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Thursday, 27 June 2013

आजादी के बाद - गांधी, नेहरू और पटेल....................... 68013

आजादी के बाद - गांधी, नेहरू और पटेल 

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आजादी के बाद 11 में से 10 प्रान्तीय कांग्रेस समितियाँ प्रधानमंत्री पद के लिए सरदार पटेल के पक्ष में थीं, और केवल एक नेहरु के पक्ष में. सत्तालोलुप, अवसरवादी और झूठी लोकप्रियता पसंद नेहरु इस सत्य से उखड़ गए और देश की अखंडता के नाम पर सौदा करने गाँधी के पास पहुँच गए. उस समय गाँधी भी देशहित को भूलते हुए नेहरु की जिद के आगे झुक गए, और सरदार पटेल को बुलाकर प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को नेहरु के लिए छोड़ देने को कहा. गांधी की इच्छा का आदर करते हुए सरदार पटेल ने प्रधानमंत्री पद की दौड़ से अपने को दूर रखा और इसके लिये नेहरू का समर्थन किया। उन्हें उपप्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री का कार्य सौंपा गया, किन्तु नेहरू और पटेल के सम्बन्ध हमेशा तनावपूर्ण ही रहे।

अंग्रेज जाते-जाते भी भारत को टुकड़ों में बाँट जाने की कूटनीति खेलना नहीं भूले थे, उन्होंने अखंड भारत को आज़ादी न देकर भारत में आने वाली करीब 662 देशी रियासतों को यह कहते हुए आज़ादी दी की हमने जिनसे सत्ता हासिल की थी उनको ही लौटा रहे हैं. माउण्टबैटन ने जो प्रस्ताव भारत की आजादी को लेकर रखा था उसमें ये प्रावधान था कि भारत के 565 रजवाड़े भारत या पाकिस्तान में किसी एक में विलय को चुनेंगे और वे चाहें तो दोनों के साथ न जाकर अपने को स्वतंत्र भी रख सकेंगे। स्वतंत्रता के समय भारत के अन्तर्गत तीन तरह के क्षेत्र थे-
(१) 'ब्रिटिश भारत के क्षेत्र' - ये लंदन के इण्डिया आफिस तथा भारत के गवर्नर-जनरल के सीधे नियंत्रण में थे।
(२) 'देसी राज्य' (Princely states)
(३) फ्रांस और पुर्तगाल के औपनिवेशिक क्षेत्र (चन्दननगर, पाण्डिचेरी, गोवा आदि)

इसलिए अब गृहमंत्री के रूप में सरदार पटेल की पहली प्राथमिकता देसी रियासतों(राज्यों) को भारत में मिलाना था। भोपाल, जूनागढ, हैदराबाद और कश्मीर को छोडक़र 552 रियासतों ने स्वेज्छा से भारतीय परिसंघ में शामिल होने की स्वीकृति दी थी। इसको उन्होने बिना कोई खून बहाये सम्पादित कर दिखाया। जूनागढ़, काश्मीर तथा हैदराबाद तीनों राज्यों को सेना की मदद से विलय करवाया गया किन्तु भोपाल में इसकी आवश्यकता नहीं पड़ी।

माना जाता है पटेल कश्मीर को भी बिना शर्त भारत से जोड़ना चाहते थे पर नेहरू ने हस्तक्षेप कर कश्मीर को विशेष दर्जा दे दिया. नेहरू जी ने कश्मीर के मुद्दे को यह कहकर अपने पास रख लिया कि यह समस्या एक अंतरराष्ट्रीय समस्या है. अगर कश्मीर का निर्णय नेहरू की बजाय पटेल के हाथ में होता तो कश्मीर आज भारत के लिए समस्या नहीं बल्कि गौरव का विषय होता। भारत के एकीकरण में सरदार पटेल के महान योगदान के लिये उन्हे भारत का लौह पुरूष के रूप में जाना जाता है।

नेहरू व सरदार पटेल में आकाश-पाताल का अंतर था। यद्यपि दोनों ने इंग्लैण्ड जाकर बैरिस्टरी की डिग्री प्राप्त की थी परंतु सरदार पटेल वकालत में नेहरू से बहुत आगे थे तथा उन्होंने सम्पूर्ण ब्रिटिश साम्राज्य के विद्यार्थियों में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया था। नेहरू प्राय: किसी काम के बारे में सोचते रहते थे, जबकि सरदार पटेल उसे कर डालते थे। पटेल ने भी ऊंची शिक्षा पाई थी परंतु उनमें किंचित भी अहंकार नहीं था। वे स्वयं कहा करते थे, "मैंने कला या विज्ञान के विशाल गगन में ऊंची उड़ानें नहीं भरीं। मेरा विकास कच्ची झोपड़ियों में गरीब किसान के खेतों की भूमि और शहरों के गंदे मकानों में हुआ है।" नेहरू को गांव की गंदगी, तथा जीवन से चिढ़ थी। नेहरू अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के इच्छुक थे तथा समाजवादी प्रधानमंत्री बनना चाहते थे।
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