Saturday, 6 July 2013

फिल्म रिव्यू :: अपनी खामोशी से बांध लेती है 'लुटेरा'..................71613

फिल्म रिव्यू :: अपनी खामोशी से बांध लेती है 'लुटेरा'

3.5 स्टार

'लुटेरा' फिल्म न तो हंसाती हैं और न ही रुलाती है। पर यह फिल्म उन फिल्मी पात्रों की जिंदगी को लेकर आप में बेचैनी पैदा करती है जिन्हें हम पर्दे पर उभर कर खो रही क्रेडिट्स के बीच छोड़ आए होते हैं। 'लुटेरा' की पिच और फ्रीक्वेंसी 'ब्लैक', 'गुजारिश' और 'उड़ान' फिल्मों जैसी है। लेकिन इसका कैनवास बड़ा और अपीलिंग है। इस फिल्म की खासियत इसका गैर फिल्मी होना भी है।
फिल्‍म का हीरो पूरी फिल्म में अंडरप्ले रहते हुए भी हीरो लगता है और कुछ ऐसा ही नायिका के साथ भी होता है। लुटेरा एक उदास किस्म के रोमांस का किस्सा कहती है। ऐसा रोमांस जिसे कई बार जरूरतों और वास्तविकताओं से समझौता करना पड़ता है। उस रोमांस के बीच में थ्रिलर के कुछ छीटें भी हैं लेकिन यह छीटें दरअसल उस रोमांस को ही गाढ़ा कर रहे होते हैं।
ओ हेनरी की कहानी 'द लास्ट लीफ' से थोड़ा-बहुत प्रेरित इस फिल्म की मूल कथा थोड़ी कठिन लग सकती है। लेकिन इतनी कठिन भी नहीं कि दर्शक उसमें उलझना न चाहें। थोड़ी सुस्त, थोड़ी उदास और थोड़ी कम वाचाल होने के बाद भी लुटेरा आपको अपने साथ जोड़ती है। शायद फिल्म के खत्म होने के बाद तक भी।

कहानी विश्वास टूटने और जुड़ने की

फिल्म का बैकग्राउंड 1950 से 1955 के बीच का भारत है। भारत आजाद हो चुका है। बड़ी रियासतों के बाद अब जमींदारों से उनकी जमीनें सरकारी जमीनों में शामिल करायी जा रही हैं। यह फिल्म पश्चिम बंगाल के मानिकपुर रियासत के जमींदार की कहानी कहती है। जमींदार अपनी खूबसूरत बेटी पाखी (सोनाक्षी सिन्हा) के साथ इस विश्वास के साथ रह रहा होता है कि कुछ भी हो जाए वह अपनी रियासत को सरकार में शामिल नहीं होने देगा।
इसी बीच भारत सरकार से पुरातत्‍व विभाग का एक अधिकारी बरुण श्रीवास्तव (रणवीर सिंह) उस क्षेत्र में स्थित एक मंदिर के उत्‍खनन के लिए आया होता है। पाखी उससे प्यार करने लगती है। बाद में पता चलता है कि बरूण सरकारी अधिकारी न होकर एक ठग होता है। वह जमींदार के यहां प्लान करके आया था ताकि वह उनका विश्वास जीतकर उन सोने की मूर्तियों और आभूषणों को औने-पौने दामों में बिकवा दे जो जमींदार को ईस्ट इंडिया कंपनी से मिले होते है। वह ऐसा कर भी लेता है। साथ ही पाखी से सगाई की तैयारी भी। सगाई से पहले वाली रात में बरूण कोलकाता चला जाता है। जब कुछ "लूटकर"।
इस सदमे से जमींदार बाबू की मौत हो जाती है। बरूण एक बार फिर लौटकर आता है। इस बार मानिकपुर नहीं डलहौजी। जहां पाखी अब रह रही होती है। जमींदार की पुस्तैनी हवेली में। इस बार बरूण का इंतजार पाखी के साथ डलहौजी की पुलिस को भी है। फिल्म का क्लाइमेक्स इसी बात में है कि क्या पाखी बरुण को माफ करती है और उसका हश्र क्या होता है।

सोनाक्षी ने पहली बार किया अभिनय

यह सोनाक्ष्‍ी सिन्हा की पहली ऐसी फिल्म है जिसमें सोनाक्षी के पास ऐक्टिंग करने के मौके थे। खूबसूरत सूती साड़ियों में सजी सोनाक्षी को खूबसूरत दिखाने के ‌लिए कैमरे ने भी कम मेहनत नहीं की है। खुराफती लड़की के साथ एक बीमार लड़की के किरदार में भी सोनाक्षी प्रभावित करती हैं। लुटेरा देखकर लगता है कि सोनाक्षी ऐक्टिंग कर लेती हैं।
अभी तक रणवीर सिंह ने जितनी भी फिल्में की हैं सभी में उनकी भूमिका लाउड है। यह उनकी पहली फिल्म है जहां उन्हें खामोशी से अभिनय करना होता है। इस लिहाज से रणवीर भी निराश नहीं करते। इंटरवल के बाद के दृश्यों और खासकर क्लाइमेक्स के सीन में रणवीर प्रभावी लगे हैं। छोटी-छोटी भूमिकाओं बाकी के कलाकार भी किरदार में डूबे हुए लगते हैं।

निर्देशन अच्छा, अच्छे संवाद कम

यह विक्रमादित्य मोटवानी की दूसरी फिल्‍म है। इस फिल्म का मूल मिजाज भी उनकी पहली फिल्म 'उड़ान' जैसा ही है। खामोशी से गुजर रही फिल्म में कहीं-कहीं चौंकाने वाली घटनाएं आती हैं और वह हमें झकझोर देती हैं। विक्रमादित्य की खूबसूरती यह है कि वह दर्शकों को इस बात का भरोसा दिलाने में कामयाब होते हैं कि फिल्म के दोनों पात्र एक-दूसरे से बेपनाह मोहब्बत कर रहे होते हैं।
फिल्म का क्लाइमेक्स बहुत ही प्रभावी और क्लासिकल तरीके से रचा गया है। फिल्म का एकमात्र अभाव अच्छे डायलॉगों की कमी है। यदि फिल्म के पात्रों को थोड़ा और वाचाल किया जाता तो यह फिल्म ज्यादा लोगों तक पहुंच सकती थी।

गाने भी फिल्म जैसे

फिल्म का संगीत भी फिल्म की तरह भव्य है। "जिंदा हूं यार" और "संवार लूं" दो ऐसे गाने हैं जो फिल्म के इंटरवल के पहले और इंटरवल के बाद का मिजाज बताते हैं। "शिकायतें" और "मनमर्जियां" गाने भी सुनने में बेहद खूबसूरत हैं।

क्यों देखें

एक क्लासिकल ढंग की रोमांटिक कहानी जो अपने बीच की न होते हुए भी हमारी ही लगती है।

क्यों न देखें

य‌दि आपको ऐसी फिल्मों में दिलचस्पी है जिनमें जानबूझ कर फिल्म को लोकप्रिय बनाने वाले मसाले डाले गए होते हैं।

निर्देशक: विक्रमादित्य मोटवानी
निर्माता: एकता कपूर, अनुराग कश्यप
संगीत: अमित त्रिवेदी
कलाकार: रणवीर सिंह, सोनाक्षी सिन्हा
राइटर: विक्रमादित्य मोटवानी
-->

No comments:

Post a Comment