषम परिस्थितियों में हुआ.

एक बार जब एक पत्रकार ने चन्द्रसिंह गढ़वाली से पूछा की "इस आज़ादी का श्रेय फिर भी कांग्रेस लेती है?" तो चन्द्रसिंह उखड़ गए और बोले "यह कोरा झूठ है. मैं पूछता हूँ की ग़दर पार्टी, अनुशीलन समिति, MNH, रासबिहारी बोस, राजा महेंदर प्रताप, कामागाटागारू कांड, दिल्ली लाहौर के मामले, दक्शाई कोर्ट मार्शल के बलिदान क्या कांग्रेसियों ने दिए हैं, चोराचौरी कांड और नाविक विद्रोह क्या कांग्रेसियों ने दिए थे? लाहौर कांड, चटगांव शस्त्रागार कांड, मद्रास बम केस, ऊटी कांड, काकोरी कांड, दिल्ली असेम्बली बम कांड, क्या यह सब कांग्रेसियों ने किये थे? हमारे पेशावर कांड में क्या कहीं कांग्रेस की छाया थी? अत: कांग्रेस का यह कहना की स्वराज्य हमने लिया, एकदम गलत और झूठ है." कहते कहते क्षोभ और आक्रोश से चन्द्रसिंह जी उत्तेजित हो उठे थे. फिर बोले "कांग्रेस के इन नेतायों ने अंग्रेजों से एक गुप्त समझोता किया, जिसके तहत भारत को ब्रिटेन की तरफ जो 18 अरब पौंड की पावती थी, उसे ब्रिटेन से वापिस लेने की बजाय ब्रिटिश फौजियों और नागरिकों के पेंशन के खातों में डाल दिया गया. साथ ही भारत को ब्रिटिश कुम्बे (commonwealth) में रखने को मंजूर किया गया और अगले ३० साल तक नेताजी सुभाष चंद्रबोस की आजाद हिंद सेना को गैरक़ानूनी करार दे दिया गया. मैं तो हमेशा कहता हूँ- कहता रहूँगा की अंग्रेज वायसराय की ट्रेन उड़ाने की कोशिश कभी कांग्रेस ने नहीं की, की तो क्रांतिकारियों ने ही. हार्डिंग पर बम भी वही डाल सकते थे न की कांग्रेसी नेता. सहारनपुर-मेरठ- बनारस- गवालियर- पूना-पेशावर सब कांड क्रांतिकारियों से ही सम्बन्ध थे, कांग्रेस से कभी नहीं."
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1 comment:

  1. royal salute to you sir

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